हम सिन्धियों ने सदा अपने इतिहास को दुहराया है
सिन्धी एक ज़िन्दा-दिल समाज है, जो अधिक समय तक अन्याय – नाइन्साफ़ी भेद-भाव नहीं सह सकता — सिन्ध और सिन्धियों का इतिहास यही है और इतिहास की प्रकृति है कि वह अपने आप को दुहराता रहता है ।
असीरिया की रानी सेमीरामिस और सिकन्दर को मौतमार पराजय हम सिन्धियों ने दी । हमलावर लुटेरे मोहम्मद बिन कासिम से लड़ते हुए, महाराजा दाहर, महारानी लाडी, उनके पुत्र जयसिंह, उनकी कन्याएं सूरज और परिमल सहित हजारों सिन्धी नर – नारियों ने सिन्ध और भारतीय सीमाओं की रक्षा करते हुए बलिदान दिया ।
17-18 वीं सदी में कल्होड़ा मुस्लिमों के राज को सिन्ध के दीवान गिदूमल ने अपने सिन्धू धर्म से ऊपर उठकर, अनोखी सूझ-बूझ से ईरानी हमले से बचाकर, देश-धर्म और देशभक्ती और का परिचय दिया था ।
सिन्ध में हमने सेठ नाऊंमल होतचन्द भोजवानी की अगवानी में अंग़्रेजों की मदद से, कल्होड़ों और मीरों के कट्टरपन्थी इस्लामी राज को ख़त्म किया ।
अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ते हुए, खेमचन्द चेतनदास बालाणी परिवार के 40 और सच्चानन्द फेरूमल थावाणी परिवार के 11 सदस्य जेल गए । एक सिन्धी नारी मोहिनी दीपचन्द बेलाणी 12 बार और विधवा गंगा रूपाणी 8 बार जेल गईं । 50 के लगभग सेनानी अपनी पत्नी सहित जेल गए । एक क्रान्तिकारी परचो विद्यार्थी को 83 वर्ष की सजा मिली । इस स्वतन्त्रता संग्राम में हम सिन्धियों का बलिदान, शहीद हेमू कालाणी सहित कम से कम 17 शहीदों की वीर गाथा सहित उनके चित्र स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की पुस्तकों में हैं । यह संग्राम किसी भी प्रान्त से कम नहीं था ।
झूनागढ़ के आयकर आयुक्त राय बहादुर धरमदास हीरानन्दाणी ने 14 अगस्त, 1947 के दिन गुजरात की झूनागढ़ रियासत को पाकिस्तान में मिलने से बचाया था, क्योंकि झूनागढ़ नवाब की बेग़म और उनके वज़ीर शाहनवाज़ भुट्टो, झूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे ।
1947 में बंटवारे के बाद पाकिस्तान कट्टरपन्थी इस्लामिक देश बन गया, जिसके कारण हमारे 13 लाख बुज़ुर्गों को हमारी पहचान का आधार अपनी भाषा, संस्कृती और ‘सिन्धीयत’ धर्म
बचाने के लिए भारत में आना पड़ा ।
यहां आने के बाद भी हमने अपने निज-धर्म से ऊपर देश-धर्म का प्रमाण दिया है । गोवा की आज़ादी में हमारे सिन्धी युवाओं ने हजारों स्थानीय बन्धुओं की अगवानी करते हुए, पुर्तगाली फौज़ की गोलियों की बौछार झेली है ।
हम सिन्धी भारतीयों के दुख-सुख में बंटवारे से पहले भी उनके साथ थे । 1893 में महाराष्ट्र के पूना में फैली प्लेग जैसी छूत की महामारी के समय, सिन्ध के दीवान कौड़ोमल चन्दनमल खिलनाणी की अगवानी में एक दल ने तन-मन और धन से सेवाएं दीं । भारत में आने के बाद हमने अपने धार्मिक उत्सवों के समय सबको भोजन-प्रसाद खिलाया है, एक पंगत में साथ बैठकर खाया है । इस तरह हमने भारत की राष्ट्रीय एकता और भाई-चारे का परिचय दिया है । भारतीय समाजों की तुलना में औद्योगिक और व्यवसायिक विकास में हमारा योगदान अद्वितीय है । सेना, पुलिस और प्रशासन में भी हम कर्तव्यनिष्ठ और इमानदार सिद्ध हुए हैं । हम सैकड़ों धार्मिक ट्रस्ट, सैकड़ों हस्पताल, इस्कूल और कालेज चला रहे हैं, जिसका लाभ सभी भारतीयों को मिल रहा है । प्रमुख रूप से उद्योग और व्यापार से जुड़े होने के कारण एवरेज़ हर सिन्धी 8 अन्य लोगों को रोज़ी-रोज़गार देता है ।
बंटवारे के छल-कपट के द्वारा हमसे हमारी पुण्य-पवित्र और पितृ भूमी सिन्ध छीनी गई । यहां तक कि सिन्धी की उपभाषाओं थरी और कच्छी भाषा के क्षेत्र राजस्थान के थार सम्भाग और गुजरात के कच्छ को भी सिन्ध प्रदेश नहीं बनाया गया । जबकि आधे पन्जाब और आधे बंगाल को भारत में मिलाया गया ।

सार यह कि …
हम सिन्धी लड़े, किसी से कम नहीं ।
आज़ाद फिर भी अपनी धरती पे हम नहीं !
बंटवारे रूपी आज़ादी हमारे भारतीय बन्धुओं के लिए दीवाली हो सकती है पर हम सिन्धियों के ये काली आज़ादी है, जिसके घोर अंधेरे में हम अपने आप को खोते चले जा रहे हैं । आज 73 बरस के बाद भी हम लगभग 70 लाख सिन्धी, भारत के 7-8 प्रदेशों में बिखरे हुए हैं, जिसके कारण हमारा अस्तित्व – पहचान खतरे में है, क्योंकि कोई भी भाषा और संस्कृती, अपनी धरती, अपने प्रदेश के बिना अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकती, इसलिए सिन्ध प्रदेश का होना, हमारे लिए जीवन-मरण का आधार है ।
भारत – हिन्द – इन्डिया का अपना कोई इतिहास तो दूर, नाम तक ‘सिन्ध’ का दिया हुआ है । इस देश का पहला नाम “सप्त सैन्धव” देश था, पहले वेद ऋग्वेद में इसका वर्णन दिया गया है । इस देश का पहला धर्म, सभ्यता और सस्कृती का नाम ‘सिन्धू’ है, पहली और मूल भाषा सिन्धी है ।
विश्वगुरूओं का देश सिन्ध ही था, “मुअन जोदड़ो” की सिन्धू सभ्यता और ईसा से 900 पहले मुग़लों के द्वारा नष्ट किए गए तक्षशिला और पुष्कलावती विश्वविद्यालय सिन्ध में ही थे ।
विश्वप्रसिद्ध ‘अष्ठाध्यायी’ ग्रन्थ लिखकर, देवभाषा संस्कृत के अमानक रूप को मानक रूप देने वाले, महर्षि पाणिनि सिन्ध के ही थे, उनके छोटे भाई ‘पिंङ्गल’ ने छन्दशास्त्र लिखा था, जिसे “पिंङ्गल शास्त्र” कहा जाता है ।
अन्त में सार यह कि 1952 मेें भाषाई क्षेत्रों के आधार पर राज्यों का गठन किया गया, बाद में भी इसी आधार पर बड़े राज्यों को बांटकर, छोटे – छोटे राज्य बनाए गए । इसी आधार पर सिन्धी की उपभाषा कच्छी के कच्छ गुजरात और थरी के क्षेत्र राजस्थान के थार को सिन्ध प्रदेश बनाना चाहिए ।
हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारे भारतीय बन्धू “सिन्ध प्रदेश” का अधिकार दिलाने में हमें अवश्य सहयोग देंगे ।
निवेदक : प्रेम तनवाणी






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