
कोरोना का रोना नहीं रोना चाहता लेकिन खबरें हैं कि विवश कर देती हैं. कोरोना का मुकाबला करने के लिए सरकार की तैयारियों की पोल रोज खुलती है ,जनता की परेशानियों का अंत होने का नाम नहीं लेता और हारकर जनता का ध्यान बांटने के लिए टीवी वाले एक्जिट पोल का झुनझुना लेकर खड़े हो जाते हैं ,ताकि कुछ देर को ही सही देश-दुनिया का ध्यान कोरोना की महापीड़ा से भटक जाए .
देश में कोरोना से बचाव के लिए केंद्र सरकार ने हर जिले में आक्सीजन कारखाने लगाने की घोषणा ऐसे की है जय से की हथेली पर आम उगाये जाते हैं .देश में 1 मई से 18 वर्ष के ऊपर की आबादी को वैक्सीन देने का महा अभियान शुरू करने का डंका पीटा गया ,वैक्सीन उत्पादकों को 100 फीसदी पैसा अग्रिम भुगतान कर दिया गया लेकिन महा अभियान शुरू ही नहीं हो पायेगा क्योंकि वैक्सीन है ही नहीं .मध्यप्रदेश सरकार को मजबूरी में अभियान तीन दिन आगे खिसकना पड़ा है ,दूसरे राज्यों की भी कमोवेश स्थिति यही है. मैंने मध्यप्रदेश का नाम इसलिए लिया क्योंकि वहां भाजपा की हड़पी हुई सरकार है .कांग्रेस की सरकार होती तो इसे राजनीति माना जाता
बुंदेलखंड में ऐसे ही हालातों के लिए ये कहावत बनी है की-‘ हाथ न मुठी और खुरखुरा उठी’ .देश के विभिन्न भागों से वैक्सीन कमी के कारण लोगों के वापस लौटने की आ रही खबरों के बीच स्वास्थ्य मंत्रालय ने वैक्सीन की कमी नहीं होने के दावे को दोहराया है। मंत्रालय के अनुसार बुधवार तक 15 करोड़ से अधिक डोज लगने के बावजूद राज्यों के पास एक करोड़ छह लाख डोज बची हुई है और 20 लाख 80 हजार डोज एक-दो दिन में मिल जाएगी।.
आप माने या न मानें किन्तु हकीकत ये है कि बीते बुधवार को वैक्सीन की लगभग 21 लाख ही डोज लग पाई। यदि 40-42 लाख प्रतिदिन की डोज की रफ्तार से वैक्सीन दी जाए, तो यह दो-तीन दिन में ही खत्म हो जाएगी। तीन दिन पहले स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों में भी राज्यों के पास एक करोड़ से अधिक डोज होने का दावा किया गया था, जाहिर है कि ये हालात वैक्सीन की कमी की ओर इशारा करते हैं .।
इंदौर के डीके उपाध्याय ने जैसे-तैसे वैक्सीन की पहली खुराक हासिल कर ली थी लेकिन अब दूसरी खुराक के लिए वे भटकते फिर रहे हैं.उन्हें दूसरी खुराक मिलेगी भी या नहीं ,कोई बताने को राजी नहीं .उपाध्याय की तरह 45 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए वैक्सीन की लगातार होती कमी के बीच निजी वैक्सीन सेंटर के दरवाजे उनके लिए बंद होने से उनकी समस्याएं और बढ़ जाएंगी। सरकार ने साफ कर दिया कि निजी केंद्रों पर उन्हें अब वैक्सीन नहीं मिलेगी। 45 साल से अधिक उम्र के लोगों को दूसरी डोज लेने के लिए सरकारी वैक्सीनेशन सेंटर ढूंढना होगा। साथ ही यह भी पता करना होगा कि जिस वैक्सीन की पहली डोज उन्हें लगी थी, वह उस सरकारी केंद्र पर मौजूद है भी या नहीं।
आगामी एक मई से वैक्सीन के लिए पंजीयन करने वाले लोग खुद को ठगा हुआ समझ रहे हैं.सरकारें अपनी जनता से क्षमा मांगने के लिए मजबूर हैं.बड़े-बड़े विज्ञापनों के जरिये जनता को कोरोना से बिना वैक्सीन के बचने के उपाय बताये जा रहे हैं. आक्सीजन की किल्लत बरकरार है,रेडिमिसिविर इंजेक्शन के लिए मरीजों के परिजन कलेक्टरों के बंगले पर दस्तक दे-देकर तक गए हैं. निजी अस्पताल कोरोना से मरने वालों के परिजनों से इलाज की रकम लिए बिना लाशें देने को राजी नहीं हैं. ग्वालियर के माहेश्वरी नर्सिंग होम में ऐसी घटना इसका उदाहरण है .
दुर्भाग्य ये है कि इस भयानक और अकल्पनीय मंजर के बावजूद सरकारें राजनीति से बाज नहीं आ रहीं.देश की तमाम अदालतें सरकार को निर्देश दे चुकी हैं लेकिन सुने कौन ? उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टाले जा सकते थे लेकिन नहीं ताले गए,जबकि इन चुनावों में ड्यूटी करने वाले 700 से अधिक कर्मचारी कोरोना के कारण अपनी जान से हाथ धो चुके हैं .उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ ने इसे लेकर चुनाव आयोग से मांग की है कि यूपी में कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए पंचायत चुनाव की मतगणना को स्थगित किया जाए. लेकिन नक्कारख़ानों में तूती की आवाज कब सुनी जाती है .
देश के नाजुक हालातों से जनता का ध्यान हटाने और सरकार यानि सिस्टम की नाकामी छिपाने के लिए गोदी मीडिया अब पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के एक्जिट पोल का झुनझुना बजाने में पूरी ताकत से जुटा हुआ है .कोरोना जब पूरी ताकत से देश में अपने पांव पसार रहा था उस समय भी किसी ने न अदालतों की सुनी थी और न जनता की .आज भी वो ही हाल है ,जबकि कोरोना के कारण भारत की अर्थव्यवस्था कम से कम 20 साल पीछे जाने की स्थितियां बन चुकी हैं .
देशभर में कोरोना महामारी के बीच 2 मई को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने हैं लेकिन नतीजों से पहले तमाम एक्जिट पोल ने इस बात की ओर इशारा किया हैं कि बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच मुकाबला कांटे का है. सभी नतीजों में एक बात साफ नजर आ रही है कि बीजेपी तिहाई के आंकड़े के पार पहुंच रही है. बिहार की तरह पश्चिम बंगाल के नतीजों का राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा असर देखने को मिल सकता है. यूपी चुनावों से पहले पश्चिम बंगाल विधान चुनाव की जीत बीजेपी के कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार करेगा. वहीं अगर ममता बनर्जी की टीएमसी सत्ता में वापसी करती है तो समूचे विपक्षी दलों में अपने खोए जनाधार को पाने का आत्मविश्वास जागेगा .लेकिन इससे कोरोना के प्रकोप पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है
आपदा में अवसर लाशने में सिद्धहस्त वैक्सीन बनानी वाली कंपनियों ने जब वैक्सीन की कीमतों का मामला अदालतों तक जाते देखा तो वैक्सीन की कीमतों में सौ रूपये की कमी करने का ऐलान कर दिया.कोवैक्सीन बनाने वाली कम्पनी ने दाम घटाने की घोषणा इस अहसान के साथ की कम्पनी मौजूदा समय में कोरोना से जंग के लिए पब्लिक हेल्थ सिस्टम को मजबूती देने के लिए यह फैसला लिया गया है। कंपनी का कहना है कि हम भारत में इनोवेशन को बढ़ावा देना चाहते हैं और हमारा लक्ष्य देश में पब्लिक हेल्थ केयर को मजबूत करना है। इससे पहले कोविशील्ड ने भी अपनी वैक्सीन की कीमत राज्य सरकारों के लिए 100 रुपये प्रति डोज घटाई थी।
कुल जमा देश की दशा कल भी नाजुक थी और आज भी नाजुक है.कल इसमें कितना सुधार आएगा ,आज नहीं बताया जा सकता क्योंकि सब कुछ अनिश्चय के दायरे में है .आपको केवल ऊपर वाले पर भरोसा करना चाहिए या अपनी किस्मत पर ।देश में कोई भी सरकार आज की तारीख में काबिले यकीन नहीं है.
@ राकेश अचल







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