संतन ढिंग बैठ-बैठ रोज जान खोई


हरिद्वार कुंभ में 59 संतों की जान कोरोना से जाने के बाद प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने संतों से कुम्भ के समापन की अपील की है लेकिन वे एक कुशल प्रशासक की तरह कुंभ की समाप्ति के लिए न तो उत्तराखंड सरकार को निर्देशित कर सके और न ही संत समाज को ,जबकि इस कुंभ से असंख्य लोग कोरोना का महाप्रसाद लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में कोरोना वितरित कर रहे हैं .बीते साल अल्पसंख्यकों की दो-तीन हजार लोगों की जमात के पीछे यही सरकार डंडा लेकर पीछे पड़ी हुई थी .
इस समय देश एक बड़ी आपदा से गुजर रहा है ,किन्तु क़ानून का पालन करने को लेकर हमारी सरकारों के मापदंड एक समान नहीं हैं. जमात के लिए अलग हैं और खादों के लिए अलग हैं. अखाड़ों से अपील की जाती है लेकिन जमात के खिलाफ मुकदमे दर्ज किये और कराये जाते हैं ,पुलिस का इस्तेमाल किया जाता है जबकि यदि दोनों का अपराध देखें तो एक जैसा है .जमातियों का तो फिर भी हिसाब-किताब था संतों और कुंभ में डुबकियां लगाकर पुण्य अर्जित करने वालों का तो कोई लेख-जोखा है ही नहीं,किसको पकड़ियेगा ?
सनातनी हिन्दू होने के नाते मैंने भी कुंभ में डुबकी लगाकर देखि है,सिंहस्थ में भी गया हूँ लेकिन तब कोई असामान्य परिस्थिति देश में नहीं थी .इस समय है .इस समय सरकार को किसी तरह का तुष्टिकरण नहीं करना चाहिए था.ये काम तो कांग्रेस ने बहुत किया है न ?कांग्रेस पर हमेशा से अल्पसंख्यक मुस्लिमों के तुष्टिकरण का आरोप लगता रहा है.बहरहाल यहां तो ये बहुसंख्यक तुष्टिकरण जलवा साबित हो रहा है लेकिन दुर्भाग्य ये की न संत समाज ने दूददर्शिता दिखाकर कुंभ को स्थगित किया और न देश की अदालत ने कुछ देखा- सुना .अब जब हमारी सर्कार और संत समाज दिल्ली के मर्क़ज़ीयों से बड़ा सामजिक अपराध क्र चुके हैं तब सजा किसे दी जाएगी ?
सवाल ये बी किया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुंभ को प्रतीकात्मक रूप से मनाए जाने की जो अपील आज की है उसे क्या कुंभ शुरू होने के पहले नहीं किया जा सकता था ? क्या मोदी जी पहले आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवदेशानंद गिरि से चर्चा नहीं कर सकते थे ?. उन्होंने संतों के स्वास्थ्य के बारे में जाना.लेकिन कभी मरकज वालों के स्वास्थ्य के बारे में चिंता नहीं जताई .एक प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी का ये आचरण परेशान करने वाला है.
अब जब हालात बेकाबू हो चुके हैं तब प्रधानमंत्री जी और बाक़ी के लोग ट्वीट-ट्वीट खेल रहे हैं .दुर्दिनों और संक्रमण काल में देश ट्वीट से नहीं कानून और सरकार के इकबाल से चलते हैं .दुर्भाग्य ये कि बहुसंख्यक समाज के नियंत्रण वाले मीडिया ने भी सरकार के इस दुभाँति वाले व्यवहार पर कोई टिप्पणी नहीं की. कर भी नहीं सकता था,क्योंकि उसके भी हाथ बंधे हुए हैं .मौजूदा सरकार ने कोरोना काल में अपनी जांघ खुद खोलकर दुनिया को दिखाई है. सरकार ने कोरोना फ़ैलाने वाले पांच राज्यों में रैलियां और आम सभाएं नहीं रोकीं और कुंभ को रोकने का तो सवाल ही नहीं उठता .सरकार की इस तंगदिली का खमियाजा अब देश की निर्दोष जनता भुगत रही है. रोजाना दो,सवा दो लाख मरीज सामने आ रहे हैं. प्रतिदिन हजार से अधिक लोगों की जान जा रही है .देश के हर हिस्से में मरघट की ज्वालायें धधक रहीं है किन्तु सरकार का दिल नहीं पसीज रहा,उसे तो बस बंगाल विधानसभा जीतना है .
इससे बड़ी बिसंगति क्या होगी कि देश में वैश्विक महामारी कोरोना वायरस की दूसरी लहर बेकाबू हो चुकी है लेकिन सरकार देश के बजाय अपना नफा-नुक्सान देखने में लगी हुई है . पिछले तीन से हर रोज दो लाख से ज्यादा नए मरीज मिल रहे हैं। कोविड से होने वाली मौतों की संख्या ने भी सरकार से लेकर आम लोगों तक की चिंता बढ़ा दी है। कोरोना संक्रमण का प्रकोप बढ़ने के साथ ही देश में अस्पतालों की हालत बेहद खराब नजर आ है। कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में बेड, वेंटिलेटर, रेमडेसिविर और ऑक्सीजन की किल्लत हो गई है। वहीं देश में शनिवार को बीते 24 घंटों में 2.34 लाख से अधिक नए कोरोना मरीज मिले और 1,341लोगों की संक्रमण के चलते जान चली गई है।
भारत की सभ्यता और संस्कृति को मौजूदा सियासत ने मिटटी में मिला दिया है. एक तरफ बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सीआरपीऍफ़ की गोलियों से मरे गए लोगों के शवों की यात्रा निकालकर चुनाव में अपनी स्थिति बनाये रखना चाहती है तो दूसरी तरफ भाजपा की उत्तराखंड सरकार कुंभ के जरिये पूरे देश में कोरोना की विष बेल को फ़ैलाने में सहायक बनी हुई है .उत्तराखंड सरकार का अपराध एकदम अक्षम्य है किन्तु उसे किसी भी सूरत में न अभियोजित किया जा सकता है और न बर्खास्त .सवाल ये है कि सियासत के लिए हम देश हित को कब तक दांव पर लगते रहेंगे .
मै देश के प्रधानमंत्री का भक्त नहीं हूँ लेकिन उनकी विद्व्त्ता को लेकर मुझे कभी कोई संदेह नहीं रहा,क्योंकि उनके हर विद्व्त्तापूर्ण कदम के बाद देश ने जो कुछ पाया है वो दुनिया से छिपा नहीं है .वे अभूतपूर्व प्रधानमंत्री हैं.गनीमत ये रही कि वे खुद इस बार कुंभ नहाने नहीं गए .उनकी जगह मोहन जी भागवत गए और कोरोना का महाप्रसाद साथ लेकर आये.बंगाल में भाषण देने गए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जी को भी कोरोना का महाप्रसाद मिला .कांग्रेसियों को भी मिला,कुछ इस महाप्रसाद को पचाने में कामयाब रहे और कुछ का राम-नाम सत्य हो गया .यूपी वाले तो अपनी विफलता छिपाने के लिए धधकते मरघटों की गवाही छिपाने के लिए उन्हें ढंकने का प्रयास कर रहे हैं .अभी भी वक्त है.चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को तत्काल चुनावी सभाओं और रैलियों पर रोक लगते हुए कोरोना के प्रसार को रोकने की व्यवस्था करना चाहिए. चुनाव प्रचार तो अब टीवी चैनलों के जरिये घर बैठे किया जा सकता है .
हम सबको मिलकर ईश्वर से प्रार्थना करना चाहिए कि वो देश को इस महासंकट से उबारने के आठ ही एक अविवेकी सरकार को भी सद्बुद्धि प्रदान करे ताकि तुष्टिकरण का जहर कोरोना से भी ज्यादा संघटक न होने पाए. जय श्रीराम
@ राकेश अचल

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