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महात्मा गांधी जी की 151 वी जयंती ( 2 अक्तूबर 2020) पर विशेष महात्मा गांधी : आज बहत्तर साल बाद भी प्रासंगिक हैं

ByMedia Session

Oct 1, 2020

महात्मा गांधी ने सर्वप्रथम सत्य, अहिंसा और शत्रु के प्रति प्रेम के आध्यात्मिक और नैतिक सिद्धांतों का राजनीति के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्रयोग किया और सफलता प्राप्त की। उन्होंने जहाँ एक ओर भारत को अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्ति दिलाई, वहीं दूसरी ओर संसार को अहिंसा का ऐसा मार्ग दिखाया, जिस पर यकीन करना कठिन तो नहीं पर अविश्वसनीय ज़रूर था। गांधी ने राजनीति, समाज, अर्थ एवं धर्म के क्षेत्र में नए आदर्श स्थापित किये व उसी के अनुरूप लक्ष्य प्राप्ति के लिये स्वयं को समर्पित ही नहीं किया, बल्कि देश की जनता को भी प्रेरित किया और आशानुरूप परिणाम भी प्राप्त किये।

उनकी जीवन-दृष्टि भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। आज गांधी हमारे बीच नहीं हैं किंतु एक प्रेरणा और प्रकाश के रूप में लगभग उन सभी मुद्दों पर उनके विचार और सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं, जिनका सामना किसी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र को करना पड़ता है। इस 21वीं सदी में गांधी की सार्थकता प्रत्येक क्षेत्र में है, इसीलिये इस अहिंसावादी के सिद्धांतों के महत्त्व को समझकर संयुक्त राष्ट्र 2 अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता मोहनदास करमचंद गांधी के आदर्शों, विश्वासों एवं दर्शन से उदभूत विचारों के संग्रह को गांधीवाद कहा जाता है।

सांप्रदायिक कट्टरता और आतंकवाद के इस वर्तमान दौर में गांधी तथा उनकी विचारधारा की प्रासंगिकता और बढ़ गई है, क्योंकि उनके सिद्धांतों के अनुसार सांप्रदायिक सद्भावना कायम करने के लिये सभी धर्मों-विचारधारों को साथ लेकर चलना ज़रूरी है। आज के दौर में उनके सिद्धांत बेहद ज़रूरी हैं, क्योंकि इससे पहले उनकी इतनी अधिक ज़रूरत कभी महसूस नहीं की गई। लेकिन इसके साथ एक विरोधाभास यह है कि इतना सब होने के बावजूद कोई भी उनके सिद्धांतों का अनुकरण करने के लिये तैयार नहीं है। लोगों ने तो उस रास्ते को ही बंद कर दिया है, जिस पर आगे बढ़ने की आज के दौर में महती आवश्यकता है।

उन्हें बेहद प्रयोगधर्मी व्यक्ति माना जाता है, लेकिन यह प्रयोग केवल बौद्धिक स्तर तक सीमित नहीं था; बल्कि इसे उन्होंने अपने जीवन में भी उतारा, जिसकी कुछ लोग आज के दौर में आलोचना भी करते हैं। लेकिन उनके चिंतन और प्रयोगों में ‘लोग क्या कहेंगे’ जैसे शब्दों का स्थान नहीं था।

बीसवीं शताब्दी के प्रभावशाली लोगों में नेल्सन मंडेला, दलाई लामा, मिखाइल गोर्बाचोव, अल्बर्ट श्वाइत्ज़र, मदर टेरेसा, मार्टिन लूथर किंग (जू.), आंग सान सू की, पोलैंड के लेख वालेसा आदि ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने-अपने देश में गांधी की विचारधारा का उपयोग किया और अहिंसा को अपना हथियार बनाकर अपने इलाकों, देशों में परिवर्तन लाए। यह प्रमाण है इस बात का कि गांधी के बाद और भारत के बाहर भी अहिंसा के ज़रिये अन्याय के खिलाफ सफलतापूर्वक लड़ाई लड़ी गई और उसमें विजय भी प्राप्त हुई।

गांधी का कहना था कि स्वराज्य एक पवित्र शब्द है, यह एक वैदिक शब्द है, जिसका अर्थ आत्मशासन और आत्मसंयम है। अंग्रेजी शब्द ‘इंडिपेंडेंस’ सब प्रकार की मर्यादाओं से मुक्त निरंकुश आज़ादी या स्वच्छंदता का अर्थ देता है, लेकिन स्वराज्य शब्द के अर्थ में ऐसा नहीं है। गांधी का स्वराज गाँवों में बसता था और वे गाँवों में गृह उद्योगों की दुर्दशा से चिंतित थे। खादी को प्रोत्साहन और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार उनके जीवन के आदर्श थे, जिनको आधार बनाकर उन्होंने देशभर के करोड़ों लोगों को आज़ादी की लड़ाई के साथ जोड़ा। उनका कहना था कि खादी का मूल उद्देश्य प्रत्येक गाँव को अपने भोजन एवं कपड़े के मामले में स्वावलंबी बनाना है।

गांधी यह मानते थे कि आर्थिक व्यवस्था का व्यक्ति और समाज पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है और उससे उत्पन्न हुई आर्थिक और सामाजिक मान्यताएँ राजनीतिक व्यवस्था को जन्म देती हैं। उत्पादन की केंद्रित प्रणाली से केंद्रीभूत पूंजी उत्पन्न होती है जिसके फलस्वरूप समाज के कुछ ही लोगों के हाथों में आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था केंद्रित हो जाती है। ऐसे में गांधी के समाज की रचना विकेंद्रीकरण पर आधारित मानी जा सकती है। गांधी के आर्थिक-सामाजिक दर्शन में विक्रेंद्रित उत्पादन प्रणाली, उत्पादन के साधनों का विकेंद्रित होना और पूंजी विकेंद्रित होने की बात कही गई है, ताकि समाज जीवन के लिये आवश्यक पदार्थों की उपलब्धि में स्वावलंबी हो और उसे किसी का मुखापेक्षी न बनना पड़े।

इस मुद्दे पर गांधी के विचार बहुत स्पष्ट थे। उनका कहना था कि यदि हिंदुस्तान के प्रत्येक गाँव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मैं अपनी इस तस्वीर की सच्चाई साबित कर सकूंगा, जिसमें सबसे पहला और सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे, अर्थात् न कोई पहला होगा और न आखिरी। इस बारे में उनका मानना था कि जब पंचायती राज स्थापित हो जाएगा तब लोकतंत्र ऐसे भी अनेक काम कर दिखाएगा, जो हिंसा कभी नहीं कर सकती।

गांधी भलीभाँति जानते थे कि भारत की वास्तविक आत्मा देश के गाँवों में बसती है। अत: जब तक गाँव विकसित नहीं होंगे, तब तक देश के वास्तविक विकास की कल्पना करना बेमानी है। गांधी के दर्शन में देश के आर्थिक आधार के लिये गाँवों को ही तैयार करने की कल्पना की गई है। गांधी का विचार था कि भारी कारखाने स्थापित करने के साथ-साथ दूसरा स्तर भी बचाए रखना ज़रूरी है, जो कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था है।

गांधी को समझने के लिये यह स्पष्टतः समझ लेना होगा कि गांधीवाद के नीचे धर्म की एक ठोस बुनियाद है, जिसके बारे में उनका मानना था कि इसके संस्कार उन्हें अपनी माता से मिले। गांधी ने अपने अखबार ‘यंग इंडिया’ में लिखा था कि सार्वजनिक जीवन के आरंभ से ही उन्होंने जो कुछ कहा और किया है, उसके पीछे एक धार्मिक चेतना और धार्मिक उद्देश्य रहा है। राजनीतिक जीवन में भी उनके धार्मिक विचार उनके राजनीतिक आचरण के लिये पथ-प्रदर्शक बने रहे। वे स्वधर्म के साथ अन्य सभी धर्मों का समान आदर करते थे। उनका कहना था कि मेरा धर्म तो वह है जो मनुष्य के स्वभाव को ही बदल देता है…जो मनुष्य को उसके आंतरिक सत्य के अटूट संबंध में बाँध देता है…और जो सदैव पाक-साफ करता है। गांधी के अनुसार धर्म सबसे प्रेम करना सिखाता है…न्याय तथा शांति की स्थापना के लिये खुद के बलिदान की प्रेरणा देता है। उनकी निगाह में धर्म निर्बल का बल तथा सबल का मार्गदर्शक है।

स्वच्छता एवं अस्पृश्यता गांधी दर्शन के केंद्र में हैं और इन पर उनके विचार स्पष्ट एवं पूर्ण रूप से केंद्रित थे। जनसरोकारों से जुड़े अपने लगभग हर संबोधन में गांधी स्वच्छता के मामले को उठाते थे। उनका मानना था कि नगरपालिका का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य सफाई रखना है। जो कोई भी उनके आश्रम में रहने आता था, तो गांधी जी की पहली शर्त यह होती थी कि उसे आश्रम की सफाई का काम करना होगा, जिसमें शौच का वैज्ञानिक ढंग से निस्तारण करना भी शामिल था। गांधी का मानना था कि स्वच्छता ईश्वर भक्ति के बराबर है, इसलिये वे लोगों से स्वच्छता बनाए रखने को कहते थे। वे चाहते थे कि भारत के सभी नागरिक एक साथ मिलकर देश को स्वच्छ बनाने के लिये कार्य करें।

गांधी अस्पृश्यता या छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष को साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष से भी कहीं अधिक विकराल मानते थे। इसकी वजह यह थी कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष में तो उन्हें बाहरी ताकतों से लड़ना था, लेकिन अस्पृश्यता से संघर्ष में उनकी लड़ाई अपनों से थी। वे कहते थे कि मेरा जीवन अस्पृश्यता उन्मूलन के लिये उसी प्रकार समर्पित है, जैसे अन्य बहुत सी बातों के लिये है। गांधी ने अस्पृश्यता को समाज का कलंक तथा घातक रोग माना, जो न केवल स्वयं को अपितु सम्पूर्ण समाज को नष्ट कर देता है। गांधी का कहना था कि इसी अस्पृश्यता के कारण हिंदू समाज पर कई संकट आए। वे कुछ हिंदुओं के इस तर्क से भी सहमत नहीं थे कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का एक अंग है, जिसे समाप्त करना संभव नहीं है।

सत्याग्रह उनके अनुसार एक सत्याग्रही सदैव सच्चा, अहिंसक व निडर रहता है। उसमें बुराई के गांधी जी का सत्याग्रह सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित था। उनका कहना था कि किसी भी सत्याग्रही को सच्चा, अहिंसक व निडर होना चाहिये और उसमें बुराई के विरुद्ध संघर्ष करते समय सभी प्रकार की यातनाओं को सहने की शक्ति होनी चाहिये। ये यातनाएँ सत्य के प्रति उसकी आसक्ति का ही एक हिस्सा होती हैं।

गांधी सविनय अवज्ञा की बात करते हैं और वह भी पूर्णतः अहिंसक तरीके से। 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद 1917 में बिहार के चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों के समर्थन में उनका पहला सत्याग्रह देखने को मिला। वहाँ तिनकठिया पद्धति के अंतर्गत अंग्रेज़ बागान मालिकों के लिये किसानों को अपनी भूमि के 3/20वें हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य था। इसी के विरोध में गांधी ने अहिंसात्मक प्रतिरोध या सत्याग्रह या सविनय अवज्ञा (सत्याग्रह) का मार्ग चुना और सरकार को झुकने पर विवश किया।

गांधी के अनुसार अहिंसा नैतिक जीवन जीने का मूलभूत तरीका है। यह सिर्फ आदर्श नहीं, बल्कि यह मानव जाति का प्राकृतिक नियम है। हिंसा से किसी समस्या का तात्कालिक और एकपक्षीय समाधान हो सकता है, किंतु स्थायी और सर्वस्वीकृत समाधान सिर्फ अहिंसा से ही संभव है। गांधी के चिंतन में हिंसक पशुओं, रोग के कीटाणुओं, फसलों के कीटों, असहनीय दर्द झेल रहे जीवों को मारने के लिये अहिंसा के नियम का उल्लंघन करने को उचित बताया गया है। गांधी का कहना था कि यदि हिंसा और कायरता में से एक को चुनना हो तो हिंसा को चुनना उचित है। अहिंसा को साधन बनाने वाले पहले व्यक्ति बेशक गांधी नहीं थे, लेकिन इसे आंदोलन का रूप देने वाले पहले व्यक्ति अवश्य थे, क्योंकि उन्होंने हिंसा का मनोविज्ञान समझ लिया था।

गांधी ज्ञान आधारित शिक्षा के स्थान पर आचरण आधारित शिक्षा के समर्थक थे। उनका कहना था कि शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिये जो व्यक्ति को अच्छे-बुरे का ज्ञान प्रदान कर उसे नैतिक रूप से सबल बनाए। व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिये उन्होंने वर्धा योजना में प्रथम सात वर्षों की शिक्षा को निःशुल्क एवं अनिवार्य करने की बात कही थी। गांधी का यह भी मानना था कि व्यक्ति अपनी मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा को अधिक रुचि तथा सहजता के साथ ग्रहण कर सकता है। अखिल भारतीय स्तर पर भाषायी एकीकरण के लिये वे कक्षा सात तक हिंदी भाषा में ही शिक्षा प्रदान करने के पक्षधर थे।

महात्मा गांधी बीसवीं शताब्दी के दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक और आध्यात्मिक नेताओं में से एक माने जाते हैं। वे पूरी दुनिया में शांति, प्रेम, अहिंसा, सत्य, ईमानदारी, मौलिक शुद्धता और करुणा तथा इन उपकरणों के सफल प्रयोगकर्त्ता के रूप में याद किये जाते हैं, जिसके बल पर उन्होंने उपनिवेशवादी सरकार के खिलाफ पूरे देश को एकजुट कर आज़ादी की अलख जगाई। गांधी ने अपने जीवन के समस्त अनुभवों का प्रयोग भारत को आज़ाद कराने में किया। उनका कहना था कि भारत की हर चीज़ मुझे आकर्षित करती है। सर्वोच्च आकांक्षाएँ रखने वाले किसी व्यक्ति को अपने विकास के लिये जो कुछ चाहिये, वह सब उसे भारत में मिल सकता है।

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि गांधी ने लगभग बत्तीस वर्षों तक आज़ादी की लड़ाई लड़ी, लेकिन आज़ाद भारत में वे केवल एक सौ अड़सठ दिन ही जीवित रह पाए। आज दुनिया के किसी भी देश में जब कोई शांति मार्च निकलता है या अत्याचार व हिंसा का विरोध किया जाता है या हिंसा का जवाब अहिंसा से दिया जाना हो, तो ऐसे सभी अवसरों पर पूरी दुनिया को गांधी याद आते हैं। अत: यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं कि गांधी के विचार, दर्शन तथा सिद्धांत कल भी प्रासंगिक थे, आज भी हैं तथा आने वाले समय में भी रहेंगे।

डॉ टी महादेव राव

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