समाज को पूरी तरह से जिसकी लाठी उसी की भैंस वाली स्थिति हो जाने से बचाने की जरूरत है…


भारतीय न्याय प्रणाली प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत पर कार्य करती जिसके तहत क़ानून के समक्ष सभी समान हैं व सभी को कानून का समान संरक्षण प्राप्त है। भारतीय न्याय व्यवस्था के उदार पक्ष को यह धारणा भी रेखांकित करती है कि यह व्यवस्था चाहे सौ अपराधी छूट जाए पर किसी एक निरपराध को सज़ा नही मिलनी चाहिए,के अघोषित सिद्धांत पर भी काम करती है। परन्तु आज़ादी के पहले से आज तक कई मौका पर देखा गया है। कमजोर, वंचित निर्धन तबके के आम नागरिक को न्याय समय पर व समुचित रूप से नही मिल पाता। इस का प्रत्यक्ष उदाहरण हाल ही में प्रकाश में आई दो घटनाएं हैं इनमें से एक घटना में निर्धनता के कारण उच्च न्यायलय में अपील करने में असमर्थ रहे दुष्कर्म के झूठे आरोप में उन्नीस वर्षों से जेल में बंद व्यक्त को उच्च न्यायालय द्वारा बाइज्ज्ज़त बरी करने व दूसरी घटना अपहरण व हत्या के मनगढ़ंत आरोप मे छः साल से जेल में बंद आरोपियों की कथित तौर पर मृत व्यक्ति के जीवित पकड़े जाने पर रिहाई की रही। उक्त दोनों घटनाओं ने एक बार फिर भारतीय न्याय व्यवस्था की सामान्य नागरिक तक पहुंच पर विचार करने के लिए विवश कर दिया है। दोनो की घटनाएं भारतीय पुलिस की विवेचना के स्तर व न्याय प्रणाली की कमियों को उजागर करतीं है।
विवेचना के स्तर पर हो रही चूकों व गलतियों का परिणाम निर्धन निरपराध व्यक्ति को भोगना पड़ता है। थाना स्तर पर कानून की कम जानकारी रखने वाले पुलिस कर्मचारियों द्वारा छोटी छोटी घटनाओं में भारतीय दंड संहिता की भारी भरकम धाराओं के लगाने जाने से वकील व न्यायालय लंबे समय कुछ तय न कर पाने की स्थिति में बने हुए रह जाते है जिसके आरोपी व्यक्ति उक्त कथित अपराध जो अभी तक साबित भी नही हुआ है, के लिए विचाराधीन कैदी के रूप में निर्धारित सज़ा अवधि से ज्यादा समय जेल इस बिता चुका होता है। जो कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के सर्वथा विपरीत है। बहुत से मामलों में देखा गया है कि व्यक्ति इस वजह से लंबे समय तक जेल में बंद रहा जाता है क्योंकि उसके परिवार के पास निचली अदालत में फैसले के विरुद्ध ऊपरी अदालत में अपील करने के लिए धन का अभाव होता है। इस सब इतर साधन संपन्न वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले कुछ लोगो के लिए अपराध दर्ज होते होते ही गिरफ्तारी के पहले जमानत प्राप्त कर लेते हैं। कई अवसरों को ऐसे लोगों के लिए समय बे समय मध्य रात्रि के बाद तक को न्यायालय को कार्य संपादित करते देखा गया है।
ऐसे वातावरण में आम जनता में न्याय व्यवस्था निष्पक्षता लेकर असमंजस की स्थिति बनती जा रही है। जो कि एक स्वस्थ लोक तंत्र के लिए बेहद चिंता जनक है। समाज को पूरी तरह से जिसकी लाठी उसी की भैंस वाली स्थिति को जाने से बचाने की जरूरत है। आम जनता खास तौर पर निर्धन व वंचित तबके के लोगो के बीच भारतीय पुलिस व न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास बहाली करते हुए इस विश्वास को मजबूत बनाने के लिए विशेष पहल करने की आवश्यकता है।
सर्वप्रथम थाना/ पुलिस स्टेशन स्तर पर विवेचन की गुणवत्ता को बढ़ाने के उपचार करने होंगे। पुलिस विभाग को अपराध अनुसंधान के लिए जरूरी संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराते हुए अनुसंधान के नवीन आधुनिक तौर तरीके से समय समय पर प्रशिक्षित करना होगा। न्यायालय द्वारा किसी भी मामले को निर्धारित अवधि में निराकृत किया जाना सुनिश्चित करने के लिए न्यायाधीशों के रिक्त पदों को अतिशीघ्र भरा जाना चाहिए। माननीय उच्चतम को भी निचली अदालतों द्वारा दिये गए लम्बी अवधि की कोई भी सज़ा व उम्र कैद जैसे फैसलों पर उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर पुनर्विचार करने की व्यवस्था बनाए जाने के विषय में आवयश्क कदम उठाने चाहिए।
बार कौंसिल ऑफ इंडिया को अधिवक्ताओं के फीस के नियमन सम्बन्ध में मार्गदर्शिका तैयार करनी चाहिए। जरूरत मंद लोगो व आम जनता को निःशुल्क विधिक सेवा उपलब्ध कराने के लिए स्थापित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को आवश्यक मानव संसाधन व धन उपलब्ध कराके आम जनता तक सस्ते व सुलभ न्याय की पहुंच सुनिश्चित की जा सकती है। उपरोक्त प्रयासों से ही हम न्याय का शासन स्थापित करके अंतिम पंक्ति पर खड़े वंचित वर्ग के व्यक्ति को देश के विकास की मुख्य धारा में जोड़ पाएंगे।

ऋषभ देव पाण्डेय
शिवरीनारायण
जिला जांजगीर
छत्तीसगढ़

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