लोकसदन का वैबनार: देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं कादंबनी, नंदन के अवसान पर विमर्श व काव्य गोष्ठी संपन्न

कोरबा।कोरोना काल में ऑनलाइन काव्य गोष्ठी की कड़ी में द्वितीय काव्य सम्मेलन के साथ देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं कादंबनी नंदन के अचानक बंद हो जाने अवसान पर दैनिक लोकसदन के साहित्य मंच द्वारा विमर्श किया गया, इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न प्रांतों से रचनाकार उपस्थित हुए, सभी ने अपनी रचनाओं का काव्य पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री जफर हसन ने बखूबी निभाई, कार्यक्रम की शुरुआत आशा आजाद के द्वारा सरस्वती वंदना से की गई उसके बाद आशा किरण मेहर जी ने रोला छंद
में अपनी रचना “शिक्षा का सोपान हमें शिक्षक बतलाते” तथा भारतीय जवानों को समर्पित अपनी कविता प्रस्तुत कर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया,अंजना सिंह ने नारी पीड़ा उकेरती अपनी रचना-“दर्द को अपने किसे दिखलाऊं मेरे दर्द को जख्मी बनाकर उनको सुकून मिलता है” सुनाया,तो श्रीया धपोला ने बाल मजदूरी पर केंद्रित रचना-“पर कतर दिए टकटकी लगाये देखता है बचपन”सुनाया,लखनऊ से उपस्थित राकेश श्रीवास्तव ने कादम्बिनी तथा नंदन पत्रिका के बंद हो जाने पर शोक जताते हुए अपनी रचना “किताबों का होना कुछ इस तरह हो गया है उनका पता चलता है उनके बंद हो जाने के बाद।”प्रस्तुत किया तो प्रभात जी ने “कोई करिश्मा हो और फिर से लौटे बचपन”कविता सुनाई।युवा कलमकार खुशी रॉय ने-“इश्क तो मुकम्मल है तब से जब से खुदा ने इसे बनाया था” कविता सुना कर आज की युवा पीढ़ी को इश्क के मायने समझाएं तो वहीं घनश्याम तिवारी ने प्रणय निवेदन पर अपनी रचना “यूं ही बिंदास रहो प्यार में रूठा ना करो” प्रस्तुत कर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया डॉक्टर ममता श्रीवास्तव(सरूनाथ) ने कादम्बिनी तथा नंदन पत्रिका के संपादन के बंद होने पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कहीं ना कहीं उत्कृष्ट लेखन की कमी और पाठक वर्ग की उदासीनता बहुत बड़ा कारण है इन पुस्तकों के बंद होने के पीछे उन्होंने एक सुझाव भी रखा कि हर घर में अखबार के साथ-साथ कुछ हिंदी पत्रिकाएं भी आनी चाहिए, जिनसे घर के बच्चों को, युवा पीढ़ी को किताब पढ़ने की आदत पड़े और एक अच्छे संस्कार की नींव रखी जा सके। उन्होंने अपनी कविता “वक्त के साथ रंग बदलती है जिंदगी “तथा “आज का आदमी” सुना कर सभी को बचपन के दिनों की याद दिलाई तो कार्यक्रम की अगुवाई कर रहे लोकसदन के संपादक सुरेशचंद्र रोहरा ने अपनी पुस्तक “काले जूते सा मुंह” के पृष्ठ नंबर 44 से कविता के कुछ अंश “हंसने लगे कितनों के चेहरे पर मुस्कान खिलने लगे काले जूते से मुंह को देखकर कितने ही भक्त गिरने लगे” सुनाकर समां बांधा तथा “स्वाद” नामक लघु कथा के माध्यम से दिखावा की संस्कृति पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि महोदया ने गणेश स्तुति के साथ गजल प्रस्तुत किया तथा एक अच्छे आयोजन के लिए सभी रचनाकारों को एवं संयोजक और संपादक मंडल को बधाई दी। संचालक इंजी. रमाकान्त श्रीवास ने बडे ही मनोरम अंदाज में छत्तीसगढ़ी भाषा में मां के वात्सल्य को प्रस्तुत किया जो अपने बच्चे को प्रेरित करती है “चल उठ जाग जा मोर दुलरवा बेटा” कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जफर साहब ने अपने शेरों “तेरे जन्नत कर रहे हैं, फरिश्ते क्या बगावत कर रहे हैं, सुना कर एक अलग ही समा बांध दिया। सभा की समाप्ति पर संपादक महोदय ने सभी को बधाई दी, उन्होंने कहा कि बहुत ही आनंदित करने वाला कार्यक्रम, ऐसे कार्यक्रम आगे भविष्य में भी होते रहने चाहिए और उन्होंने सभी को आश्वस्त किया कि उनके अखबार के माध्यम से साहित्य की अनवरत सेवा चलती रहेगी। कार्यक्रम की समाप्ति में खुशी रॉय ने गिटार पर” हे शिवाय संकरा” की धुन बजाकर कार्यक्रम की समाप्ति की।

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