दिल्ली के बहाने चौरा-चौरी की याद


दिल्ली में अविकल चल रहे किसान आंदोलन के दौरान ही महात्मा गाँधी के नेतृत्व में हुए चौरा-चौरी आंदोलन के भी ९८ साल पूरे हो गए हैं .इस लिहाज से दिल्ली का मौजूदा आंदोलन चौरा-चौरी के आंदोलन से भी बड़ा हो गया है जबकि इस आंदोलन का नेतृत्व कोई महात्मा गांधी नहीं कर रहे हैं. चौराचौरी में किसानों की हिंसक भीड़ ने एक पुलिस थाने पर हमला कर 23 पुलिस कर्मियों को जिन्दा जलाकर मार डाला था ,लेकिन दिल्ली की देहलीज पर चल रहे किसान आंदोलन में 26 जनवरी की ट्रेक्टर रैली में हुई कुछ गड़बड़ियों के अलावा कोई जनहानि नहीं हुई ,उलटे इस आंदोलन के चलते पांच दर्जन से अधिक सत्याग्रही किसानों की जान जा चुकी है .
आपको बता दें कि चौरी-चौरा कांड आजादी के आन्दोलन का एक गुमनाम पन्ना हैं जिसे इतिहास के पन्नो में कोई जगह नहीं दी गई. यह वही आन्दोलन हैं जिस राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने चौरी-चौरा का अपराध करार दिया. इतिहासकारों का यह भी कहना हैं की महात्मा गाँधी ने चौरी-चौरा कांड के कारण ही असहयोग आन्दोलन वापिस ले लिया था. चौरी-चौरा कांड में शामिल सपूतों ने ब्रिटिश हुकूमत को हिलाकर रख दिया था.4 फरवरी 1922 को हुए इस आंदोलन में 23 पुलिस कर्मियों की हत्या के बाद महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह को वापस ले लिया था .इस आंदोलन में शामिल १९ लोगों को मौत की सजा सुनाई गयी थी .
गांधीजी चौरी-चौरा कांड से बहुत नाराज थे. जिसके कारण उन्होंने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया था. गाँधीजी इस निर्णय से रामप्रसाद बिस्मिल और उनके नौजवान साथियों से नाराज थे. जिसके कारण कांग्रेस दो विचारधाराओ में विभाजित हो गई. एक था नरम दल और दूसरा गरम दल. शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, राम प्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद जैसे कई क्रांतिकारी गरम दल के नायक बने.
आज के किसान आंदोलन को नाकाम करने के लिए भी बीते दो महीने में तरह-तरह की कोशिशें की गयीं लेकिन किसी को भी कामयाबी नहीं मिली,अलबत्ता 26 जनवरी को दिल्ली में किसानों की ट्रेकटर रैली को नाकाम करने के लिए दिल्ली के कुछ हिस्सों में गड़बड़ हो गयी थी .आंदोलन विरोधी ताकतों की योजना ये थी कि दिल्ली की हिंसा के बाद किसान आंदोलन को बदनाम कर इतना दबाब बना दिया जाएगा कि आंदोलन अपने आप समाप्त हो जाये .लेकिन किसान नेताओं ने दिल्ली को चौराचौरी नहीं बनने दिया .इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले किसान सत्ता की शक्ति से वाकिफ हैं इसलिए वे जितनी एहतियात बरत सकते थे उन्होंने बरती .किसान नेता न झुके और न उन्होंने आंदोलन को कमजोर होने दिया .
दिल्ली के किसान आंदोलन क चौरा चौरी के आंदोलन जैसा हिंसक होने से बचने में सुरक्षा बलों की भूमिका भी सराहनीय रही.सुरक्षा बलों ने बीते दो महीने में अभूतपूर्व संयम का प्रदर्शन किया .ऐसे अनेक अवसर आये जब स्थिति बनी कि देश की धड़कने रुकती नजर आने लगी थीं.लेकिन कुछ भी नहीं होने दिया .किसानों के इस अभूतपूर्व और ऐतिहासिक आंदोलन बनाने में किसानों के साथ देश भर के लोगों का भी अभूतपूर्व सहयोग रहा .आगामी 6 फरवरी को किसान देश भर में चक्काजाम करने वाले हैं ,मुमकिन है कि उस दिन आंदोलन को बदनाम करने के लिए कुछ तत्व गड़बड़ी करने की कोशिश करें,लेकिन ये तय है कि कोई भी इस आंदोलन को चौराचौरी जैसा तो नहीं बनने देगा .
दिल्ली के किसान आंदोलन में भले ही महात्मा गांधी नहीं हैं किन्तु सत्याग्रह को लेकर गांधी जी के मूल्य अवश्य इस आंदोलन के साथ हैं .इस आंदोलन कोऊ लेकर रोज कुछ न कुछ हरकतें सामने आती रहतीं हैं. कभी कोई समर्थ देश इस आंदोलन को लेकर टिप्पणी करता है तो कभी कोई स्थापित कलाकार आंदोलन के समर्थन में ऐसा कुछ कह या कर देता है कि आंदोलन की धारा बहकती हुई लगने लगती है ,कित्नु होता कुछ नहीं है .होना भी नहीं चाहिए .किसानों के आंदोलन को लेकर अब सरकारें उदासीन हैं,वे दूर की सोचकर अपनी नीतियां बनाने के साथ ही किसानों के साथ व्यवहार भी सोच-समझकर कर रही हैं .
मुझे लगता है कि इस सदी का ये सबसे लम्बा किसान आंदोलन संसद में बहस के बाद समाप्त हो जाएगा .सरकार या तो इन किसानों की बात मानकर आंदोलन का सम्मानजनक समापन कराएगी या फिर किसी दुसरे तरीके से निबटने का प्रयासभी किया जाएगा .
@ राकेश अचल

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