
विशाखापटनम/ मंथन साहित्यिक परिवार के तत्वावधान में हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में, प्रतिभा पांडे चेन्नई के संचालन, संगीता श्रीवास्तव बनारस की अध्यक्षता ,समीर द्विवेदी कन्नौज के मुख्य आतिथ्य व बच्चू लाल दीक्षित के संयोजकत्व में आयोजित काव्यांजलि मूर्धन्य साहित्यकारों के काव्य पाठ के साथ सम्पन्न हुई ।
संगीता श्रीवास्तव की सरस्वती वंदना के साथ गिरीश पांडेय (काशी) ने व्यंग्यात्मक शैली में सब भाषाएं रानी हैं तो अंग्रेजी पटरानी के मुखड़े के साथ प्रस्तुति दी। महेश गुप्ता राही (बड़वानी मप्र ) ने हिंदी की महत्ता प्रतिपादित करने के लिए अंग्रेजी पर व्यंग्य पाठ इन शब्दों में “गणपत बप्पा मोरिया देश में क्या-क्या हो रिया, कपड़े तन से घटे जा रहे संस्कार कम होरिया”। हास्य व्यंग्य के पुरोधा इंजी. खण्डेलवाल (बृजवासी ) ने हिंदी में मुक्तक प्रस्तुत किया “खिड़की से पर्दे को हटाया तो घर में उजाला आया, झांक कर देखा हमने सामने की रोशनी की छाया”।
डाॅ टी महादेव राव (विशाखापट्टनम ) द्वारा हिन्दी को लोकप्रिय बनाने में कृत्रिम मेधा (आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस) की उपादेयता पर विचार व्यक्त करने के साथ गीत “मन का पारखी एकाकी, ढूंढ़ रहा अंतरंग साथी” के बोल के साथ प्रस्तुति दी। डाॅ.शिवदत्तशर्मा (जयपुर राज.) ने हिमालय की व्यथा पर प्रहार करते हुए इन पंक्तियों के साथ “नीम पत्थर जोश पाकर कंगूरों पर चढ़ने लगे, हिम शिखर की चोटियों पर दोष सब मढ़ने लगे” रचना का सस्वर वाचन किया। प्रतिभा पुरोहित (अहमदाबाद) “हिंदी ने अलख जगा दिया,भारत मां का भाल ऊंचा हुआ है”। डॉ. मनीष दवे (इंदौर,मप्र) ने क्षेत्रीय भाषाओं की जान हिंदी है के साथ अपराजिता शीर्षक से कविता इन पंक्तियों के साथ प्रस्तुत की “बालिका हर दृष्टि से सब का दुख हर लेती, बदले में हर एक को सुख देती है”। सामाजिक तौर पर आज भी वह आश्रिता और अस्तित्वहीन क्यों बनी हुई है।
बृज व्यास (शाजापुर, मप्र) ने हिंदी दिवस पर एक गीत प्रस्तुत किया जिसके बोल हैं “हिंदी बिन सूना लगता है अपना हमें जहां, हमारी हिंदी है अभिमान वहां”। आशीष त्रिपाठी(रीवा मप्र) ने गजल इन पंक्तियों के साथ “बद से बदतर ढूंढ रहा हूं, बाहर हूं घर ढूंढ रहा हूं। घर की छत पर बैठे-बैठे नीम का पत्थर ढूंढ रहा हूं ,सारा जग छोटा पड़ जाए ऐसी चादर ढूंढ रहा हूं”।
गीता उनियाल ( उत्तराखंड) “यही हिंदी है जो भाषा सारे जग में समझी सोची जाती है” । डॉ. कृष्णा जोशी (इंदौर,मप्र) “अंतस की बोली हिन्दी, भारत में प्रचलित है हिंदी जन जन की प्रीत है हिंदी”। संयोजक एवं प्रसिद्ध साहित्यकार बच्चू लाल दीक्षित (ग्वालियर,मप्र) ने हिंदी की व्यापकता पर “हिंदी जीवन हिंदी तन मन रोम रोम में हिंदी है, जन-जन हिंदी घर-घर हिंदी जननी मेरी हिंदी है”। मुख्य अतिथि समीर द्विवेदी (कन्नौज) के मुक्तक की पंक्तियां थीं “कोई छोटी सोच जहन में मत रखना, खुद को खुद ही कभी पतन में मत रखना”।
कार्यक्रम संचालक प्रतिभा पाण्डेय (चैन्नई) “अब हिंदी हमें पुकार रही, देवी बुला रही उजाले में चल ले भैया उजाले में चल रे चल”। संगीता श्रीवास्तव (बनारस) ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन के साथ रचना पाठ किया डोर रिश्तों की नाजुक इसको संभाल कर रखना,चेहरे की ही चमक आंखों की नूर होती है, अपनी चौखट से सदा सबको उजाले बाटें।
साहित्यकारों की रचनाओं की सारगर्भित समीक्षा क्रमशः इंजी खंडेलवाल, गीता उनियाल, डॉ. शिवदत्त शर्मा, प्रतिभा पुरोहित, डॉ मनीष दवे, आशीष त्रिपाठी, डॉ कृष्ण जोशी, समीर द्विवेदी, डॉ टी महादेव राव जी ने बखूबी की।
अंत में प्रतिभा पाण्डेय ने आगामी कार्यक्रम में आमंत्रण के साथ सभी साहित्य मनीषियों का आभार माना।








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