देखके भारत के वासी को अंग्रेजो के हाथ में,
कूद पड़े तब भगतसिंह आजादी के अग्निकांड मे ।
तोंपो से बाते करते, बंदूकों से करते प्यार थे,
इन्हे बना हथियार, मार्ग आजादी का कायम करते।

होती गर शास्त्रों की खेती, नए शस्त्र भी बोते थे,
अपने वीर शहीदों को वह शस्त्र बिना ना खोते थे।
हत्याकांड जनरल डायर का नहीं किसी को भूला है,
देख जिसे भारत वीरों का खून सदा ही खौला है।
आग नई सुलगी ज्वाला की लपटों ने था जन्म लिया,
जिसमे तपकर वीर भगत का नाम धरा पर अमर हुआ।
चिंगारी बनकर मशाल हर दिल के अंदर छाई थी,
जिसमे आजादी भारत की सपना बन लहराही थी।
राह चले क्रांति की भारत के ऐसे दीवाने थे,
आजादी से प्यार बड़ा आजादी के परवाने थे।
आज नाज़ है देश को उनके हिंसा भावो के ऊपर ,
नतमस्तक होते है उनके चरणों की धुली छूकर ।
नतमस्तक होते है उनके चरणों की धुली छूकर।
कीर्ति शर्मा (प्रित)







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