परमवीर की भीरुता या बहादुरी


भारतीय पुलिस सेवा के 1988 बैच के अफसर परमवीर सिंह ने महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख पर प्रतिमाह सौ करोड़ की उगाही मांगने के आरोप लगाकर बहादुरी का प्रदर्शन किया है या भीरुता का ये कहना न बहुत कठिन है और न बहुत आसान लेकिन परमवीर ने एक बात उजागर कर दी है की भारतीय जनसेवा में लगे हमारे नेता और अखिल भारतीय सेवाओं के लिए चुने जाने वाले अफसर बराबर के लुटेरे हैं .
भारत की राजनीति और भारत की प्रशासनिक व्यवस्था दोनों मिलकर भले ही एक -दूसरे को बचा ले जाएँ लेकिन मुंबई की जनता न परमवीर सिंह को क्षमा करने वाली है और न ही अनिल देशमिख को .महाराष्ट्र सरकार में इतनी नैतिकता नहीं ही की वो अपने गृहमंत्री अनिल देखमुख को तत्काल पद से हटाकर उनके खिलाफ जाँच संस्थापित करे और न अखिल भारतीय सेवाओं का संचालन करने वाली भारत सरकार में इतना माद्दा है कि वो परमवीर सिंह को तत्काल निलंबित कर उनके खिलाफ जांच संस्थापित करे ,क्योंकि वे एक साल से मुंबई के पुलिस कमिश्नर थे और प्रदेश के गृहमंत्री के लिए हर महीने 100 करोड़ रूपये की चौथ वसूली कर रहे थे .
अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारीयों की नियुक्त न मुंबई में योग्यता के आधार पर होती है और न देश के दूसरे हिस्सों में. हर जगह इन सेवाओं की कमान सरकारें अपने-अपने ‘हुजरों’को देती आयी हैं.यदि ऐसा न होता तो इस देश में परमवीर सिंह की बिरादरी वजूद में ही न आती .जाहिर है की परमवीर ने झूठ नहीं बोला है.उन्होंने महाराष्ट्र के गृहमंत्री का प्रस्ताव मानकर ही मुंबई पुलिस कमिश्नर की कुर्सी हासिल की होगी .परमवीर सिंह ने ये खुलासा तब किया जब उनके ही एक साथी संजय बझे को निलंबित कर दिया गया .इस तथ्य को एक साल तक छिपाये रखने के लिए परमवीर सिंह बह बराबर के दोषी हैं .
मुंबई मायानगरी है यहां केवल सिनेमा की दुनिया की ही माया अलग नहीं है अपितु सियासत की दुनिया की माया भी अपरमपार है. मुंबई के 1750 बार और स्वल्पाहार केंद्रों से हर महीने सौ करोड़ रूपये वसूल करना कोई कठिन काम नहीं है. ये रकम तो गृहमंत्री जी के लिए वसूल की जा रही होगी ,लेकिन इसके अलावा पुलिस महकमे का भी तो पेट है.पुलिस के लिए पुलिस वाले हर महीने कितनी वसूली करते होंगे इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है .
परमवीर के आरोप के बाद गृहमंत्री अनिल देशमुख किसी को मुख दिखने लायक नहीं बचे हैं फिर भी उनका दुःसाहस देखिये की वे कह रहे हैं की परमवीर सिंह के आरोप बेबुनियाद हैं और परमवीर ने ऐंटिलिया मामले में खुद को बचने के लिए ये आरोप लगाए हैं .चंडीगढ़ के एक लब्धप्रतिष्ठ परिवार में जन्मने परमवीर सिंह का ट्रेक रिकार्ड अच्छा रहा है .20 जून 1962 में जन्मे परमवीर सिंह ३२ साल से महाराष्ट्र की सेवा कर रहे हैं लेकिन उन्होंने इतना बड़ा सच शायद पहली बार बोला है .५८ साल के परमवीर सिंह की सम्पत्ति कितनी है ये वे खुद या उनकी सरकार जानती है लेकिन उसके बारे में आम जनता को कुछ नहीं पता है ,क्योंकि उसका आकलन नहीं किया गया .
परमवीरके पिता होशियार सिंह हिमाचल में तहसीलदार थे,उन्होंने कितना कमाया होगा ये परमवीर सिंह ही जानते होंगे .परमवीर की पत्नी श्रीमती सविता सिंह एलआईसी हाऊसिंग लिमिटेड की संचालक हैं.उनका बेटा रोहन भी एक सम्भ्रान्त व्यवसायी परिवार का दमाद है ,इसलिए आपकह सकते हैं की परमवीर सिंह को कोई जरूरत नहीं थी की वे शीर्ष पद पर पहुँचने के लिए प्रदेश के गृहमंत्री के सामने समर्पण करें औअर उनके कृपापात्र अपने मातहत को मुंबई में लूट को छोट प्रदान करें .लेकिन उन्होंने ऐसा किया और वे खुद इस लूट में भागीदार बने .
परमवीर सिंह का सीना प्रधानमंत्री के 56 इंच के मुकाबले कुल 40 इंच का है लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री महाराष्ट्र को पत्र लिखकर जो कुछ कहा है उससे लगता है की उनका सीना कम से कम अस्सी इंच का तो होना ही चाहिए .इस रहस्योद्घाटन के बाद अपरमवीर सिंह मुंबई के पुलिस कमिश्नर नहीं रहे,रह भी नहीं सकते थे. परमवीर सिंह को संजय बर्वे के सेवानिवृत्त होने के बाद ठीक एक साल पहले पुलिस का मुखिया बनाया गया था .परमवीर सिंह ने अनेक नेताओं पर अहसान किये और अनेक नेताओं के उनके ऊपर अहसान हैं ,ये कहना आसान है लेकिन प्रमाणित करना कठिन है .मजे की बात ये है की इस तरह के आरोपों को प्रदेश की सरकार भी जांचना-परखना नहीं चाहती .
महाराष्ट्र की राजनीति और देश की नौकरशाही के सामने समस्या पैदा करने वाले परमवीर सिंह का कुछ बिगड़ना नहीं है और गृहमंत्री साहब को मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे जी फौरन हटा नहीं रहे,हालांकि भाजपा चाहती है किऐसा हो.लेकिन जब विपक्ष कुछ चाहता है तब वैसा नहीं होता .हो भी नहीं सकता .मुंबई में सियासत और सार्वजनिक जीवन में जो कुछ भी होता है वो किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं होता .प्रदेश की नौकरशाही और सियासत अपमान के इस घूँट को चुपचाप पी जाएगी ,उसे अपने मान-अपमान की कोई फ़िक्र नहीं है .
अगर आप तलाशने निकलें तो आपको अधिकांश राज्यों में परमवीर और बझे जैसे अधिकारी इफरात में मिल जायेंगे. मध्य्प्रदेश में इस तरह की अवैध वसूली की पुरानी पम्परा है. हमारे यहां तो एक मुख्यमंत्री की पत्नी पर नोट गिनने के लिए गणना मशीन लगाए जाने की खबरें वायरल हुई थीं,एक मंत्री के बच्चे के स्कूल बस्ते में लाखों रूपये मिले थे .हिमाचल के रहने वाले एक पूर्व मंत्री जो बाद में राज्य के मुख्यमंत्री हुए अपने बिस्तर पर नोट बिछाए हुए पकडे गए थे .ऐसा करने वाले काल के कराल गाल में समा जाते हैं .
परमवीर का सच अब या तो देश की समूची नौकरशाही के लिए कलंक बन जाएगा या फिर सच बोलने का तमगा .परमवीर यदि एक गृहमंत्री का इस्तीफा दिला पाएं तो बड़ी बात है .देश को बचाना है तो लोगों को सामने आना होगा , इन दोनों के बीच की दुरभि संधि को तोड़ना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है.बेहतर हो कि देश की भारतीय पुलिस और प्रशासनिक सेवाओं से जुड़े लोग इनका अपने स्तर पर पहल करें .इस मामले की जांच तो होना ही चाहिए .
@ राकेश अचल
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