भगत सिंह जिन्दा हैं


मेरे जज्बातों से इस तरह वाकिफ है मेरी कलम
मैं इश्क भी लिखना चाहूं तो इंकलाब लिख जाता है।।

इन शब्दों को जीने वाले शहीदे आजम भगत सिंह को उनके जन्मदिन पर शत शत नमन।वे हमारी आजादी के संघर्ष के निर्भीक अग्रणी नायकों मे थे।वे उस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो स्वतंत्रता संग्राम के लिये अपने किये गये कार्यों के प्रति न तो शर्मिंदगी महसूस करते थी और न ही माफी मांगने को तैयार थी। वह गांधी, सुभाष, आजाद, जयप्रकाश,लोहिया की तरह ही अपने कार्यों की जिम्मेदारी लेते हुए हर सजा भुगतने को तैयार थे। इन सबकी लड़ाई अंग्रेजों से थी न कि आपस में।

भगत सिंह ने बहुत छोटी उम्र में ही मार्क्स,लेनिन,गोर्की,तुर्गनेव जैसे विद्वानों को पढ़ लिया था। उन पर 1917 की सोवियत संघ में हुई बोल्शेविक क्रांति का बहुत प्रभाव था। वे सम्पूर्ण विश्व और भारत के लिए ऐसी समाज व्यवस्था के हामी थे जिसमें इंसान का इंसान के किसी तरह से भी शोषण न हो ।

वह समाजवादी विचारों के थे और यह बात वह खुलकर कहते हैं।वह क्रांति के पक्षधर थे। उनकी दृष्टि में क्रांति का अर्थ था एक ऐसा सामाजिक आर्थिक ढाँचा खड़ा हो जिसमे एक मनुष्य के द्वारा दूसरे मनुष्य के किसी भी प्रकार के शोषण की गुंजाइश न हो।सम्पत्तियों का सामाजीकरण कर व्यक्तिगत धन सम्पत्ति के जमाखोरी, इकट्ठा करने के प्रयासों पर रोक लगे।सभी प्रकार के भौतिक औऱ प्राकृतिक संसाधनों पर समाज के सभी मनुष्यों के लिए समान अधिकार प्राप्त हो और वह सभी को बिना पैसे के उपलब्ध हो। विवेकानंद और गांधी की तरह वह भी मानते थे कि सभी श्रेणियों के व्यक्तियों को शारिरिक श्रम करना आवश्यक होना चाहिए। वे किसी भी प्रकार के साम्राज्यवाद के विरुद्ध खड़े होने वालों में से थे।
इंकलाब जिन्दाबाद ,साम्राज्यवाद मुर्दाबाद उनके नारे थे।भगत सिंह मानते थे कि भारतीय युवा मानस को बौद्धिक खुराक की ज़रूरत है। देश के नौजवानों को उनको माल्यार्पण करने के साथ ही उनके लिखे साहित्य का अध्ययन करना चाहिए तथा उसको अपने जीवन में वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार कार्यान्वित का प्रयास करें करना चाहिए जिससे समाज के वंचित लोगों को लगे कि देश में भगत सिंह जिंदा है।

राकेश श्रीवास्तव
लखन

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