
भारतीय संविधान निर्माताओं की आकांक्षा थी कि स्वतंत्रता के बाद भारत का शासन अपनी भाषाओं में ही चलें ताकि आम जनता शासन से जुड़े रहे और समाज में एक सामंजस्य स्थापित हो जिससे सबकी प्रगति हो सके। इसमें कोई शक नहीं है आज की हमारा भारत प्रगति के पथ पर अग्रसर नहीं है, बहुत तेजी से प्रगति के पथ पर अग्रसर है, लेकिन अगर हमारा कानून व्यवस्था हमारे अपने क्षेत्रीय और हिंदी भाषा में मिलने लगे तो और तेजी से प्रगति हम करने लगेंगे । प्रगति के पथ पर भारत अग्रसर है ,लेकिन आपको बता दें दोस्त की यह भी सच है कि इस प्रगति का लाभ देश की आम जनता तक पूरी तरह पहुंच नहीं पा रहा है। अगर हम ध्यान से देखें तो हम पाते हैं कि शासन को जनता तक उसकी भाषा में पहुंचने में अभी तक हमें कामयाबी नहीं मिली है। जब तक क्षेत्रीय भाषाओं और हिंदी भाषा में आम जनता तक शासन की पहुंच नहीं होगी तब तक किसी भी क्षेत्र में देश की बड़ी से बड़ी उपलब्धि और प्रगति का कोई मूल्य नहीं रह जाएगा। वैसे एक सुखद खबर यह है कि जब 2011 की जनगणना हुआ था तब हमने देखा कि भारतीय भाषाओं के आंकड़ों के मुताबिक 43.63 फीसदी लोगों की मातृभाषा हिंदी थी, जबकि 2001 में यह आंकड़ा 41.63 फीसदी लोगों की मातृभाषा हिंदी थी। इस तरह दोस्त 2001 से 2011 के बीच देश में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या ढाई फ़ीसदी से भी ज्यादा बढ़ी है ।
देखे तो भाषा जो हमारे समाज की प्रतिबिंब होती है , यदि भाषा संरक्षित व सुरक्षित नहीं रहेगी तो प्रतिबिंब की कल्पना नहीं की जा सकती है। आज दोस्त लुप्त होती जा रही भाषाओं पर सिर्फ चिंता व्यक्त करने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है बल्कि सरकार और हम सभी को इसके सरंक्षण के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए। इसके लिए इन भाषाओं को मुख्यधारा में लाना होगा, इन भाषाओं पर अधिक से अधिक हमें रिसर्च करना होगा, स्कूली स्तर पर इन्हें बढ़ावा देना होगा, साथ ही दोस्त रोजगार परक भी हमें अपनी भाषा को बनाना होगा, व वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए इन्हें हमें तैयार करना होगा तथा इन भाषाओं का सरलीकरण भी करना होगा यह सब करके हम लोग और सरकार मिलकर स्थानीय भाषाओं को बचा सकते हैं। जैसा कि हम सभी ने देखा कि उत्तर प्रदेश राज्य जहां जन्म लिए कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र इसी उत्तर प्रदेश में जहां अधिकतर लोग हिंदी भाषी ही है फिर भी पिछले महीने जो बोर्ड के परीक्षाओं का परिणाम आया जिसमें हमने देखा कि अधिकतर बच्चे अपने हिंदी भाषा में ही फेल हो गए, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जहां इतने महान साहित्यकार कवि और लेखक जन्म लिए हो वहां के बच्चे हिंदी भाषा में ही असफल हो गए, कहीं ना कहीं आज इसका मुख्य कारण वैश्वीकरण ही है । आज लोग अंग्रेजी भाषा को स्टेटस के रूप में समझने लगे हैं, कौन कितना अच्छा अंग्रेजी बोलता है इस बात से किसी के व्यक्तित्व और ज्ञान का कुछ लोग आकलन करते हैं जोकि सबसे बड़ी मूर्खता है।
पिछले वर्ष में ही संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 2019 को देशीय भाषाओं के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रूप में घोषित किया है। जो कि इस अंतरराष्ट्रीय वर्ष के तहत विभिन्न आयोजनों हेतु यूनेस्को संगठन के रूप में कार्य किया। जैसा कि हम जानते हैं कि वर्तमान में विश्व की लगभग 6700 भाषाओं में से 96 प्रतिशत भाषा, विश्व की मात्र 3 प्रतिशत जनसंख्या द्वारा ही बोली जाती है।
आंकड़ों के अनुसार तो अनुमान लगाया जा रहा है कि विश्व की आधी से अधिक भाषाएं वर्ष 2100 तक विलुप्त हो जाएगी।
दोस्त 2019 को स्वदेशी भाषाओं का वर्ष घोषित करने के पीछे इसका कारण या उद्देश्य यही था कि स्वदेशी भाषाओं के नुकसान की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया जाए और स्वदेशी भाषाओं को संरक्षित पुनर्जीवित और बढ़ावा देने तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया जाए।
हमारा भारत विविध संस्कृति और भाषा का देश रहा है। देखा जाए तो साल 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 भाषाएं बोली जाती थी लेकिन हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत ने फिलहाल 1365 मातृभाषाएं हैं, जिनका क्षेत्रीय आधार भी अलग-अलग है। भाषा का विलुप्त होने का कारण मुख्य रूप से पलायन ,जनसंख्या ,आधुनिक शिक्षा, तकनीकी का प्रसार, अंग्रेजी विकल्प के रूप में व भाषा में कलिष्ठता होती है। आज देखे तो भाषाओं का विलुप्तीकरण दोस्त केवल भारत का ही विषय नहीं है बल्कि यह विश्व की समस्या है आज, हमारे यहां या अन्य देशों में जिस तरीके से अंग्रेजी का बोलबाला बढ़ा है उससे कई देशों की स्थानीय भाषा इतिहास बनती जा रही है। चुकी आज अंग्रेजी तथा अन्य व्यवसायिक भाषाओं का प्रचलन बढ़ा है तथा सभी एक विकल्प भी उपलब्ध करा रही है जिससे एक बड़ी आबादी अपनी स्थानीय भाषाओं को छोड़कर इनके तरफ आकर्षित हो रही है। यही नहीं दोस्त अब चाहे गांव हो या शहर हर तरफ व्यवसायिक शिक्षा का स्तर बढ़ा है, और यह तो हम देख ही रहे हैं कि आज इस वैश्वीकरण के दौर में लोग उसी भाषा का चुनाव कर रहे हैं जो उनके रोजगार के लिए भी लाभदायक हो। हमारे यहां एक कहावत भी है कि ‘ कोस- कोस पर पानी बदले और 3 कोस पर वाणी’अर्थात दोस्त मेरा कहने का मतलब है कि प्रत्येक 1 कोस पर पानी की प्रकृति बदल जाती हैं ठीक उसी प्रकार 3 कोस पर भाषा भी बदल जाती हैं।इसीलिए हम सभी को और सरकार को इस महत्ता को समझते हुए विश्व की कोई भी भाषा चाहे वह कितनी भी पुरानी क्यों ना हो उसे संरक्षित किया जाना ही चाहिए। दोस्त भाषा किसी भी सभ्यता व संस्कृति तथा उसके रहन-सहन की पहचान होती है, आप ही सोचो अगर किसी समुदाय की भाषा ही न बचे तो उसके बारे में जानना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव हो जाता है। ईसाइयों और यहूदियों के धर्म ग्रंथों की मूल भाषा हिब्रू थी जो अब इस्तेमाल में नहीं है, इसी तरह पाली, प्राकृत सहित कई भाषाओं ने अपना अस्तित्व आज खोया है । इन्हें संरक्षित नहीं करने का ही परिणाम है कि उनके मूल ग्रंथों में क्या कहा गया यह जानना बड़ा ही मुश्किल है।
विक्रम चौरसिया






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