जीवन कौशल सीखा मैंने
खेत और खलिहानों से।
देख दमकता है माथा नित
अंतस की मुस्कानों से।।
मेहनत के विस्तृत सागर में
आशा का ही मोती है।
अन्नदान देने वाले की
क़िस्मत अक्सर रोती है।।
खुशियों की गगरी क्यों फूटी
अपने ही अरमानों से।।
जीवन,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
विश्वासों के अटल द्वार पर
बस मेहनत से दीप जले।
आँखें मेघ बनी रहती हैं
धीरज देखो रोज छले।।
देख उदर पर दावानल है
कागज के नजरानों से।।

जीवन कौशल,,,,,,,,,,,,,,,,
राजनीति की अजब चाशनी
दब जाती हैं चीत्कारें।
रह जाता है भूखा, दानी
बस ब्याजों की हैं मारें।।
अरमानों की फटी बिवाई
भय खाती फरमानों से।।
जीवन,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
शोषण की है अनगिन महलें
पपड़ायें हैं अधर यहाँ।
देख दुर्दशा जम जाती है
वसुंधरा की नजर यहाँ।।
नचिकेता सम प्रश्न उग रहे
मन के भीगे दानों से।।
जीवन,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मधुलिका दुबे,मधु






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