चश्में के भीतर से -/घनश्याम तिवारी-अगले जनम मोहे उल्लू बनैहो

आँनलाईन कक्षा का समय होने को था । मैंने फौरन पुताई वाली हाडी़ और चूना लगा ब्रश बिटिया को पकडा़या और अंदर की तरफ भागा । अंदर की दीवार खुरचती श्रीमती जी से बोला अब छोड़ दो यह सब … थोडी़ चाय वाय बना दो .. क्लास का टाईम हो गया । तुम्हारी भी तो क्लास का टाईम होने वाला है । बहरहाल हाथ मुँह धोकर अपनी स्टडी टेबल पर रखी नैतिक शिक्षा की किताब उठाई और पेज पलटते हुए मोबाईल का लिंक शेयर कर दिया बच्चों के समूह में । मेन सब्जेक्ट की क्लासेस में बहुत ही कम की संख्याँ में जुड़ने वाले बच्चे मेरे लिंक शेयर करते ही भरभराकर गूगलममीट पर जुड़ गये । दूसरी तीसरी के बच्चे बडे़ इनोसेंट होते हैं कुछ भी बोलते समय या रिप्लाई करते समय यह नहीं सोचते कि हमारे सर को कैसा लगेगा ..? कहीं उनको बुरा तो नहीं लग जाएगा ? मेरे एक सवाल भर दागने की देर थी कि सबने अपना अपना माईक आॅन कर सर आई सर आई कहते कहते कोलाहल मचा दिया । मैने छोटा ही प्रश्न तो पूछा था -हंस की कहानी सुनोगे या उल्लू की … ? मैने सबको शांत करवाया … फिर पूछा .. अच्छा हंस बनकर पाठ कौन पढे़गा ? शालिनी ने तुरंत जवाब दिया सर मैं शालिनी … । मैंने कहा ठीक है । इसके बाद मैं पूछने ही वाला था कि उल्लू कौन बनेगा कि मेरे पूछने से पहले ही अर्जुन बोल पडा़ – सर उल्लू मैं बनूंगा … । उसका यह कहना था कि क्लास में जुडे़ सारे के सारे बच्चे हँसने लगे .. इतना ही नहीं ..हँसी तो मुझे भी आ गयी । मैने सबको शांत तो करवा दिया लेकिन कोई बच्चा खुद से ही उल्लू बनने के लिए तैयार हो गया .. और वह भी कक्षा तीसरी का .. इसके पीछे कुछ तो उसका लाँजिक रहा होगा । मैने बाकी रोल भी दूसरे बच्चों को बाँट दिए और कहानी का अभिनय शुरु करवाने जा ही रहा था कि मन में ये ख्याल आया कि चलो अर्जुन से पूछ कर देखता हूँ कि आखिर उल्लू बनने का ख्याल उसके दिमाग में कैसे आया ? मेरा प्रश्न सुनकर कक्षा का सबसे शरारती बच्चा अर्जुन बोल पडा़… वो क्या है न सर जी मेरे दादा जी बोलते हैं जैसी संगति बैठिए तैसोई फल देय .. इसका मतलब होता है जिसके साथ रहोगे वेसे ही बन जाओगे .. सच बताऊँ सर जी मेरे को कोई पढंता वढंता नहीं बनना ईंजीनियर चाचू की तरह जो दिन भर खाली पीली घूमते रहते हैं मुझे तो सामने वाले संजू भैया जैसे गोबर गणेश बनना है। वो ज्यादा पढे़ लिखे तो नहीं है लेकिन सुबह शाम दूध बाँटकर जब घर लौटते हैं और पिरितिया बूढा़ को पाँच पाँच सौ का नोट ज़रूर देते हैं । हंस बनूंगा तो सरस्वती जी मिलेंगी उससे तो अच्छा ही है कि उल्लू बन जाऊँ कम से कम लक्ष्मी जी को तो अपनी पीठ पर घुमा लाऊंगा । हाँलाकि कक्षा तीसरी के उस बच्चे ने हँसी – मजाक में ही यह बात कह डाली थी लेकिन उसकी इस बात ने एक बार फिर से मुझे गहराई से सोचने पर विवश कर दिया … आनन फानन में मैने अपनी कक्षा समाप्त की .. सारे बच्चों को समूह से लीव किया और चढा़ लिया अनोखेलाल जी को अपनी आँखों पर और लगा झाँकने … चश्में के भीतर से … ।
हमारे बाबाजी कहा करते थे दशहरे के दिन नीलकंठ दर्शन करना चाहिए और दीवाली की रात यदि सफेद उल्लू दिखाई पड़ जाए तो फिर क्या ही कहने …. । उनका यह लाॅजिक आज के दौर में सौ फीसदी सही नज़र आता है । एक तरफ माता शारदे की आराधना कर कर के विद्वता के नए नए कीर्तिमान बनाते , अनगिनत इनाम और मैडल पाकर भी हमारे बुद्धिजीवी अग्रज , मित्र , रचनाकार ऐन दीवाली के वक्त लाॅकडाउन से आई तंगी के वक्त खुद ही रंगाई वाली कूची लिए बनावटी हँसी बिखेरते .. अरे ये तो हमारा शौक है .. कहते हुए अपनी पीडा़ को छुपाने में व्यस्त हैं वहीं दूसरी तरफ लोगों को उल्लू बना बना सरस्वती सेवा और वास्तविक ज्ञान – विज्ञान से दूर येन केन प्रकारेण , सही गलत चाहे कैसा भी तरीका हो हर हाल में जनता को बेवकूफ बना बना अपना उल्लू सीधा करते लोग चमचमाती दीवारों पर रंगीन लाईटों को लगाने का इंस्ट्रक्शन देते नज़र आते हैं ।
मुझे अच्छी तरह से याद है जब मैं प्राइमरी में पढ़ता था तो हमारे गुरूजी हमेशा ही मेरी योग्यता की तारीफ किया करते थे ….. कितना अच्छा बोलता है यह बालक … एक दिन ज़रूर यह माता सरस्वती का सच्चा उपासक बनेगा वहीं साथ ही के कुछ ज्यादा शरारती बच्चों को मुर्गा बना कर खडा़ कर देते और कहते … तुम लोगों पर पैसा लगाकर पानी कर दे रहे हैं तुम्हारे माँ – बाप … । उल्लू की दुम हो … कभी कुछ नहीं कर पाओगे । स्कूल से बाहर निकलते ही मेरे वो सारे दोस्त बोलते .. चलो बे फुटबाल खेलते हैं । पंडित ( यानि मेरे को ) जाने दे .. दो चार ग्रंथ और पढे़गा तभी तो कल की क्लास में शाबाशी मिलेगी । हम लोगों का क्या है .. मुर्गा बने हैं कल कोई और जानवर बना देगा मास्टरवा … ।
आज फेसबुक पर वो सभी मित्र मंडली मिलती है तो मुझे अपना चेहरा छुपाने के लिए जगह ढूँढ़नी पड़ जाती है । जो दोस्त उल्लू , नाकारा और नालायक समझे जाते थे वो सभी अपनी अपनी फिल्ड के शहंशाह हैं । बडी़ – बडी़ कोठियों , चमचमाती कारों और कुबेर के खजाने के मालिक हैं और जो बहुत ही प्रतिभाशाली या यों कहें साक्षात् सरस्वती जिनके अंदर विराजती थी वे दो – चार हजार रुपयों वाली तनख्वाह ले लेकर अपनी कलम घिसने में लगे हुए हैं ।
हमने भी ग्रेजुएशन , पोस्टग्रेजुएशन , डिप्लोमा और न जाने क्या क्या ही डिग्रियाँ हासिल कर लीं और पहली बार जब घर से बहुत दूर जंगल सरीखे इलाके में जहाँ एक नयी कंपनी का सेटअप लग रहा था के स्कूल में टीचरी का जाॅब आॅफर हुआ तो ऐसा लगा कि पता नहीं क्या ही मिल गया हमें । घर के पास ही रहने वाले अप्पल भाई ने आते समय बोला था तू तो अच्छा पढ़ता था भाई .. आगे निकल गया .. हम लोग उल्लूगिरी में रह गये .. बस इसी तरह साईकिल टायर में पंचर लगाते रहेंगे .. अपने दोस्त की बात सुनकर ऐसा लगा था सचमुच हमने कोई बडा़ ही काम कर दिया । कुछ सालों बाद जब मैं घर वापस गया तो अपने घर का रास्ता ही भूल बैठा । जहाँ अप्पल भाई की साईकिल की दुकान हुआ करती थी , वहाँ बडी़ सी कोठी बनी हुई थी । एक बडे़ से गेट पर छोटी सी नेमपट्टी दिखाई पडी़ । टी . अप्पल राजू ( पार्षद – वार्ड क्रमांक -12 दल्ली राजहरा ) मैं तो सन्न रह गया … ।
घर पहुँचा तो पता चला कि बात बात में मास्टर जी से गाली खाने वाला अप्पल भाई नगर पालिका का उप सभापति भी चुना गया है । मेरी तो मानो जमीन ही हिल गयी … बरसों रात रात भर जग कर कडी़ मेहनत की … अपने से बडो़ं का सम्मान किया … न कोई लफडा़ और न ही किसी से झगडा़ । हमेशा गुरूजनों से शाबासी पाता रहा और लंबे समय तक काम करने के एवज में प्राईमरी से मिडिल स्कूल वाले टीचर तक ही पहुँच पाया हूँ और कभी नहीं पढ़ने लिखने वाला , हमेशा झगडा़ झंझट करने वाला हमेशा उल्लू विशेषण पाने वाला इंसान सरकारी गाडी़ , बंग्ला और नौकर चाकरों का मजा़ उडा़ रहा है ।
इस घटना ने ज़िदगी को समझने का मेरा फलसफा़ ही बदल दिया । पढ़ने – पढा़ने का तरीका तो वही बदस्तूर जारी है लेकिन विद्यार्थियों के बारे में कोई भी राय अब मैं उनके पढा़ई वाले परफाॅरमेंस के आधार पर क़तई नहीं बनाता । जो जितना कमअक्ल , बेवकू़फ , गधा या यों कहें कि पूरी तरह से उल्लू लगता है मुझे उसी का फ्यूचर द बेस्ट लगता है । अब तो मैने बात बात पर बच्चों को डाँटते हुए अरे उल्लू के .. उल्लू की … बोलना भी पूरी तरह से बंद कर दिया है । कभी – कभी तो सोचता हूँ कि काश हमारे गुरूजी हमें भी उल्लू की कैटेगिरी वाला बना देते … उल्लू बनकर माता लक्ष्मी के करीब तो रहता .. कम से कम माँ लक्ष्मी को अपने पीठ पर सवारी करवाता हुआ यहाँ – वहाँ विचरता – फिरता । भले ही ज्ञान – विज्ञान नहीं होता लेकिन साक्षात माँ लक्ष्मी को सवारी करवाता हुआ उनके वैभव और ऐश्वर्य का तो आनंद ले पाने में तो समर्थ होता … इसलिए अब से जब भी कोई वर मांगना हो या मनोकामना व्यक्त करना हो मैं दोनों हाथ जोड़कर बस यही मांगता हूँ .. अगले जनम मोहे उल्लू बनैहो … ।

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