देखो आज भूमण्डल को निगलने,
बढती आबादी आए।
तन-तपता जाये,दिनों-दिन तापमान बढता जाए। फिर भी लोगों की समझ में कुछ भी ना आए।
हर साल भारत में दो सौ करोड़ जनसंख्या बढ़ती जाए।
अब चारो तरफ भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा हाहाकार मचाए।
विलुप्त हो रहे पशु-पक्षी, आने वाले भयावह त्रासदी को दर्शाए।
पृथ्वी का गर्भ-गृह अब हो रहा है खाली,बोलों अब धरती कहाँ से सोना उगाए।
सीमित हो रहे हैं खाद्य-पदार्थ,सीमित संसाधन सारे।
क्या खायें,कैसा पियें पानी ।
अब कैसे कोई अपने जीवन का दु:ख-दर्द सुनाए।
दिनों-दिन बढ़ती आबादी की मार अब सही ना जाए।
बढ़ रहे अत्याचार, दुष्कर्म, पाप।
बढ़ रहे शोषित जन हजार, अब ऐसी विपत्ति से उन्हें कौन बचाए।

यहाँ कभी बहती थी दूध की नदियाँ,
अब यहाँ होती है ,मवेशियों की हत्या।
ऐसी निर्मम हत्या और तस्करी की मार अब सही ना जाए।
मिलावटी दूध बिक रहे है बंद पैकेट में, जिसे पी नवनिहाल अपना मानसिक शक्ति गवाए।
बोलो अब कैसे ज्ञानवर्द्धक भारत बनाया जाए।
सूख रहा है नदी,तालाब और नहर।
सूखी पड़ी पेड़ो की डाली-डाली।
उजड़ रहा पक्षियों का घर-संसार,कहाँ जाए,कहाँ रहे?
उनकी ऐसी हालत देख,अब सहा ना जाए।
हमारी पूर्वजों से मिली विरासत में, खुशहाली भरी हरियाली।
हम विरासत में छोड़ जाएंगे ,दूषित जल,हवा,मिट्टी।
जिसकी आबो-हवा में जन्म लेकर वो भी पछताएगें।
ऐसी जनसंख्या की मार अब कैसे सह पाएंगे।
ज्योति सिंह (उत्तर प्रदेश) जिला-देवरिया







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