चुनावी घोषणाएं नहीं जो धरातल पर काम करेगा वही जनप्रतिनिधि होगा।।

आज विधान सभा चुनाव को लेकर हम सभी देख रहे हैं कि लगभग सभी राजनीतिक दल बड़ी-बड़ी चुनावी घोषणाएं कर रहे हैं। कोई राजनीतिक दल सत्ता में आने पर दसवीं पास करने वाले छात्रों को बाइक और स्कूटी देने की बात कर रहा है तो वहीं कुछ दल रोजगार और शिक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर रहे हैं। दोस्तों सर्वांगीण और राष्ट्रीय स्तर की ग्रोथ की क्षमता रखता है अपना बिहार इसलिए अब बिहार को राष्ट्रीय स्तर की ग्रोथ दर हासिल करने के लिए कई पहलूओं पर काम करने की ज़रूरत है ना कि केवल चुनावी घोषणाएं। इससे पहले आपको बता दें कि बेशक आज बिहार की गिनती पिछड़े राज्यों में की जाती है लेकिन बिहार का नाम इतिहास के उन पन्नों में दर्ज है, जो इसके अनूठे इतिहास को दर्शाता है। भगवान बुद्ध की कर्मभूमि के तौर पर विख्यात बिहार में ही सबसे पहले गणराज्य के बीज बोए गए थे। जो बाद में आधुनिक लोकतंत्र के रूप में विस्तार हुई थी। बड़ी हैरत होती है कि इतिहास में भारतवर्ष का अहम अंग रहने वाला बिहार आज अपनी गरीबी , भ्रष्टाचार ,बीमारियां के लिए जाना जाता है।अगर भारत के सभी राज्यों की तुलना करें तो बिहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और गौरवगाथा सबसे समृद्ध है। आज भी साथियों ध्यान से देखिए सबसे ज्यादा आईएएस पीसीएस और वैज्ञानिक हमारे बिहार के धरती से ही निकलते हैं, लेकिन घटिया राजनीति और राजनेताओं के कारण पिछले कुछ वर्षों से हालात खराब हुई है। आपको बता दें कि बिहार के पिछड़े-पन का सबसे बड़ा कारण है, भ्रष्टाचार इस राज्य से इतने घोटाले जोड़े हुए है जिनके बारे में जानकार कोई भी हैरान हो जाएगा और जो इसके समृद्धि में सबसे बड़ा काटा है, चाहे बात करे चारा घोटाला की या फिर शौचालय घोटाला, सृजन घोटाला, इंटर टॉपर्स घोटाला, गर्भाशय घोटाला, अलकतरा घोटाला की देश के नामी नेता और प्रशाशन का नाम इस घोटाले से जुड़ा हुआ है। बिहार के विकास में सबसे बड़ी बाधा गरीबी है बिहार में 57.2 प्रतिशत लोग गरीबी-रेखा से नीचे हैं, इन सब का सबसे बड़ा कारण यही भ्रष्टाचार और घटिया राजनीति है, पूरी दुनिया जानती है कि बिहार के लोग मेहनती और बिहार में खनिज संपदा भी है भरपूर लेकिन यहां सबसे अधिक समस्या असमानता में है कुछ लोगों के पास अपार संपत्ति है तो वहीं अधिकतर लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं जबकि हमारे संविधान के अनुच्छेद 14 में सभी के बराबरी की बात कही गई है साथियों लेकिन यहां राजनीति में भाई भतीजावाद सबसे अधिक है जिसका खामियाजा आम जनता उठाता ।
सर्वांगीण रूप से विकास के लिए शिक्षा के ढांचे के साथ ही कृषि पर ज़ोर बिहार के सतत विकास के लिए यह ज़रूरी है कि कृषि क्षेत्र की उत्पादकता व शिक्षा के स्तर को बढ़ाई जाए और इसे बरक़रार रखा जाए। इसके साथ ही साथियों बिहार के विकास की धीमी गति की एक वजह कम शहरीकरण भी है. राज्य की सिर्फ़ 11 फ़ीसदी आबादी शहरों में रहती है. इस मामले में राष्ट्रीय औसत 31 प्रतिशत है. यहां घनत्व 1193 लोग प्रति घन मीटर है, बिहार पूरे देश में सबसे अधिक घनत्व वाले राज्यों में एक है।
हम सभी ने दोस्तों देखा कि कोविड 19 से उपजी वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के समय जब देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया तब सबसे अधिक परेशान प्रवासी मजदूर हमारे इसी धरती बिहार से थे , जिसमें लगभग सभी राजनीतिक दल सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में व्यस्त थे, कोई दल सचमुच में इन प्रवासी मजदूरों का हितैषी नहीं बन पाया । बिहार से पलायन की वजह निर्माण क्षेत्र का छोटा होना और कम शहरीकरण का होना भी है, पर यह भी सच है कि कृषि उत्पादन प्रसंस्करण के लिए राज्य के बाहर ले जाए जाते हैं. यह बिहार में स्वतंत्र और मज़बूत अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी बात नहीं है।
इसके साथ ही बिहार में राष्ट्रीय स्तर के विकास के लिए दोस्त बड़े गावों को छोटे क़स्बों और बाज़ारों में बदला जाना भी आवश्यक है. यह भी ज़रूरी है कि इसके लिए आर्थिक विकास और सुविधाओं का विकास किया जाए। इन सभी के साथ ही सबसे जरूरी बेहतर शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण किया जाए।
बिहार के शैक्षणिक संस्थान, ख़ास कर, उच्च शिक्षा के संस्थान देश के सबसे बुरे संस्थानों में एक हैं. ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के इस युग में इसके महत्व को आसानी से समझा जा सकता है. बिहार को इस पर बहुत ही अधिक ध्यान देने की ज़रूरत है।
इसके अलावा यह भी आवश्यक है कि बिहार के दूसरे तमाम संस्थान बिहार से बाहर गए लोगों से संपर्क में रहें. वे बाहर में बसे बिहारियों से सामाजिक सुरक्षा, हुनर विकास, सूचना के प्रसार और व्यापार और वित्त के मामले में काफ़ी कुछ हासिल कर सकते हैं। उम्मीद है कि 2020 का विधानसभा चुनाव केवल घोषणा बाजी नहीं होगा बल्कि धरातल पर भी काम किया जाएगा।

विक्रम चौरसिया

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