मौन साधक, मित्र मेरा- सुरेशचंद्र रोहरा- डॉ टी महादेव राव

चारों तरफ से हरे भरे और घने जंगलों से आच्छादित छत्तीसगढ़ अ हसदेव नदी के पावन तट पर बसी देश की ऊर्जाधानी कोरबा यूँ तो अपनी अनेकों कोयला खादानों एवं बिजली के कल – कारखानों के नाम से मशहूर है। लेकिन इस रत्नागर्भा वसुन्धरा को अपनी मेहनत , लगन और निष्ठा से आज के इस मुकाम तक पहुँचाया है यहाँ के आम मेहनत कश्मीर लोगों ने । जहाँ एक तरफ यहाँ के श्रमिकों , किसानों , अधिकारियों , कर्मचारियों एवं शासन प्रशासन , व्यापार , व्यवसाय के लोगों ने इसके विकास पथ में अपनी भूमिका निभाई है वहीं इसकी सांस्कृतिक परंपरा और विरासत को समृद्ध करने का कार्य यहाँ के विविध कला क्षेत्रों में साधनारत कलासाधकों ने किया है । ये अलग बात है कि क्षेत्र के कलात्मक विकास में सक्रिय रहे कलासाधकों में कुछ चुने हुए और मुट्ठी भर लोगों के ही नाम कोरबा के जनमानस के सामने आ पाएँ हैं। आज भी ऐसे कई कलमसाधक हैं जो प्रचार प्रसार को किनारे रख एक के बाद एक अनगिनत सृजन किए जा रहे हैं। और वह भी किसी लालसा या विशेष ईच्छा के बिना सिर्फ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी और सर्जनात्मकता के प्रति अपने अनुराग के कारण । वैसे तो कोरबा साहित्यजगत एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेकानेक बुद्धिजीवी साधनारत हैं लेकिन उनमें से एक कलम के साधक ऐसे हैं जिनकी जुबान नहीं सिर्फ और सिर्फ कलम बोलती है! अख़बारों में बेहतरीन संपादकीय लेखों , काँलम लेखों , देश की नामी गिरामी पत्र पत्रिकाओं में विशेष लेखों , कई प्रकाशित पुस्तकों – संकलनों के रूप में …. और कोरबा साहित्य एवं पत्रकारिता जगत को
नई दिशा और दशा प्रदान करने वाले वह मौन कलम साधक हैं प्रख्यात गाँधीवादी , निष्पक्ष एवं बेबाक पत्रकार, साहित्यकार , हमारे दैनिक लोकसदन के संपादक सुरेशचंद्र रोहरा … ।


कुछ लोग कुछ न करते हुए भी अपनी पीठ थपथपाने और प्रचार-प्रसार में इतने माहिर होते हैं कि उनकी साहित्यिक प्रतिभा से अधिक हमें उनके स्वयं को प्रचारित करने की प्रतिभा का कायल होना पड़ेगा।  लेकिन एक और तरह के व्यक्ति होते हैं दुर्लभ किस्म के। ये शख्स  केवल अपने काम से मतलब रखते हैं। साहित्य सृजन हो या पत्रकारिता या स्तंभ लेखन या लेखन संबंधी कोई अन्य कार्य भी क्यों न हो, बस लगे रहते हैं - कृष्ण के द्वारा भगवदगीता में कहे गए कर्म के सिद्धांत को अपनाते हुए, फल की आशा न करते हुए, पूरी सहनशीलता, शांति और प्रतिबद्धता के साथ अपना काम करते हुए।

  आज मैं अपने ऐसे ही  मित्र के विषय में आपको बताने जा रहा हूँ।  इस तरह उनके बारे में लिखना भी उन्हें  भाता नहीं, क्योंकि वह कर्मयोगी है, कलम का श्रमिक है और कारीगर है कागजों  का। यह मेरी ही जिद है कि उस दोस्त रूपी, छोटे भाई के बारे में लिखूँ। आज जबकि ठीक से ककहरा भी न लिख पाने वाले लोग स्वयं को साहित्यकार, रचनाकार, कलमकार  और पता नहीं क्या-क्या कार कहने में जरा भी संकोच नहीं करते, ऐसे में भाई का जिक्र ज़रूरी लगता है मुझे।

  बात शुरू करता हूं सन 1986 से।  मुझसे बालको में मिलने कोरबा से एक नवजवान आया। बी. ए . हिंदी का छात्र, साथ ही स्वतंत्र  पत्रकारिता करता हुआ। साहित्य के प्रति समर्पण की भावना लिए कहानियां, कविताएं, लेख लिखा करता था।  जो छपती भी थीं। मैं एक लेखक के रूप में मिला उस अति शालीन, सुसंस्कृत  और युवा साथी से। पहली ही मुलाक़ात में उसका “भैया” संबोधन से इस तरह बांध लिया कि आज भी मेरे लिए उसके मुंह से वही संबोधन निकलता है, जिसे  सुनकर बहुत खुशी होती है।  उसका अपनापन इतने सालों बाद भी कम नहीं हुआ।  हम मिलते रहे, लिखते रहे बिना किसी गुटबाजी के।  उस समय काफी चलती थी गुटबाजी कवियों और लेखकों में। हम लोग  अपने काम से काम रखते ।  हफ्ता दस दिन में मिलना, कुछ सार्थक चर्चा।  उसने अपने युवा मित्रों की एक मंडली बनाई, जो साहित्य के छात्र थे उसी की तरह लेखन का काम भी करते थे।  यह अलग बात है कि जितना सफल मेरा मित्र हुआ, वे उतने न हो सके।  बाद में सभी अपने अपने काम धंधे में लग गए।  मेरे मित्र छोटे भाई ने जो कलम का हाथ थामा आज उसकी उम्र 53 वर्ष की हो गई है। कलम  का हाथ थामे हुये ही नई मंज़िलें पा रहा है, नए शिखर छू रहा है। ईश्वर उसे दीर्घायु दे,  और भी अनेक सफलताएं उसकी झोली में डाले यही कामना है।

  यह जो 1987 का नव लेखक था, आज पत्रकारिता का पर्याय बन चुका है।  दैनिक, मासिक, पाक्षिक पत्रों, वेब पोर्टल , दूरदर्शन,दिल्ली  प्रेस की पत्रिकाओ  आदि में अपनी पत्रकारिता के जौहर पर दिखाता ही है, साथ ही व्यंग्य स्तम्भ लेखन,  धारावाहिक उपन्यास लेखन,  सामयिक विषयों पर गहन चिंतन के साथ संपादकीय  और साथ साथ  कविताएं, कहानियां भी उसी प्रभावोत्पादकता के साथ लिखता है. जिस प्रभावी ढंग से पत्रकारिता करता है।  इस व्यक्ति में जो सहनशीलता है,  सामंजस्य का भाव है, क्षमा गुण है - वह श्लाघनीय है।  उन सब के पीछे मित्र का "गांधी दर्शन" पर अटूट  विश्वास का होना है। गांधीश्वर  पत्रिका का संपादक है ही, साथ ही पिछले दस वर्षों से अधिक समय से कोरबा से प्रकाशित लोकप्रिय  दैनिक लोकसदन का  सफल, सक्षम  और योग्य संपादक भी है। जी हाँ... मेरे छोटा भाई समान इस मित्र का नाम है सुरेशचंद्र रोहरा। अब तक इनकी पंद्रह से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन हुआ, जिनमें उपन्यास, कविता, व्यंग्य, गांधी दर्शन आदि शामिल हैं। कोई विधा ऐसी नहीं जिनमें इन्होंने कलम न चलाई हो।  यही नहीं युवावस्था में (वैसे भी आज भी युवा हैं मेरी तुलना में) साहित्य साधना समिति का गठन कर सामयिक साहित्य चर्चाएं, संगोष्ठियाँ,  संध्या पर नुक्कड़ नाटक (दूसरी संस्थाओं से मंगाकर)  आयोजन करते रहे।  साहित्यिक माहौल का निर्माण उस समय भाई के कारण ही कहूंगा कोरबा,छत्तीसगढ़  में हुआ था।  उस समय के वरिष्ठ रचनाकार केवल खेमों में बटे हुए थे।  केवल कविताएं, गजलें, मुक्तक, रुबाइयां लिखकर गोष्ठियों  में सुनाते अलग अलग संस्था समितियों की बैठकों में।   इन रचनाकारों में भाई  सुरेश शामिल न थे, क्योंकि मेरा भी अनुभव रहा इन वरिष्ठों के साथ कि कविता के अलावा अन्य किसी भी विधा में लिखने वाले इनके लिए वर्जित हैं, अछूत हैं पता नहीं क्यों। मैं भी भाई सुरेश रोहरा की तरह इन समितियों से दूर था।  

मैं 1990 में बालको से आ गया, लेकिन हमेशा संपर्क में रहने वाले भाई सुरेश रोहरा अपनी गतिविधियों से लगातार अवगत कराता। अपनी प्रकाशित पुस्तकें, रचनाएँ भेजता, जिस पर हम चर्चा करते। बीच में एक बार वह विशाखापटनम भी आया, प्रत्यक्ष मुलाकात में लंबी चर्चा चली। मतलब उनकी हर खबर से मैं हमेशा वाकिफ रहा।

  इस बीच  एक बात दिल में बुरी तरह चुभी  कि  34 वर्षों से लेखन से जुड़े भाई सुरेश चंद्र रोहरा जी का कोरबा के तथाकथित साहित्यकारों की सूची में नाम लेने से कुछ बुजुर्ग साहित्यकार मे घबराहट हैं या उनके कृतित्व को नकार रहे हैं।   यह सब लिखने के पीछे भी एक कारण है  मैं कुछ ऐसे कवियों को जानता हूं  जिनको शब्दों के सही अर्थ और वर्तनी तक का पता नहीं, वे इन बुजुर्ग साहित्यकारों की नजर में महान कवि हैं। तू मुझे सराह , मैं तेरी तारीफ करूंगा  वाली बात हो गई।

मेरा कथन है कि जिस कोरबा के साहित्य के इतिहास की चर्चा जोरों पर है, काम भी किया जा रहा है, उसमें चंद रचनाएं करने वालों का जिक्र है। कई ऐसे हैं जिनकी कोई भी पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई। कई ऐसे थे जिन्होंने आदर्शवाद केवल कविताओं तक सीमित रखे हुए थे वास्तविक जीवन में ऐसे आदर्श उनके लिए नहीं रहे। जिस व्यक्ति ने इतनी सारी पुस्तकें, इतनी सारी सभी विधाओं की सामग्री लिखी, बहुत सारा साहित्य वह भी स्तरीय लिखा ऐसे व्यक्ति का जिक्र न हो पाना हमारी सोच की संकीर्ण मानसिकता को उजागर करती है। मेरा तो मानना है यदि कोरबा का साहित्य के इतिहास लिखा जाएगा तो भाई सुरेश रोहरा का नाम एक महत्वपूर्ण नाम के रूप में लिखा जाना ना केवल अनिवार्य है बल्कि समय की मांग है।
( डाक्टर टी. महादेव राव हिंदी और तेलुगु के विख्यात लेखक है)

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