कोरोना काल के जीवन दर्द बयां करती दो कविताएं-नीरव वर्मा , विशाखापटनम तसल्ली

दर्द थपथपा के देता है,
एक तसल्ली ।
आदी हो चुका हूँ , इस थाप की ;
बुझते दीपक से जाते हुए , तम के पदचाप की ।

भूख को तो अब तसल्ली से
बहलने की आदत सी पड़ गई है ।
पर सांस चलती रहे,
इसी से देखता हूँ हवा की राह ;
और सिर्फ रखता हूँ ,
सूखे गले की प्यास बुझाने की चाह ।
जिजीविषा आज इतना ही तो मांग रही है ।
क्या गुनाह है उसका ? क्यों न मांगे ?

जमीन से जुड़ा रहा था मैं सदा,
मेरी छत से सटे आठ मंजिलों का मकान
मेरे हिस्से की धूप भी खा जाता था ।
तुम्हारी तसल्ली मेरे छत की ऊंचाई न बढ़ा पाई
चारों ओर से घिरा मैं और मेरा घूटता दम ।
मैंने हवा मांगी , तो तुमने हवा के लिए
हाँफती नदी की उम्मीद रख दी।
थोड़ा पानी मांगा, तो बदले मे
हालात मे इतनी नमी रख दी
कि आंखे भी धुंधली हो गई , कुछ देख ना पायी ।

हाँ, कानें सुन रही थीं , तुम्हारे तसल्ली के स्वर ।
जैसे नदियां उफन रही हों ,
पर उफनती नदियों से समुंदर बन नहीं सकता ।
वो तो वहीं की वहीं किनारे पर दम तोड़ती हैं।
क्या हम भी वैसे ही टूटेंगे जैसे रोज टूटते हैं ?

पार किया है हमने इस भूमंडल के साथ
उम्र का यह पड़ाव ।
उदासियों से लदी बाकी उम्र ,
शुकुन की तलाश मे क्या
कब्रें खोदती रह जाएंगी ?
ये कैसी उदासी है, पीछा छोडती नहीं ।
हजारों लम्हों के बाद क्या जिंदगी को यही हासिल है ?
तसल्ली से जी न सके ,
कम से कम तसल्ली से तो मर पाएँ ।
बोलो न, कब तक यूं ही बैठे रहें ?
दुआ मे हाथ उठाए ।

                     -------   xxx ------- 

उम्मीद है

                            

शायद ऐसा पहली बार
देखा है या सुना है ,
जब दुख ने समभाव से
सबको चुना है ।
न जाति का भेद , न लिंग का फर्क दिखा;
न धर्म और शाशक या शोषित कहीं चिन्हित लिखा ।

सरिताओं की गति मंथर हो गई है ,
नाव भी रेत पर अटक गई है ।
सोते एकांत मे इच्छाओं का कंपन है ;
आंसुओं की उम्र बढ़े , शायद इसी मे पीड़ा का जीवन है ।
इस पीड़ा के अंत का स्वर आशावादी है
क्योंकि
मंथर सरिता के श्रोतों मे आशा का गीत है ;
स्वेद कणों से जुट जुट कर बने रेत की नदी में
नाव खींचते नाविक का जीवन संगीत है ।

आशा की मुस्कुराहाट मे सोता एकांत भी जागेगा ,
तब जग की पीड़ा और ये नैराश्य भी भागेगा ।
दुख और विष के प्याले पीकर ही तो होती है ,
सुख-मधु की मृदुता से परिचय ।
नीलकंठ तभी बनते हैं विषपायी, जब हो संघर्ष ;
और हो, अमृत मंथन मे जय ।
मंजिल तक पहुँचना है, जंग के बाद भी जीना है ।
हिम्मत का जामा पहन लो ,
वहाँ का कुछ सफर, साथी के बिना है ।

तम से मत घबराना,
आज की तरह सूरज कल फिर आएगा ।
उम्मीद और हौसले का साथ हो तो
रास्ता कौन रोक पाएगा ?
क्या रवि-रथ को बादल ने कभी भरमाया है ?
ज्योति कलश आँगन मे फिर आएगा,
जैसे हमेशा आया है

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