सहानुभूति के पात्र हैं ट्रम्प सर


अमेरिका के राष्ट्रपति सर डोनाल्ड ट्रम्प सहानुभूति के पात्र हैं .वे दोबारा राष्ट्रपति बनने के लिए चुनावी समर में खेत होते दिखाई दे रहे हैं. उन्हें अब ऊपर वाला ही बचा सकता है .वे हारें या जीतें ,अगले साल मै उनसे मिलने के लिए अमरीका जरूर जाऊंगा.अब ये उनके ऊपर है कि वे मुझसे मिलते हैं या नहीं .अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की पूरी तस्वीर अब तक साफ नहीं हुई है. डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडेन के बीच कई राज्यों में कांटे का मुकाबला चल रहा है और अंतिम परिणाम किसी के भी पक्ष में जा सकते हैं. हालांकि, प्रारंभिक तौर पर जो नतीजे सामने आए हैं, उनमें बाइडेन को जबरदस्त बढ़त मिली है.
ट्रम्प भूल जाते हैं कि काठ की हांडी भारत में तो क्या दुनिया के किसी भी देश में आग पर दूसरी बार नहीं चढ़ाई जा सकती. ऐसा करने के लिए काठ की हांडी की पैंदी बदलना पड़ती है .ट्रम्प को चुनाव लड़ने से पहले इस मामले में हमारे प्रधानमंत्री जी से मशविरा करना चाहिए था .मुमकिन है किउनका काम बन जाता लेकिन अभी उनकी हांडी की पैंदी अग्निरोधी दिखाई नहीं दे रही.उसमें से जलांध आ रही है .अगर उनकी जीत न हुई तो वे जार्ज हरवर्ट वाकर बुश के बाद दूसरे राष्ट्रपति होंगे जिन्हें अमरीकी जनता 27 साल बाद दोबारा नहीं चुनेगी .
आपको बता दें कि अब तक बाइडेन को 264 इलेक्टोरल वोट मिल चुके हैं, जबकि ट्रंप के खाते में 214 इलेक्टोरल वोट आये हैं. इस लिहाज से बाइडेन का पलड़ा भारी नजर आ रहा है. आपको बता दें कि राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए किसी उम्मीदवार के पक्ष में 270 इलेक्टोरल वोट होने चाहिए. बाइडेन ने मिशिगन में भी जीत हासिल कर ली है. यह जीत काफी अहम है क्योंकि इस राज्य ने 2016 की ट्रंप की जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी.
ट्रम्प से पहले बराक ओबामा,जार्ज वाकर बुश ,और विलियम क्लिंटन को अमरीकी जनता ने लगातार दो बार काम करने का अवसर दिया .रोनाल्ड रीगन भी दूसरी बार चुने गए थे लेकिन जिमी कार्टर को दूसरा मौक़ा नहीं मिला था. इस लिहाज से ट्रम्प का दूसरी बार न चुना जाना कोई बड़ी बात तो नहीं होगी,क्योंकि उनसे पहले ऐसे राष्ट्रपतियों की लम्बी फेहरस्त है जो दूसरी बार नहीं चुने गए. जेराल्ड फोर्ड,रिचर्ड निक्सन,लिंडन बेन्स जानसन,जान केनेडी जैसे बहुत से लोग हैं जो दूसरी बार नहीं चुने गए या उन्हें प्रत्याशी नहीं बनाया गया ,लेकिन ट्रम्प को दूसरा मौक़ा मिलना या न मिलना जनता की मर्जी पर निर्भर है.उनकी पार्टी ने तो उन्हें दूसरी बार भी अपना उम्मीदवार बनाया है .
ट्रम्प के पहले चुनाव के वक्त मै अमेरिका में ही था.मैंने देखा था की उस समय अमेरिका की जनता पर ट्रम्प का जादू सर चढ़कर बोला था और मैडम हिलेरी पराजित हो गयीं थी .ट्रम्प हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की तरह मौलिक भाषण करते हैं. उनके भाषणों में लच्छे भी होते हैं और विनोद भी ,लेकिन इस बार बाइडन ने इन लच्छेदार भाषणों को बेरंग कर दिया है .ट्रम्प के चार साल के कार्यकाल का आकलन करें तो आप पाएंगे कि वे दूसरे अमरीकी राष्ट्रपतियों की तरह आँखें तो लगातार तरेरते रहे लेकिन उनके हिस्से में अनेक असफलताएं भी आई .जिनमे रंगभेद सबसे बड़ी और पुराणी समस्या रही. चीन से तल्खी और कोरोना से निबटने में उनकी नीति को लेकर अमेरिका में असंतोष दिखाई दिया .
मतगणना के रुझानों ने ट्रम्प को निराश किया है .ट्रंप ने मतगणना में गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं. उन्होंने जॉर्जिया, पेंसिलवेनिया और मिशिगन में धांधली के आरोप में केस भी किया है. ट्रंप का कहना है कि कई राज्यों में वह आगे चल रहे थे, लेकिन अचानक से पीछे हो गए. इससे पता चलता है कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. इस बीच नतीजों को लेकर हिंसा की आशंका को देखते हुए सुरक्षा के पुख्‍ता इंतजाम किए गए हैं. व्हाइट हाउस सहित प्रमुख वाणिज्य क्षेत्रों और बाजारों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है.अब लगता है की इस बार अमेरिका में जनादेश का फैसला अदालत के जरिये होगा .अगर ऐसा होता है तो दुनिया के परिपक्व लोकतंत्र के लिए एक दुर्लभ घटना होगी .
अमेरिका की राजनीति में फेडरलिस्ट,डेमोक्रेटिक रिपब्लिकन ,डेमोक्रेटिक ,व्हिग और रिपब्लिकन के अलावा निर्दलीय भी सक्रिय रहे हैं,लेकिन एक लम्बे आरसे से मुख्य मुकाबला डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन के बीच ही होता आ रहा है . अभी तक 45 में से 19 बार रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशियों को चुना गया है . 16 बार डेमोक्रेटिक चुने गए .4 व्हिग,4 डेमोक्रेट रिपब्लिकन, हुए 1 -1 फेडरलिस्ट तथा निर्दलीय राष्ट्रपति चुना गया है .अमेरिका की राजनीति में भीतर जाकर आपको और अनेक रोचक सूचनाएँ मिल सकतीं हैं यहां एक तो ऐसे राष्ट्रपति हुए जो चुनाव ही नहीं लड़े,एक ऐसे भी हुए जो पद पर रहते हुए दिवंगत हो गए ,किसी की हत्या कर दी गयी .
अमेरिका में 22 वे संविधान संशोधन के बाद कोई भी व्यक्ति दो बार से अधिक राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ नहीं सकता .भारत की तरह यहां राष्ट्रप्रमुख बनने के अनंत मौके नहीं हैं .भारत में प्रधानमंत्री को पांच साल के लिए चुना जाता है,अमेरिका में राष्ट्रपति को चार साल के लिए चुना जाता है .शायद इसीलिए यहां राष्ट्रपति तेजी से काम करते हैं .अमरीका में बराक ओबामा एक अपवाद थे,वे वफ्रिकी मोल के होते हुए भी चुने गए,वरना यहां मूल अमरीकी ही राष्ट्रपति पद पर चुने जाते रहे हैं .विलियम हेनरी हैरिसन 1841 में केवल 32 दिन इस पद पर रहे थे, जो किसी भी राष्ट्रपति का सबसे छोटा कार्यकाल है। फ्रेंकलिन रोज़वेल्ट बारह से अधिक वर्षो तक इस पद पर रहे जो सबसे बड़ा कार्यकाल है, पर जल्द ही उनकी अपने चौथे कार्यकाल में मृत्यु हो गयी; वो अकेले राष्ट्रपति है जो इस पद पर दो बार से ज़्यादा चुने गये हैं।
अमेरिका में भी राष्ट्रपति पद काँटों का ताज रहा है. इतिहास गवाह है की अमेरिका में राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित व्यक्तियों में से चार लोगो की कार्यालय अवधि में मृत्यु हो गयी थी (विलियम हेनरी हैरिसन, ज़ेकरी टेलर, वारेन हार्डिंग, और फ्रेंकलिन रोज़वेल्ट), चार की हत्या कर दी गयी .अब्राहम लिंकन जेम्स गार्फील्ड विलियम मकिन्ली और जाह्न केनेडी और एक ने इस्तीफ़ा दे दिया .अब देखते हैं की सर ट्रम्प का क्या होता है ?
@ राकेश अचल

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