दुलार तो छोटकी,
और बरकी के दुपट्टे में,
गिरना स्वभाविक था….
पर मंझली का क्या….???
वो तो लौकी-नेनुआ की,
लत्ती की तरह,
आँगन के खपरैल पर,
लतरती रही,पसरती रही….
मझली ग्रसित रही ताउम्र,
पूर्वाभास से,
खपरैल के जर्जर हालत से,
बाबूजी के जेब पर बढ़ते बोझ से,
सयानी होती दीदीया की आशाओं से,
बिगड़ैल भाईयों के गलत संगत से,
और सबसे ज्यादा,
अम्मा-बाबूजी के,
कई-कई दिनों तक ना सोने के,
बनते आसार से……
मंझली चिंतित रही पूर्वाग्रहों से,
सोचती रही!!खोजती रही,
घर में अरगनी बांधने के उपाय को,
अरगनी जहाँ लादा जा सकता था,
मन का बोझ और उधार के कर्ज को….
थोड़ी अजीब थी मंझली,
शायद तजुर्बे वाली बुढ़िया थी मंझली,,,
या फिर उसकी छठी इंद्री,
कुछ ज्यादा सक्रिय रहती है,
उसे ज्ञात रहता,
उसे सम्बल देना है,
छत व किवाड़ को,,,
लालटेन व डिबरी की,
मध्दिम लौ की तरह,
उसे भी बिखरना है,
गोबर से लिपे आँगन और ओसारे में….
मंझली कब बरकी से,
बड़ी हो गई,,
ना अम्मा जान पाई ना बाबा,,,
उसने नही मांगा कभी,
अपने हिस्से का आरक्षित दुलार,
वो खुशी से खाती रही,
पिछली रोटी बार-बार,
ध्यान ही नही गया,,,
कब मंझली,बेटी से,
बाबा की माँ व अम्मा की,
दादी बन बैठी,,,
पर उसने करीब से जाना है,
हवाई चप्पल का घिसना,
घिसकर टूटना व टूटकर,
बार-बार सिलना,,,
उसने जाना है,
टूटने और सिलने का दर्द…..
दो जोड़ी कपड़े में अमीर,
बनने की कला,
उसने खुद ही सीख ली,,,
पर एक बात मंझली,
जो समझना ही नही चाहती….
न जाने क्यों….
उसका बार-बार बड़बड़ाना,,
बुझाईल बाबा!बुझाईल!
यह क्यों उसके मुख से,
निकलता ही रहता,,
मंझली नही समझ पाती,,,,
और लतरने लगती है,
लौकी-नेनुआ की,
लत्ती की तरह,
अपने नए बसेरे पर,
अनगिनत सवालों को,
खोजती मंझली,
लतरती रही लौकी नेनुआ की,
हरियाली लिए,
घर के खपरैल पर….

प्रतिभा श्रीवास्तव अंश







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