मूर्धन्य साहित्यकार पत्रकार राकेश अचल जी का सप्ताह का व्यंग्य- जी हाँ ! हम सत्याग्रही हैं



भगवान जो करता है सोच-समझकर करता है .ये कोरोना भी भगवान की ही कृपा है [बकौल श्रीमती निर्मला सीतरमन ]कृपा को ‘एक्ट’ कहने में हमें संकोच होता है. भगवान का हर ‘एक्ट’, कृपा ही माना जाए तो आनंद ही आनंद समझिये .’एक्ट आफ गॉड ‘ की वजह से राष्ट्रपिता [प्रथम] की 150 वीं जयंती धूमधाम से नहीं मनाई जा सकी .[वैसे भी धूमधाम कौन करना चाहता था ?]साल भर चलने वाले कार्यक्रम छह महीने ही चल पाए ,बाक़ी के छह महीने कोरोना ने खा लिए .
राष्ट्रपिता [प्रथम] की डेढ़ सौवीं जयंती मनाने का नेतृत्व राष्ट्रपिता [द्वितीय] को करना था लेकिन वे खुद 65 साल के ऊपर वाले होने के कारण कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करते हुए घर से बाहर नहीं निकले .वर्चुअली उनसे जो हो सकता था ,सो उन्होंने किया. प्रथम के लिए द्वितीय, समारोह के आखरी दिन निकले और प्रथम की समाधि पर पहुंचे ताकि कोई उल्हाना न दे .आजकल लोगों के पास कोई काम तो है नहीं सो उल्हाना ही देने लगते हैं ,बैठे-ठाले .महात्मा के प्रति असल समर्पण दिखाया भारतीय मीडिया ने .
राष्ट्रपिता प्रथम की जयंती की पूर्व संध्या पर कांग्रेस के नेताओं ने पदयात्रा और सत्याग्रह कर अपने गांधीवादी होने का प्रमाण दिया तो दूसरे दिन मीडिया ने दिन भर बूंदगढ़ी में घुसने की कोशिशें करते हुए सत्याग्रह के अस्त्र का इस्तेमाल किया .गोदी मीडिया वाले हालांकि बूंदगढ़ी में तो नहीं घुस पाए लेकिन टीआरपी पर आगे-पीछे होते रहे .इतनी उछल-कूद बेचारों ने न सुशांत राजपूत के लिए की न कंगना रानौत के लिए .किसानों-मजदूरों के लिए तो करने का सवाल ही नहीं .उल्टे इस ऐतिहासिक सत्याग्रह की वजह से किसान आंदोलन की हवा निकल गयी .अब लगता है कि मीडिया का सत्याग्रह कहीं किसान विरोधी तो नहीं था !
हमारे प्रोफेसर परसोत्तम ठीक ही कहते हैं कि -‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी ‘नहीं है.गांधी तो ‘मजबूती का नाम हैं’.मीडिया ने ये मजबूती दिखाई .
मुझे अफ़सोस होता है कि कांग्रेस वाले अपने शीर्ष नेता की धक्का-मुक्की को बड़ी ही आसानी से पचा गए .पहले ऐसा नहीं होता था. पहले यदि ऐसी घटना हुई होती तो पूरे देश की जेलें इस घटना के विरोध में भर दी जातीं .’भर तो अब भी जातीं लेकिन कोरोना की वजह से हमने नहीं भरीं’ हमारे पड़ौस में रहने वाले मनसुख के चचेरे भाई तनसुख ने सफाई दी .तनसुख जन्मजात कांग्रेसी हैं चूंकि कांग्रेसी हैं इसलिए गांधीवादी पहले हैं .गांधीवादी खानदानी सत्याग्रही होता है .इसलिए हमने तनसुख की बात चुपचाप मान ली ,कोई जिरह नहीं की.कोई सवाल नहीं,कोई कुतर्क नहीं .
सच कहूँ की देशवासियों को महात्मा गाँधी के डेढ़ सौवें जन्मवर्ष में पूरे साल सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन चलाना चाहिए थे .मौका भी था और दस्तूर भी पूरा हो जाता .लेकिन देशवासी ये मौक़ा चूक गए .सबने मिलकर कोरोना का बहना बना लिया .देशवासी नहीं जानते की सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन आज की सबसे बड़ी जरूरत है .सत्याग्रह के लिए आदमी का अहिंसक होना जरूरी होता है. हिंसा का काम आजकल सरकार करती है .नौकरी मांगों चाहे भत्ता सरकार मांगने वालों पर लाठियां बरसा देती है .लाठिया बरसाना नौकरी और भत्ता देने से कहीं ज्यादा आसान काम है .हमारी सरकारें इसीलिए आसान काम करती हैं .राष्ट्रपिता प्रथम की अब देश को जरूरत भी क्या है.अब हमारे पास राष्ट्रपिता द्वितीय जो हैं. प्रथम अर्धनग्न रहते थे,द्वितीय सूट-बूट में रहते हैं. प्रथम क्लीनशेव थे ,द्वितीय के पास गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर जैसी लम्बी और धवल दाढ़ी-मूंछें हैं .प्रथम ने 2388 दिन जेल में काटे थे द्वितीय ने आपातकाल के 19 महीने जेल में बिता दिए .प्रथम के पीछे पूरा देश था,द्वितीय के पीछे पूरी दुनिया है .प्रथम केवल इंग्लैण्ड,अफ्रिका ही जा पाए थे ,द्वितीय ने पूरी दुनिया घूम ली है .प्रथम रेल की तृतीय श्रेणी में यात्रा करते थे,द्वितीय ने छह-सात हजार करोड़ का आधुनिक विमान अपने लिए खरीदा है .आखिर दुनिया के सामने ये भी तो प्रमाणित करना है की भारत ने बीते सत्तर साल में जो नहीं किया वो बीते छह-सात सालों में द्वितीय ने कर दिखाया .
राष्ट्रपिता [प्रथम ] की 151 वीं जयंती पर मुझे राष्ट्रपिता द्वितीय की सादगी की बहुत याद आयी. प्रथम महामारी के मरीजों के बीच जाकर सेवा करते थे लेकिन द्वितीय डब्लूएचओ के निर्देशों का पालन करते हुए माहमारी के मरीजों से मीलों दूर हैं. उन्होंने आत्म स्नैम का अद्वितीय उदाहरण घर में कैद रहकर दिया है. वे बीते सात महीने से एकाध बार ही बाहर निकले,वो भी तब जब बहुत जरूरी हुआ .विदेश जाना तो उन्होने छोड़ ही दिया .ये कोई आसान काम नहीं है .वैसे भी राष्ट्रपिता प्रथम हों या द्वितीय कोई भी आसान काम करते ही नहीं हैं .
हमारे यहां सनातन परम्परा है कि द्वितीय अपने प्रथम के लिए कुछ न कुछ करता ही है. द्वितीय ने प्रथम के नाम पर देश में समग्र स्वच्छत्ता अभियान चलाया .60 करोड़ लोगों के लिए शौचालय बनवा दिए ,40 करोड़ बैंक खाते खुलवा दिए .भारत में मंदिर की सीधी चढ़ना और बैंक में खाता खुलवाना सचमुच बेहद कठिन था.अब आप दोनों काम घर बैठे ऑनलाइन कर सकते हैं ,कोई माई का लाल आपको न मंदिर में दर्शन करने से रोक सकता है और न बैंक में खाता खोलने से .अब खाते में रकम हो या न हो ये देखना आपका काम है द्वितीय का नहीं .प्रथम का तो बिलकुल ही नहीं .
लगता है कि आप प्रथम और द्वितीय को लेकर कुछ कन्फ्युजा रहे हैं ! अरे दादा प्रथम तो प्रथम थे ही द्वितीय को देश की 33 फीसदी जनता ने बनाया है .भक्तों ने उन्हें अवतार और राष्ट्रपिता बनाया है .राष्ट्रपिता बनने से पहले किसी बच्चे का पिता बनना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है. राष्ट्रपिता प्रथम के तो चार बच्चे थे ,लेकिन इस मामले में राष्ट्रपिता द्वितीय ने कंजूसी दिखाई ,शायद राष्ट्रहित आड़े आ गया होगा. बहरहाल राष्ट्रपिता भारत के गुजरात प्रांत से ही आते हैं. पहले राष्ट्रपति और राष्ट्र कवि भले बिहार से आये हों लेकिन राष्ट्रपिता और कहीं से आ नहीं सकते .गुजरात की मिटटी में राष्ट्रपिता बनने का अद्वितीय माद्दा है .
हम अपने पहले और दूसरे राष्ट्रपिताओं के प्रति शृद्धा से भरे हुए हैं .इसलिए चाहते हैं कि हमारी ही तरह पूरा देश शृद्धा से भर जाये.शृद्धा और भक्ति का बड़ा ही करीब का यानि अंतरंग रिश्ता है जहाँ शृद्ध होती है ,वहीं भक्ति भी होती है,ये प्रकांड विद्वानों को समझना चाहिए .भक्त होना कोई बुरी बात नहीं है .भक्तिभाव के अभाव में ही दूसरे राजनीतिक दल आज फजीहत का शिकार हैं .भक्त देश की पहली जरूरत हैं .शृद्धा और भक्ति से भरा समाज हर संकट से पार पा सकता है .कोरोना-बोरोना ऐसे समाज का कुछ नहीं बिगाड़ सकता .

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