शिलाजीत बाबा की तलाश और मिडिल क्लास कैविएट-बादल सरोज

मुद्दे पर आने से पहले एक बात साफ है कि प्रशांत भूषण के दोनों ट्वीट्स से हम सहमत हैं। सुनाई गई सजा के हिसाब से 1 रुपए का दण्ड जमा करने के उनके निर्णय को एकदम उचित मानते हैं और यह मानते हैं कि प्रशांतजी ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के खिलाफ, कार्यशैली में सुधार और उसकी जनता के बीच में इज्जत तथा स्वीकार्यता को बचाए रखने के लिए जिस साहस के साथ लड़ाई लड़ी वह एक मिसाल है। देश का लोकतांत्रिक समाज उन्हें सलाम करेगा।

यहां मुद्दा द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास है जो अब उनमें शिलाजीत बाबा की तलाश कर रहा है। (हालांकि यह एक ऐसा मेटाफर-रूपक है जिसे अमूमन उपयोग में नहीं लाते, किन्तु यहां जिस ग्रेट इण्डियन मिडिल क्लास की बात करना है उसे इसी तरह के रूपक, बिम्ब और उपमाएं भाती और समझ आती हैं।)

इस वर्ग की तीन खासियतें हैं

एक यह हमेशा ही पिटता-पिटाता रहता है मगर पीटने वाले दुष्ट जबर के खिलाफ खुद चूँ तक नहीं करता।

दो उस जबर के खिलाफ दमदारी से लड़ रहे अपने नीचे के वर्ग- मजदूर, किसानों की जद्दोजहद में शामिल नहीं होता, उनके जलसे जुलूसों को, जी-रिपब्लिक-आज तक के चश्मे से, हिकारत से देखता है।

मगर एट द सेम टाईम

तीन अपनी सुप्त आकांक्षा और दमित कुंठा के समाधान के लिए किसी शिलाजीत बाबा का इंतजार करता रहता है।

हाल के दौर में इसके पहले शिलाजीत बाबा थे टीएन शेषन! उनकी फुलझडिय़ों पर ये मार ऐसा फि़दा था कि पूछिए मत। फिर कुछ समय तक रहे लिंगदोह और तो और किरण बेदी तक पर यह निछावर हुआ था। उसके बाद आये परमपूज्य सिरी सिरी 1008 अन्ना हजारे। उन्हें आसमाँ पै है खुदा और जमीं पै अन्ना बनाते बनाते यहां तक पहुँच गया कि 1962 के युद्द में चीन के पीछे हटने की वजह उस वक्त मिलिट्री की रसोई में काम करने वाले अन्ना भाऊ हजारे की भूमिका बताने पर आमादा हो गया। आखिर में आए केजरीवाल जिन पर तो हाय रब्बा मूमेंट में यह एकदम ट्रान्स अवस्था को प्राप्त होता भया।

(बुद्दू नहीं है, चूजी बहुत है। नेताओं में ईमानदारी की तलाश करता है मगर कभी माणिक सरकार या पिनाराई विजयन या ज्योति बाबू के चक्कर में नहीं फँसता!)

यही था जो रामदेव की डंगाडोली में मगन था- यही थे जिसने अच्छे दिनों वाले छप्पन इंची की पालकी ढोई थी। नोटबंदी की हिमायत में फिदायीन बना भी यही घूमा था-परसेंट और परसेंटेज पॉइंट में अंतर न समझने के बावजूद रात 12 बजे जीएसटी के लिए संसद में बजे घंटे को बाद में यही बजाता फिरता रहा था।

यही था जो कोरोना दौर में थाली, लोटा, बाल्टी बजाने, दिए मोमबत्ती जलाने और न जाने कौन से नक्षत्र में पांच मिनट तक थाली बजने से उत्पन्न हुई झंकार से कोरोना के मर जाने की अमिताभ अंकल की अद्भुत वैज्ञानिक खोज को आइंस्टीन के बाद की सबसे बड़ी वैज्ञानिकता साबित करने में लगा था।

कोरोना ने इसके बाजे बजा दिए हैं-

अर्थव्यवस्था रसातल के गहरे घनेरे अँधेरे में पहुँच गई है और ज्योति के कोसों पते चलते नहीं है।

बेटे-बेटियों की रोजगार संभावना तो तेल लेने गयी खुद की नौकरी और काम धंधा आफत में फँसा है। ईएमआई चुकाने के लिए धेला नहीं है। दुकान और मकान के किराए चुकाने और खर्चा निकालने में नानी याद आ रही है।

कोरोना के डर से ज्यादा डर बीमार पड़ गए तो इलाज के पांच लाख कहाँ से लायेगे का है।

आदि, आदि, आदि!

ऐसे में भी अब ये ग्रेट इण्डियन मिडिल क्लास खुद तो लडऩे से रहा। मजदूर किसानों और वैकल्पिक नीतियों के लिए लड़ रहे वाम लोकतांत्रिक जमातों और इंसानों की लड़ाई में जुडऩे से रहा। तो ?

तो ये कि अब उसे एक शिलाजीत बाबा की तलाश है। इनमें से कुछ को प्रशांत भूषण में वे नजर आने लगे हैं।

ठंड रखो वत्स, राजा विचित्रवीर्य का वंश चलाने वेद व्यास और दशरथ की रानियों को खीर खिलाने श्रृंगी ऋषि महाभारत और रामायण में ही आते हैं। असली दुनिया में लड़ाई खुद ही लडऩी पड़ती है। जब पानी गले-गले तक आ जाता है तो डूबने से बचने के लिए खुद के ही हाथ-पाँव चलाने पड़ते हंै।

चलिए बहुत कहासुनी हो गई। अब राहत इंदौरी साहब की गजल के तीन शेर समाद फरमाइये-

न हम-सफर न किसी हमनशीं से निकलेगा

हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा ।

बुज़ुर्ग कहते थे इक वक्त आएगा जिस दिन

जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा ।

गुजिश्ता साल के जख्मों हरे-भरे रहना

जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा ।

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