मैं अंगूठा छाप हूं,
बहू पढ़ी-लिखी चाहिए ।
मैं मायके से कुछ ना लाई,
पर दहेज पूरा चाहिए ।
बेटे पर जो खर्च है किया,
हिसाब बहु से चाहिए।
नियम कायदे मैं बनाऊं,
चलना बहू को चाहिए ।
बेटा केवल मेरी ही सुने,
चुप बहू को रहना चाहिए।
विचारों में ही मतभेद है ,
घर की छत पर छेद है ।
नहीं बदले कुछ लोग अभी भी, नहीं सुधरे कुछ लोग अभी भी, मुझको बड़ा ही होता खेद है। दहेज केवल कानूनों में ही निषेध है,असल जीवन जहाँ का तहाँ है। बताओ सभ्य लोगों परिवर्तन कहां है ???

श्रीमती प्रभा साव ( कोरबा )






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