

प्रश्न – संपूरण मिश्रा, रायपुर छत्तीसगढ
आपकी एक किताब महात्मा गांधी जी के हास्य विनोद पर है, कृपया बताएं महात्मा गांधी सचमुच विनोद प्रकृति के व्यक्ति थे।
- जी हां, हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सचमुच जहां एक गंभीर व्यक्ति थे वहीं वे एक विनोद प्रिय विभूति भी थे जिसे हम गांधीजी हास परिहास नामक पुस्तक को पढ़कर महसूस कर सकते हैं समझ सकते हैं।
महात्मा गांधी का योगदान देश की आजादी और संपूर्ण मानवता को संदेश देने का रहा है यह सार्वजनिक सत्य है और सत्य है उनके व्यक्तित्व के विभिन्न सच है एक सच यह भी है कि मोहनदास करमचंद गांधी का यह विभूति सचमुच एक अत्यंत विनोद प्रिय व्यक्तित्व थे-” गांधीजी: हास परिहास” नामक किताब लगभग 12 वर्ष पूर्व मेरे संपादन में प्रकाशित हुई थी जिसमें अनेक लोगों ने अलग-अलग पुस्तकों या सुनी हुई बातों को पठनीय रूप से प्रस्तुत किया गया है और संपादित करके प्रकाशित किया गया है। एक बानगी देखिए-
जन्मदिन की थैली
२ अक्टूबर के दिन गांधीजी को जन्म दिवस के उपलक्ष्य में रूपयों की थैली भेट की जाने वाली थी। गांधीजी के पास रखी रूपयों की थैली को देखकर सरोजिनी नायडु ने उनसे कहा, “यह थैली मैं आपको न दूं और लेकर भाग जाऊ तो आप क्या करेंगे।”
गांधीजी तत्काल बोले,” मैं जानता हूं कि आप ऐसा करने की शक्ति रखती हैं ।”
आस-पास बैठे हुए आश्रम के लोग गांधीजी की बात सुन हँस रहे थे ।
प्रश्न – राजेंद्र जायसवाल,कोरबी, छत्तीसगढ़
महात्मा गांधी गांधी और रविंद्र नाथ टैगोर आपसी मुलाकात ऐतिहासिक महत्व की रही है। इन दो महान हस्तियों के मध्य भी हास्य विनोद का प्रसंग घटित हुआ था।
- गांधीजी हास परिहास किताब में दोनों महान हस्तियों के हास्य प्रसंग प्रकाशित किए गए हैं। जिसे पढ़ महसूस करके हम समझ सकते हैं कि दोनों विभूतियों में कैसे आत्मीय संबंध थे नीचे एक हास्य प्रसंग आप देखिए-
गांधी रवीन्द्र हास्य प्रसंग
१९३० मे कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर साबरमती आश्रम में गांधीजी से मिलने आये थे। बातचीत के दौरान टैगोर बोले, “भई गांधी जी अब मेरी उमर ७० बरस की हो गई है इसलिए मैं आपसे बड़ा हूं न ?
गांधीजी, – “यह बात सच है परन्तु ७० बरस का बूढ़ा नाच नहीं सकता, जबकि ७० बरस का जवान कवि नाच सकता है।”
टैगोर – “यह भी सच है। आप फिर एक अरेस्ट क्योर होने की तैयारी करते मालुम होते हैं, मुझे भी सरकार ऐसा आराम का मौका दे तो कितना अच्छा हो।”
गांधी जी, “कविवर आपका ढंग ही ऐसा नहीं है, तब अंग्रेज सरकार क्या करें।”
देश के इन दो महान हस्तियों गांधी रवीन्द्र की विनोद पूर्ण बातें सुन कर आश्रम के लोग हंस रहे थे।
महात्मा गांधी के हास्य विनोद की यह एक अनूठी बेजोड़ किताब है जिसमें एक नये महात्मा गांधी से आपकी मुलाकात होती है।
प्रश्न – सुरेखा मंगवानी, भाटापारा छत्तीसगढ़
संपादक जी,आपकी गांधी जी हास्य व्यंग की किताब कहां से कैसे प्राप्त करें।
- गांधी जी: हास परिहास पुस्तक आप अपना संपूर्ण पोस्टल एड्रेस भेज कर प्राप्त कर सकती हैं।
कस्तूरबा गांधी पब्लिकेशन, मानिकपुर कोरबा कोरबा, छत्तीसगढ़ से प्रकाशित यह किताब सौ रुपए मूल्य की है।
हम यह कह सकते हैं कि यह किताब महात्मा गांधी को समझने के लिए एक नया झरोखा सदृश है।
प्रश्न – सुरजीत सिंह सलूजा, तखतपुर छत्तीसगढ़
अमेरिकी लेखक पत्रकार लुई फिशर के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से प्रगाढ़ संबंध थे।
- लुई फिशर ने महात्मा गांधी को आत्मीयता से लिखा है। कई मुलाकातें हुईं थीं जिसे उन्होंने जीवंत लेखनी से अमर बना दिया है।कई प्रसंगों में एक दृष्टांत रूप में देखिए –
स्वराज को पीछे ढकेला है
महात्मा गांधी चरखा चला रहे थे। उन्हे सूत कातते देख पत्रकार फिशर बोले. “मैं तो यह मानता था की अब आपने सूत कातना छोड़ दिया होगा।” गांधीजी, नहीं नहीं सूत कातना मैं कैसे छोड़ सकता हूं । ४० करोड़ हिन्दुस्तानीयों में से बच्चों बीमारों और अपंगो को जिनकी संख्या १० करोड़ मानी जा सकती है छोड दे बाकी ३० करोड़ आदमी रोज एक घण्टा भी सूत कातते तो हमें स्वराज मिल सकता है।”
फिशर, “कताई के आर्थिक या अध्यात्मिक कारण से।” गांधीजी दोनो कारणों से हिटलर के हुक्म से नहीं परन्तु एक आर्दश से प्रेरित होकर ३० करोड़ आदमी दिन में एक बार एक ही काम करे तो स्वराज प्राप्त करने जितनी एकता हममें आ सकती है ।” “मेरे साथ बात करते समय आप कातना रोक देते हैं क्या स्वराज़ मिलने
में इतनी देर नहीं होगी ?” फिशर नें लाजवाब प्रश्न पूछा “बेशक आपने स्वराज का ६ बार पीछे ढकेला है।” गांधीजी ने भी बाग-बाग करने वाला उत्तर दिया तो सुनकर फिशर हंस पड़े।
प्रश्न -खुशी एंथोनी, जशपुर छत्तीसगढ़
संपादक जी,महात्मा गांधी को सारा संसार प्रेम और अहिंसा का देवता की तरह पूजा करता है मुझे भी बहुत प्रेरित करते हैं। आपका यह कालम संग्रहणीय है।
- आपको महात्मा गांधी का आशीर्वाद प्राप्त होता रहे, सचमुच ऐसी विभूति संसार मानवता के लिए ईश्वर की कृपा है। गांधी जी का एक हास्य व्यंग प्रस्तुत है-
सार तो इस डिब्बे में है
गोलमेज चुनाव में भाग लेने गांधीजी इंग्लैंड जा रहे थे तब एक अंग्रेज जहाज पर उनका मजाक किया करता था। एक बार उसने गांधीजी के बारे में एक व्यंग्य भरी कविता लिखी और पढ़ने के लिए उन्हें दी। गांधीजी ने कागज फाड़कर कचरे के डिब्बे में डाल दिया लेकिन उनमें लगी पिन निकाल ली और अपने डिब्बे में रख दी। गांधीजी को चिढ़ाने की तरकीब बेकार गई देखकर वह अंग्रेज बोल उठा” अरे गांधी ! वह कविता पढ़ कर तो देखते उसमें आपके लिए कुछ सार की बाते थी। “गांधी जी – डिब्बे में रखी पिन की ओर इशारा करते हुए “हां हां उसमे जो सार की बात थी उसे मैं ने डिब्बे में बंद कर दिया है।” गांधीजी के इस विनोद पुर्ण कटाक्ष से पास बैठे हुए उनके साथी और दुसरे अंग्रेज भी हंस पड़े ।







Comments are closed.