भारत के दो महात्मा : गाँधी और शास्त्री

सत्य अहिंसा के मन्त्रों से जीना सबको सीखा गये ,
जाते जाते जन-जन में आजादी का ज्योत जगा गये ,
हम हों स्वतंत्र का नारा तुमने घर घर तक फैलाया,
कर्तव्य मार्ग पर चलने का पाठ तुमने सिखलाया,
तख़्त-ओ-ताज पाकर भी आम आदमी रहे,
तुम्हारी कोशिश थी हर जगह सादगी रहे,
करके दिखा दिया कि मुल्क साथ आएगा,
शर्त मगर एक कि ईमान लाजमी रहे…..
जय जवान -जय किसान ,
रघुपति राघव राजा राम !!!

2 अक्टूबर भारतीय संस्कृति का वह पवित्र दिन जिस दिन ऐसे दो महामानव ने इस पृथ्वी पर जन्म लिया जिससे न केवल भारत, बल्कि पूरा विश्व कृतार्थ हो गया। यह महामानव हैं अहिंसा के पुजारी मोहनदास करमचंद गांधी और ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देने वाले लालबहादुर शास्त्री।

गांधी औऱ लालबहादुर शास्त्री, भारत के दो महान सपूत थे। जन्म एक ही दिन यानि दो अक्टूबर। एक जिसने सत्य -अहिंसा की भारतीय परंपरा की ताकत दुनिया को दिखाई, नैतिक रुप से सोते भारत को जगाया। दूसरे लाल बहादुर शास्त्री यानि देश के दूसरे प्रधानमंत्री और ईमानदारी की मिसाल कायम करने वाले पहले मंत्री। जिन्होंने देश को बताया कि जोश के साथ भी किस तरह से होश कायम रखकर दुश्मन को निपटाया जाता है, शराफत को कमजोरी समझने वालों को कैसे करारी शिकस्त दी जाती है । इसमें कोई संदेह नहीं है कि इतिहास में किसी भी महापुरुष का नाम बिना किसी योग्यता, कठिन परिश्रम या त्याग के दर्ज नहीं होता पर यह भी सत्य है कि एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन समय समय पर अनेक लोग अपने ढंग से करते हैं।

गांधीजी को राजनीतक संत कहना उनके दर्शन को सीमित दायरे में रखना है। मूलतः गांधी जी एक सात्विक प्रवृत्ति के धार्मिक विचार वाले व्यक्ति थे। निश्छल ह्रदय और सहज स्वभाव की वजह से उनमें उच्च जीवन चरित्र निर्माण हुआ। यह समझ से बिल्कुल परे है कि गांधीजी के विचारों को केवल अहिंसा के संदर्भ में ही क्यों महत्व दिया जाता है । क्या इसलिए कि आज के समय में जब चारों ओर हिंसात्मक घटनाएं नजर आ रही हैं, हर कोई स्वयं को असुरक्षित अनुभव कर रहा है ? यूं भौतिक (दैहिक तथा पदार्थगत) स्तर की हिंसा मानव समाज में सदा से ही रही है, परिवार के भीतर, परिवार-परिवार के बीच, विभिन्न समुदायों के बीच, और देशों के बीच। किंतु आतंकवाद के रूप में एक नये प्रकार की हिंसा का उदय हालिया वर्षों में हुआ है, जिससे हर कोई डरा-सहमा-सा दिखता है । जिस
प्रकार की हिंसा आज देखने को मिल रही है वह अमीर-गरीब, राजनेता, उच्चपदस्थ प्रशासनिक अधिकारी, और आम आदमी सभी में असुरक्षा की भावना पैदा कर रही है। ऐसी स्थिति में हिंसात्मक घटनाओं की निंदा और अहिंसा की अहमियत पर जोर डालना ‘फैशनेबल’ बात न बन जाय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए। यह भी सोचनीय है कि क्या मानव समाज के समक्ष अन्य प्रकार की अनेकों समस्याएं नहीं हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए और जिनके संदर्भ में गांधीजी के विचारों की चर्चा की जानी चाहिए ? गांधीजी को शेष विश्व अहिंसा से जोड़ता है, क्योंकि उसके लिए व्यापक होती जा रही संगठित हिंसा एक गंभीर समस्या बन चुकी है । लेकिन क्या हम देशवासियों के लिए भी गांधी मात्र अहिंसा तक सीमित हैं ? क्या उनके समग्र चिंतन-मनन की कोई महत्ता नहीं है ? क्या उनके विचारों के अनुरूप आचरण अपनाने – अंशतः ही सही, कुछ तो – पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए ? इस देश के लिए भी हिंसा चिंता का विषय अवश्य है पर उसके आगे भी बहुत कुछ है जो कम मायने नहीं रखता है । काश देशवासी कुछ तो गांधीजी को सम्मान देते, केवल शब्दों में नहीं आचरण में भी, अपनी करनी में भी । गाँधी जी अहिंसा के अतिरिक्त कई बातों को महत्व देते थे और उन पर स्वयं अमल करते थे, न कि दूसरों को महज उपदेश भर देते थे:- स्वच्छता,शारीरिक श्रम,सामाजिक समानता,कमजोर का शोषण न हो,आर्थिक विषमता कम हो ये सभी गाँधी जी के आदर्श सिद्धांतों में शामिल थे।

गाँधी जी और शास्त्री जी की कोई तुलना नहीं है, पर जितना देश के प्रति प्रेम गाँधी में था उतना ही शास्त्री जी में भी । पर जैसा कि अक्सर होता है कि एक बड़े पेड़ की छाया में छोटा पौधा कहीं गुम हो जाता है। पर हमने तो एक विराट व्यक्तित्व को ही छुपा दिया । यदि शास्त्री जी 2 अक्टूबर की जगह अन्य किसी और दिन पैदा हुए होते तो शायद जय जवान और जय किसान का नारा देने वाले इस महापुरुष को हम किसी दिवस के रूप में मानते। पर 2 अक्टूबर को हम इस महापुरुष को याद करना भी भूल जाते है। ऐसे में मुझे उनकी यह बात बरबस याद आ जाती है जो उन्होंने स्वयं के बारे में कहा था। शास्त्री जी के शब्दों में “शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ नहीं हो पा रहा हूँ। यद्यपि शारीरिक रूप से मैं मजबूत नहीं हूं लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूँ।“ शास्त्री जी ने कभी कोई बड़े-बड़े दावे नहीं किए, मगर उनके कर्मों ने भारत को स्वाभिमान से अपने पैरों पर चलना सिखाया। जब वह देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में कहा “ हर राष्ट्र के जीवन में एक समय ऐसा आता है, जब वह इतिहास के चौराहे पर खड़ा होता है और उसे अपनी दिशा निर्धारित करनी होती है। किन्तु हमें इसमें कोई कठिनाई या संकोच की आवश्यकता नहीं है । कोई इधर उधर देखना नहीं हमारा मार्ग सीधा व स्पष्ट है :- देश में सामाजिक लोकतंत्र के निर्माण से सबको स्वतंत्रता व वैभवशाली बनाते हुए विश्व शांति तथा सभी देशों के साथ मित्रता । शास्त्री के काल में जब पाकिस्तान के साथ संघर्ष हुआ तब उन्होंने देश की जनता को यह कहकर आश्वस्त किया कि “ अपने सीमित संसाधनों के उपयोग में हमने सदा आर्थिक विकास योजना तथा परियोजनाओं को प्रमुखता दी है, अत: किसी भी चीज को सही परिप्रेक्ष्य में देखने वाला कोई भी समझ सकता है कि भारत की रूचि सीमा पर अशांति अथवा संघर्ष का वातावरण बनाने में नहीं हो सकती । इन परिस्थितियों में सरकार का दायित्व बिल्कुल स्पष्ट है और इसका निर्वहन पूर्णत: प्रभावी ढंग से किया जायेगा । यदि आवश्यकता पड़ी तो हम गरीबी में रह लेंगे किन्तु देश की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आने देंगे। ”

वर्तमान राजनीति में सबसे बड़ी कमी आदर्शवाद को व्यावहारिक पहलू में ना ढाल पाने की क्षमता का ना होना है लेकिन भारत के लाल ; शास्त्री जी राजनैतिक शुचिता और आदर्शवादी व्यवस्था की एक मिसाल कायम कर गए हैं। शास्त्री जी का राजनैतिक जीवन आने वाले दिनों में हमारी राजनीति को प्रेरणा देने में सक्षम है। हम आशा कर सकते हैं कि भविष्य में यदि हमें भी राजनीति करनी है और कुछ सार्थक बदलाव लाना है तो शास्त्री जी के जीवन के पन्ने हमारी प्रेरणात्मक प्राथमिकताओं में अवश्य दर्ज होंगे | आज, भारत की जो आतंरिक और वैश्विक उलझने हैं उससे बेहतर ढंग से निपटने के लिए हमें गाँधी और शास्त्री की प्रेरणाओं को अपनाना होगा। उनके बताये हुए मार्गों का अनुसरण करना होगा । गाँधी जी की फकीरियत और गुदड़ी के लाल की बादशाहत आज भी देशवासियों को सच्चाई का पथ दिखलाती है।

          अगर सच है तो यही है कि महात्मा गांधी एक शख्सियत नहीं ; वो तो एक विश्वास हैं, जो हर इंसान के अंदर मौजूद है। वो एक वचन हैं जो हर कसम में साथ होते हैं। तो वहीं शास्त्री जी एक शपथ हैं, जो हमें अपने कर्तव्यों का एहसास दिलाते हैं कि हम कुछ भी कर सकते हैं। इसलिए यह दोनों हमसे तो कभी अलग हो ही नहीं सकते। यह दोनों यहीं हैं , हमारे पास.....हमारे बीच..... हमारे साथ।। 

…… विवेक सिन्हा…..
सबैजोर, जमुई, (बिहार)

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