तीर समुंदर के बसा, जगन्नाथ पुरी धाम ।
तिहूं लोक में गूंजता, है इसका शुभ नाम ।।
बहन सुभद्रा संग में, कृष्ण और बलराम ।
आन बिराजे हैं प्रभु, जगन्नाथ पुरी धाम ।।
शुक्ल पक्ष आषाढ़ की, तिथी द्वितीया आज ।
दर्शन देने को प्रभु, आते हैं महाराज ।।
नगर भ्रमण करने चले, रथ पर हुए सवार ।
शोभा देख महान ये, प्रमुदित है संसार ।।
भाई बहन की प्रीत की, सुंदर है यह दृश्य ।
जग में और न पाओगे, ऐसा शुभ परिदृश्य ।।
चारोधाम में एक है, जगन्नाथ पुर धाम ।
स्वयं बिराजे हैं यहां, कृष्ण संग बलराम ।।
रथ विशाल सुंदर सजे, शोभा कही न जाए ।
दर्शन के प्यासे नयन, निरखत नही अघाए ।।
नगर भ्रमण करके फिरे, वे दशमी के दिन ।
आन विराजे धाम में, हुए नींद में लीन ।।
जगतपिता परमात्मा, जगन्नाथ महाराज ।
शरण पड़ा हूं आपका, रखियो मेरी लाज ।।
रथयात्रा उत्सव बड़ा, सभी मनाते लोग ।
रामबरस के बाद में, आता है संयोग ।।

रामसाय श्रीवास "राम"







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