बढ़ती बेरोजगारी देश के लिए घातक

बेरोजगारी लगभग पूरी दुनिया में एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक चिंता है। यह कई सामाजिक बीमारियों को जन्म देता है। भारत में कोविड-19 के मामले 43 लाख के क़रीब होने जा रहे हैं और अर्थव्यवस्था ठप पड़ी हुई है। अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से सुधार की गुंजाइश अभी दूर की कौड़ी नज़र आ रही है। असंगठित क्षेत्र की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ रही है। लेकिन दिनों दिन जिस तरह से बेरोजगारी की दर बढ़ रही है उससे लोगों के सामने एक गंभीर समस्या पैदा कर रही है। हैरानी की बात है कि समाज पर पड़ने वाले नकारात्मक नतीजों के बावजूद, भारत में बेरोजगारी सबसे अधिक अनदेखी मुद्दों में से एक बनी हुई है। सरकार द्वारा समस्या को नियंत्रित करने के लिए कुछ कदम उठाते नही दिख रहे हैं। हालाँकि, उठाये भी तो ये पर्याप्त प्रभावी नहीं रहे हैं। सरकार को न केवल इस समस्या को नियंत्रित करने के लिए कार्यक्रम शुरू करने चाहिए बल्कि उनकी प्रभावशीलता पर भी नजर रखे और जरूरत पड़ने पर उन्हें संशोधित करना चाहिए।
बेरोजगार युवाओं के तेजी से बढ़ती तादाद देश के लिए खतरे की घंटी है। केंद्र व राज्य सरकारें भारी तादाद में रोजगार देने वाले उद्योग नयी नौकरियां पैदा करने में नाकाम रही हैं। इस समस्या के समाधान के लिए कौशल विकास और लघु उद्योग को बढ़ावा देना जरूरी है। वहीं युवाओं को नौकरी के लायक बनाने के लिए वोकेशनल ट्रेनिंग के जरिये कौशल विकास बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही उद्योग व तकनीक संस्थान में बेहतर तालमेल जरूरी है। सवाल यह भी है कि कोविड19 के वजह से उपजे हालातों में आखिर देश के युवा कहां जाएं, क्या करें, जब उनके पास रोजगार के लिए मौके नहीं हैं, समुचित संसाधन नहीं हैं, योजनाए सिर्फ कागजों में सीमित हैं। पहले ही नौकरियों में खाली पदों पर भर्ती पर लगभग रोक लगी हुई है। कुछ राज्यों जैसे छत्तीसगढ़ में वर्तमान सरकार ने पिछले 2 सालों में वैकेंसी तो निकाली है लेकिन एसआई जैसे पदों के लिए परीक्षा नही करा पाई। कुछ वैकेंसी के परीक्षा करा भी लिए तो रिजल्ट घोषित नही कर पाए। सेलेक्शन और डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के बाउजूद उन्हें जॉइनिंग नही दे पाए हैं ऐसी स्थिति बनी हुई हैं। यह स्थिति बेरोजगारी के लिए आग में घी का काम कर रही है। पढ़े-लिखे लोगों की डिग्रियां आज रद्दी हो गई हैं, क्योंकि उन्हें रोजगार नहीं मिल पा रहा। केंद्र और राज्य सरकारों को इस मसले को गंभीरता से लेना जरूरी है। नए रोजगारों का सृजन करना जरूरी है। युवा देश का भविष्य है तो वह भविष्य क्यों अधर में लटका रहे?
वर्तमान केंद्र सरकार ने कौशल विकास को लेकर बड़े-बड़े दावे जरूर किये थे, लेकिन अब तक उसका कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ सका है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में प्रतिदिन 400 नए रोजगारों का सृजन किया जाता है और अभी कोविड19 जैसे हालात में और बहुत ज्यादा कम हो गया है। यह हमारी बेलगाम रफ्तार से बढ़ती आबादी के लिहाज से ऊंट के मुंह में जीरा ही कहा जा सकती है इसके मद्देनजर हमारी योजनाओं की प्राथमिकताओं में बेरोजगारी उन्मूलन को शामिल कर ठोस कदम उठाए जाएं ताकि भविष्य की इमारत को मजबूत नींव प्रदान की जा सके। केंद्र एवं राज्य सरकारों से विशेष दरकार है कि जल्द इस समस्या से निजात पाने के लिए विशेष कदम उठाए जाएं।

-बलराम साहू
बिलासपुर

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