
इस भीषण सर्दी में भी 2 बजे रात को नहर में कूदकर उसका मुहाना खोलने वाले हम अन्नदाता को पानी का जोर नहीं दिखाओ ,अगर हम रूठ गए तो देश से राजनैतिक खरपतवार साफ हो जाएगी। साथियों आज संविधान दिवस है, देश के अन्नदाता का हालात कैसा है ,यह किसी से छुपा नहीं है, आजादी के इतने वर्षों के बाद भी जो अन्नदाता सभी का पेट भरता है, अक्सर वही और उसके बच्चे भूखे सोते हैं। दूसरी तरफ जब हमारे अन्नदाता अपने हक के लिए आवाज उठा रहे हैं तो , देश की राजधानी दिल्ली में उन पर पानी की बौछार और लाठियां भांजी जा रही है। साथियों शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना यह हम सभी का लोकतांत्रिक अधिकार है, फिर आखिर अन्नदाता को रोकने की प्रयास क्यों? जो अन्नदाता सभी का पेट भरता है ,वह अन्नदाता आज हुक्मरानों को दंगाई क्यों नजर आ रहा है? आजादी के इतने वर्षों के बाद भी अन्नदाता का हालात क्या है यह आज किसी से छुपा नहीं है, आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? मैं खुद दर्द धरतीपुत्र हूं, अपने घर और आस पड़ोस के साथ ही देश के किसानों के हालात से रूबरू हूं। दोस्तों आप ही सोचो हम किसान इस भीषण ठंड में भी दिन रात पूरे परिवार के साथ खेतों में डटे रहते हैं, इस वैश्विक महामारी में भी जब पूरी दुनिया में लॉकडाउन था फिर भी हमारे अन्नदाता अपने खेतों में डटे हुए थे, इन्होंने कोई छुट्टी नहीं ली ताकि कोई भूखा ना मर सके। आज सरकारी गोदामों में हमारे अन्नदाता के मेहनत के बदौलत ही अनाज भरा हुआ है, खाद्य मंत्री आते हैं और बोलते हैं कि देश में अनाज की कहीं कमी नहीं है लेकिन इसको उपजता कौन है, उसका नाम भी नहीं लेते हैं आखिर अन्नदाता की उपेक्षा कब तक और क्यों? क्योंकि वह अपनी आवाज नहीं उठाता, और जब आज उठाया है तो उस पर दंगाइयों वाली सजा दी जा रही है। हमारे अन्नदाता इस भीषण ठंड के बीच अपनी जायज मांगों को लेकर गांधीवादी तरीके से दिल्ली आए हैं तो आखिर क्यों उन पर पानी की बौछार मारा जा रहा है? आज हमारा अन्नदाता सड़कों पर है, आज संविधान दिवस है, आखिर अन्नदाता खेतों में और उसके बच्चे सीमा पर कब तक अपनी जान देते रहेंगे। आखिर मैं पूछता हूं कि दिल्ली दरबार को देश के अन्नदाता से खतरा कब से हो गया? विडंबना है साथियों की इन किसानों को रोकने के लिए भी उन्हीं के बेटे यानी सेना के जवान खड़े कर दिए गए हैं । मेरा विनम्र निवेदन है कि जो अन्नदाता देश पर चाहे जैसी भी विपत्ति हो हमेशा देश के लिए खड़ा रहता है चाहे वह खेतों में अनाज पैदा करने में या उसका बेटा सीमा सुरक्षा के लिए अपनी जान तक न्योछावर कर देता है, उसको उसी के बेटे से सजा ना दिलाओ, हमारे अन्नदाता के लिए सुरक्षा कानून बनाओ, आखिर आजादी के इतने बरसों के बाद भी क्यों नहीं बनाया गया? आज भी अन्नदाता आखिर क्यों भूखे सोता है, फिर जब अपने अधिकार के लिए आवाज उठाया तो आप उस पर पानी की बौछार और लाठियों की बौछार मार रहे हो आखिर क्यों पूछता है देश?

विक्रम चौरसिया







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