“सृजन” की 140 वीं बैठक में ऑनलाइन हिन्दी साहित्य चर्चा का आयोजन किया गया

विशाखापटनम / आंध्र प्रदेश की प्रतिष्ठित हिन्दी साहित्य संस्था “सृजन” की 140 वीं बैठक में  ऑनलाइन हिन्दी साहित्य चर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में सृजन की वरिष्ठ सदस्या सीमा वर्मा ने उपस्थितों का स्वागत किया और कहा–सृजन का उद्देश्य है इस तरह के कार्यक्रमों से रचनाकारों को प्रेरणा मिले, सामयिक स्थितियों पर सृजन के लिए प्रोत्साहन मिले, ताकि वे सजग साहित्यकार बन सकें।  ऑनलाइन  साहित्यचर्चा का  संचालन सचिव  डॉ टी महादेव राव ने किया। सबसे पहले मीना गुप्ता ने निजी संस्थाओं में व्याप्त अनियमितताओं पर व्यंग्य कविता सुनाई “जब मैं बनी इन्विजिलेटर”। एस वी आर नायुडु ने हास्य रचना “ मैं कवि क्यों बनाना चाहता हूँ” सुनाई। वरिष्ठ नागरिकों पर अपनी मर्मस्पर्शी कविता “कुछ अपनी बात” पढ़ी एल चिरंजीव राव ने, जिसमें पीढ़ियों के अंतर और अनुभवों से सीख पर बात राखी गई।  डॉ के अनीता ने कविता “ वृद्धावस्था” प्रस्तुत किया, जिसमें वृद्धों और युवाओं के बीच संस्कार सेतु की बात काही गई। भागवतुला सत्यनारायण मूर्ति ने “ संगीत” शीर्षक कविता में संगीत में छिपी महानता और संवेदनाओं पर अपनी बात प्रस्तुत कीं। मधुबाला कुशवाहा की रचना “हे कविते” में कविता के विविध रूपों में निहित दर्शन को रेखांकित किया गया।  राम प्रसाद यादव ने आज़ादी के अमृत महोत्सव से जुड़ी “आई लव यू” में भारत और विदेश की तुलना की। सीमा वर्मा  ने गुदगुदाती मगर भोलेपन से भरी रचना “ संस्मरण – मेरे पहली हवाई यात्रा” सुनाई। जयप्रकाश झा ने “स्नेह बंधन” संस्मरण में पुरानी स्मृतियों में बसे वृद्ध की बात बड़े ही मर्मस्पर्शी ढंग से सुनाई। “रूठना मना है” में बुजुर्ग व्यक्ति के रूठने और संवाद हीनता को नीरव कुमार वर्मा ने सुंदर और हंसने को मज़बूर करती हास्य रचना प्रस्तुत की। लेखक की निरीहता और निर्धनता को रेखांकित करती लघुकथा “मूल्याकन” प्रस्तुत किया डॉ टी महादेव राव ने। निशिकांत अग्रवाल ने सृजन की गतिविधियों और इस आहित्य चर्चा के विषय में अपनी बात रखी।           प्रस्तुत रचनाओं की समीक्षा की गई और चर्चा के मुख्य बिन्दुओं पर बात की गई । सभी का मत था कि स्तरीय रचनाएँ सुनने का अच्छा अवसर मिला। आभासी मंच होने के बावजूद रचनाओं ने बांधे रखा और प्रेरित किया साहित्य सृजन के लिए। बी एस मूर्ति ने उपस्थित सभी का आभार माना और कहा इस तरह मिलजुल कर हम एक दूसरे की रचनाओं से न केवल सीखते हैं, बल्कि नए सृजन की ओर प्रेरित भी होते हैं। हम सब साहित्य सृजन की ओर अग्रसर हो सभी हमारी प्रतिभा का और सर्जना का सही अर्थ सामने आएगा।
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