
मिथ्या को कब पहचानोगे
पल पल जिसको सत्य समक्षते रहे
सीने से चिपकाए रहे
वही छल की पाठशाला थी।
प्रभु का आमंत्रण है लीला दिखलाने का
पर मन भटक रहा है खेल खिलोनों मे।
अब निकलो भ्रम से
राह बड़ी पथरीली है
दुर्गम वन है
हर ओर प्रलोभन हैं।
पर सूदूर कहीं अविरल निर्मल धारा है
तकती राह तुम्हारी,लेने को आलिंगन मे।
राकेश श्रीवास्तव






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