यह हम सब देशवासियों का सौभाग्य है कि हमारे देश के माटी में ऐसे महान संतो एवं महापुरुषों ने जन्म लिया की उन्होंने अपने महान विचार,आचरण तथा कार्यों से समाज एवं लोगो को मानवता,करूणा ,त्याग एवं देशप्रेम का पाठ पढ़ाया. उन सभी महापुरुषों के आजादी के लड़ाई में अतुलनीय योगदान की वजह से ५०० से भी ज्यादा रिसायतों में बंटे देश ने एक राष्ट्र के रूप में जन्म लिया. यदि उन महान महापुरुषों एवं क्रांतिकारियों का जन्म भारत के मातृभूमि में नहीं होता तो शायद आज भी हमारा भारत देश विदेशियों के गुलामी में जकड़ा एवं रिसायतों में बँटा होता. उनके बलिदान की वजह से ही आज हम सब देशवासी आजाद भारत में साँस ले पा रहे हैं. इसलिए हम देशवासी हमेशा हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में कृतज्ञता का भाव रखते हैं और उनके जन्मतिथि एवं पुण्यतिथि पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं.
आज ही के दिन भारत में दो महान व्यक्तिमत्व का जन्म हुआ था जिनके महान कार्यों की वजह से वे आज भी आवाम के दिलों-दिमाग में वैचारिक तौर पर जिन्दा हैं. दोनों आदर्शवादी जननेता थे तथा भारतीय जनता के नब्ज से भली भांति परिचित थे. २ अक्टूबर १८६९ को मोहनदानस करमचंद गाँधी का जन्म हुआ था जिन्होंने लोगो को सत्य एवं अहिंसा का पाठ पढ़ाया तथा देशवासियों के मन से अंग्रेजी हुकूमत का डर भगाया. उस समय आम लोग अंग्रेजी हुकूमत से डरते थे उनके अन्यायों के खिलाफ आवाज उठाने से कतराते थे क्योंकि अंग्रेज बगावती तेवर दिखाने पर सीधे जेल में पटक देते थे. लेकिन साउथ अफ्रीका से अंग्रेजी हुकूमत से टकराकर आये सामान्य से दिखने वाले दुबले-पतले, कद- काठी तथा शांति के पुजारी ने लोगो को समझाया कि आप जेल जाने से डरे नहीं और जेल जाते वक्त किसी भी तरह की शर्मिंदगी भी महसूस ना करे क्योंकि आप सभी अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे है तथा अपने देश में आजादी से रहने का अधिकार सभी को है. अगर वे आपको जेल में डालते है तो ख़ुशी ख़ुशी जाए क्योकि वे आपके शरीर को कैद कर सकते हैं किन्तु आपके आत्मा को कोई भी कैद नहीं कर सकता. गांधीजी के इन शब्दों से लोगो के भीतर उत्साह का संचार होता था तथा वे जेल में शर्मिंदगी के बजाए गर्व से जाते थे. गांधीजी के आंदोलनो में जेल भरो आंदोलन प्रमुख तौर पर होता था. एक समय ऐसा भी आता था कि अंग्रेजो की जेले कम पड़ जाती थी किन्तु लोगो के भीतर आजादी के लीये जेल जाने का उत्साह कम नहीं होता था. गांधीवादी दृष्टिकोण हमेशा से सरल रहा है इसलिए आम लोगो को भी उनका दृष्टिकोण तथा तरीका आसानी से समझ जाता था. गौरतलब ५ सितम्बर १९२० को गांधीजी ने असहकार आंदोलन शुरू किया था और १०० वर्ष बाद भी इस आंदोलन को याद किया जाता है क्योकि भारत के स्वतंत्रता के इतिहास में यह सबसे व्यापक तथा बड़ा आंदोलन था. अंग्रेज भी अचानक इतने बड़े आंदोलन को देखकर हैरान हो गए थे क्योंकि वे हमेशा विभाजनकारी नीतियां बनाते थे किन्तु गांधीजी की ईमानदारी ,सोच एवं सूझबूझ को परखते हुए खिलाफत समिति ने उनके नेतृत्व का स्वीकार किया तथा १८५७ के क्रांति के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने पहली बार असहकार आंदोलन में हिन्दू एवं मुस्लिम समुदाय को एकजुट होकर उनसे अपनी मांग मनवाने के लिए संघर्ष करते देखा था. भलेही, असहकार आंदोलन गांधीजी ने चौरी –चौरा के हिंसक घटना की वजह से पीछे ले लिया था एवं इतना विशाल आंदोलन होने के बावजूद यह आंदोलन अपने स्वराज्य के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाया था किन्तु इस आंदोलन ने देशवासियों के मन में स्वतंत्रता का बीज बो दिया था. असहकार आंदोलन की वजह से आंदोलनकारियों एवं देशवासियों के भीतर आत्मविश्वास जाग चूका था कि मजबूत अंग्रेजी हुकूमत को एकजुटता एवं जन आंदोलन के माध्यम से देश से भगाया जा सकता है परिणामस्वरूप इस आंदोलन के २७ वर्ष बाद देश अंग्रेजो के गुलामी से मुक्त हो गया. गौरतलब, महात्मा गाँधी जिन्होंने साबरमती से दांडी तक की अपनी पैदल यात्रा शुरू करने से पूर्व देश को अंग्रेजो से पूरी तरह आजाद करने का प्रण लिया था उन्होंने इस प्रण को पूरा करके ही अपनी अंतिम साँस ली.
जबकि आज ही के दिन २ अक्टूबर १९०४ को भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म हुआ था जिनका "जय जवान जय किसान का नारा" आज भी बच्चे बच्चे के जुबान पर है. भारत के इतिहास में लाल बहादुर शास्त्री जी पहले प्रधानमंत्री थे जो किसानो की समस्याओं से जमीनी तौर से परिचित थे तथा अन्नदाता के लिए उनके मन में कृतज्ञता का भाव था. १९६४ में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जिन्होंने प्रथम पंचवार्षिक योजना में विशेषतः कृषि पर पूरा ध्यान दिया था बावजूद १९६४ में देश में अकाल जैसी स्थिति थी और इसी वर्ष नेहरू जी की मृत्यु हुयी और शास्त्री जी भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री बने .अकाल से निपटना उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी. उस वक्त देश में ऐसे कृषि नीतियों एवं तकनीक की जरुरत थी जिससे देश में अनाज का संकट दूर हो सके. सबसे पहले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने "जय जवान जय किसान" का नारा देकर देश के किसानो तक यह संदेश पंहुचा दिया था कि कृषि तथा किसान को वे प्राथमिकता देंगे इतना ही नहीं अकाल की ऐसी हालत में प्रधानमंत्री जी ने किसानों को प्रेरित करने के लिए खुद हल भी चलाया था. हालांकि पप्रधानमंत्री नेहरू जी के कार्यकाल में सिंचाई नेटवर्क का अच्छा कार्य हो चूका था किन्तु देश को ऐसे बीजो की आवश्यकता थी जिससे उत्पादन में वृद्धि हो सके क्योंकि जो बीज उपयोग में लाये जा रहे थे उनकी उत्पादन क्षमता कम होने की वजह से देश अनाज के कमी के समस्या से गुजर रहा था. ऐसे वक्त डॉ. स्वामीनाथन ने मैक्सिकन गेहू के बीजो के बारे में शास्त्री जी से बातचीत की. परिक्षण के तौर पर कुछ जगहों पर इन बीजो की बुआयी की गयी तथा यह बात सामने निकलकर आयी की मैक्सिकन गेहू के बीज भारतीय जलवायु में भी पहले से बोई जा रही गेहूं के मुकाबले दो से अढ़ाई गुना का उत्पादन करते है. किन्तु नतीजा निकलने के बाद महत्वपूर्ण निर्णय की घडी थी कि इन मैक्सिकन बीजो को देश में बोने के अनुमति देनी चाहिए या नहीं क्योंकि पर्यावरण एवं जैवविविधता के दृष्टिकोण से ऐसे फैसले बड़े अहम होते है. अंत में उन्होंने सूझबूझ का परिचय देते हुए मैक्सिको से गेहूं की नई किस्म के बीज को आयात करने का बड़ा फैसला लिया परिणामस्वरूप इस ऐतिहासिक निर्णय से 1968 में देश का गेहूं उत्पादन 170 लाख टन हो गया जबकि 1964 में यह 120 लाख टन था. शास्त्री जी के एक फैसले से देश में गेहूं का उत्पादन 4 साल में 50 लाख टन बढ़ गया था. शास्त्री जी के दूरदृष्टि के वजह से ही आज भारत गेहूं तथा अन्य कृषि फंसलो के बारे में आत्मनिर्भर है. मौजूदा स्थितियों को देखते हुए महात्मा गांधी एवं भूतपूर्व प्रधानमंत्री शास्त्री जी से प्रेरणा लेकर देश को प्रगति के मार्ग पर ले जाना चाहिए ताकि देश का समावेशक विकास हो सके. (निशांत महेश त्रिपाठी )