गाँव के नाव सुन के कान ला आइसे सुकून के पल के याद दिला देत रिहिस जइसने सरग के दुवार खुल गे हे अउ उहा ला भुलावा आये है मोर बर। गाँव के शान्ति भरे माहौल, खुला आसमान म बहत ठंडी ठंडी हवा , सब्बो मनखे एक दूसरा के दुःख पीर के संगवारी कश रहय , बढ़ आनन्दित पल रहिष। फेर अब का करिबे गाँव के घलो दिन बादर बदल गे हे संगी।
गाँव मा अब पहली जइसनेन स्तिथि नई रिहिश ऊहा घलो शहर के काली छाँव ह अपन बसेरा डार डरे हे ।
गाँव के नान- नान बाबू ले बुढवा सियान बाबा तक हा दारू के नशा मा डूबत जावत हे , जैसनेच संझा के बेरा होते उसनेच लोगन मन के डेरा (दारू दुकान) कोती जाये के सुरवात हो जाथे पीये के जुगाड में । जेन ह जा नइ सके ओहा अपन बर लगवार खोजथे , कोनो कोनो ह तो अधिया म सौदा करथे, अउ बिकट झन ह तो ला के गांव मा घलो बेलेक में बेचे के बुता करत रहिथे । कतको झन ह बुता काम ला छोड़के बिहनिया ला पी के बइठे रहिथे। कतको समझा बुझा लो ग कोनो ह ककरो कहना ला नइ मानत हवे । मोर गांव के सुकून चेन के पल ह धीरे धीरे खोवत जाथे , अउ गाँव घलो ह शहर कस नशा मा डूबत जाथे ।अभी ला अधिकांश मनखे हा तो नाश के बिना रहे नहीं सकता हे । सियान मन ला देख- देख के नान -नान लइका मन घलो नाश करे के चालू कर दे हे। ऐ में लइकामन के का दोष जइसने देखत हे उही रद्दा मा उहु मन घलो चलत हे। सही गलत के कोनो ह पहिचान नइ कर सकत हे । दिन ब दिन हालात ह बिगड़त जावत हावे। अउ काला बताओ
दारू बिना तो अब छट्टी, सगाई ,बर- बिहाव, अउ मरणी कार्यक्रम घलो नई होवत हे।
सगा सोदर मा दारू के मांग ह बढ़ गे हावे ,जेन सगा हा ये सब बेवास्थ नइ करे ओंकर घर सगा घलो नइ जाये ला धरे , जेन सगा पिलाथे ओला बने सगा मानथे अउ जेन ह नइ पिलाये ओला गिंहा सगा कहिके चार भाखा अउ सुना देथें। कोनो सगा हर मेहमान नवाजी करे के खातिर पिया घलो दिही ता कुकरी घलो खवा कहीथे अउ ऊहु ला कर दिही तहन का हे , दुनिया भर के गोथ ला ऊकंर सुन ले ओहि ह राजा बन जावत हावे, अउ रंग बिरंग के लबारी मारत हे। अब संकृति के नाम मा गाँव ह पिछवावत जावत हावे अउ नाश के लत मा समावत जावत हे। मोर गांव के सुख शांति ह बिसरत जावत हे, आइसे मोला लागत हावे।
ये सब ह समय के फेर आय कोनो बुरा अदात धरत देर नइ लगे अउ अच्छा आदत ला शिखत पूरा उमर पाहा जाथे।
“अइसन बिसंगति ला छोड़े घलो जा सकत हे , शहर कश आदत ला छोड़े घलो जा सकत हे, अउ मोर गाँव के सुकून फेर ले लाये जा सकत हे “
गाँव के सुकून फेर ले पाये बर सब्बो झन के ला मिलजुल के नशा मुक्ति बर कुछु बड़का अभियान चलाया ला पढ़ही, समाज के मनखेमन ला मिलजुल के समझाय ला पढ़ही, तभे गाँव अउ शहर मा उद्धार ह हो पाही।

डेविड बाबू
धमतरी( छ. ग.)








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