कोरोना और जिलाधिकारी किरण का “कौशल”!

सुरेशचंद्र रोहरा


आज जब विश्वव्यापी कोरोना संक्रमण काल का समय चल रहा है और औद्योगिक नगर की जिलाधिकारी के रूप में किरण कौशल ने अपनी क्षमता और दक्षता, संवेदनशीलता का परिचय दिया है, बारंबार यह बताया है कि वे किस तरह सतत जाग्रत भावना से काम कर रही है, तो स्मरण हो आता है एक दृश्य-

आप भी पढ़िए देखिए और समझिए कि कोई महिला कैसे बन जाती है आईएएस किरण कौशल….

एक दफा एक छात्रा ने कलेक्टर किरण कौशल से पूछा था- क्या आप बचपन से ही कलेक्टर बनना चाहती थी ..?

जवाब में श्रीमती कौशल ने कहा था- वे पहले डॉक्टर बनना चाहती थी, फिर चार्टेड एकाउंटेंट 20 दिन में मेंस की पढ़ाई कर एग्जाम दिया था । उन्होंने बताया था- मुझे 26 साल की उम्र में लगा कि मैं कलेक्टर बन सकती हूं!

इसीलिए एक्ससीडेंटली कलेक्टर बन गई। एक और छात्रा ने कलेक्टर किरण कौशल से पूछा कि अभी से मैं क्या करूँ जो आपकी तरह आईएएस बन सकू..?

जवाब में श्रीमती कौशल ने समझाया- सभी विषयों की बेसिक चीज़ों को समझिए। न्यूज़ पेपर देखते रहिए पढ़ते रहिए। सिविल सर्विसेज की बेसिक जनरल नॉलेज को पढ़िए।


कोरोना काल में जिलाधीश किरण कौशल का कौशल औद्योगिक तीर्थ कोरबा का एक एक बंदा तो देख रहा है छत्तीसगढ़ की आवाम को भी साफ दिखाई दे रहा है कि किस तरह उन्होंने औद्योगिक तीर्थ कोरबा नगरी को कोरोना महामारी के इस संक्रमण काल में अपने “कुशल नेतृत्व” में प्रबंधन से साफ-साफ बचा कर निकालने के लिए कितना “अथक” परिश्रम किया है।
आज जब अचानक छत्तीसगढ़ में कोरोना संक्रमण फैलने लगा रायपुर दुर्ग राजनांदगांव जैसे महत्वपूर्ण शहर में कोरोना संक्रमण फैलता चला गया कोरबा आते आते कोरोना संक्रमण ने प्रारंभ में जो अपना रौद्र रूप दिखाया था वह आज थम गया है… मगर कैसे आइए! आज रिपोर्ट में हम यहां शब्द शब्द देखने का और आपको बताने का प्रयास करते हैं यह किस तरह औद्योगिक नगरी कोरबा जहां सारे देश के हर प्रांत, जाति के लोग जीवन बसर कर रहे हैं आना-जाना निरंतर बना रहता है। ऐसे संवेदनशील जिले को कोरोनावायरस कोविड 19 संक्रमण से बचा ले जाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। क्योंकि यह सभी जानते हैं कि कोरबा में जहां भारत अल्मुनियम कंपनी जैसी देश की महत्वपूर्ण एलमुनियम कंपनी है शीर्ष विद्युत प्लांट है।वहीं देश की नवरत्न कंपनी के स्वरूप में जाने वाली “नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन” जैसी कंपनी भी है तो कोयला खदान की दर्जन भर से अधिक एशिया में सबसे बड़ी दीपका गेवरा जैसी कोयला खदानें हैं। जहां से काला हीरा उत्खनन हो रहा है हजारों यहां मजदूर और अधिकारी हैं जिनका सीधा संबंध देश के विभिन्न प्रांतों से है और आवागमन तो है ही। ऐसे में कोरोना संक्रमण का सबसे संवेदनशील केंद्र बिंदु कोरबा ही था।

हमने और सारे देश ने देखा है, रायपुर राजधानी से निकट के इस्पात नगरी कहे जाने वाले भिलाई ,दुर्ग और राजनांदगांव में कोरोना संक्रमण के कारण हाहाकार मच गया…. प्रतिदिन सैकड़ों लोग वहां संक्रमित हो रहे थे… लोगों के लिए ऑक्सीजन नहीं था बैड नहीं था। एक महत्वपूर्ण हॉस्पिटल में किस तरह तोड़फोड़ हुई किस तरह एक सप्ताह में ही लगभग 500 व्यक्ति कोरोनावायरस के चलते हलाक हो गए। ऐसी परिस्थितियां कोरबा नगर की भी थी बन सकती थी। मगर किरण कौशल ने कलेक्टर के रूप में जो अपना दायित्व निभाया एक महिला, मातृशक्ति हो कर उन्होंने जिस क्षमता और दक्षता के साथ दिन रात कुशल नेतृत्व दिखाया… परिणाम स्वरूप औद्योगिक कोरबा अंचल सुरक्षित होता चला गया।

यज्ह एक सामान्य बात नहीं है, आज कोरोना के इस महामारी के भीषण समय में अगर कुछ निर्भर करता है तो वह सब कुछ नेतृत्व के कांधे पर ही निर्भर करता है। जिले का नेतृत्व जैसे की हम सभी जानते हैं एक कलेक्टर ही करता है और जिलाधीश के रूप में छत्तीसगढ़ की पहली महिला आईएएस किरण कौशल ने यह दिखा दिया कि चुनौती के अंधेरे समय में भी वे किस तरह एक रोशनी की किरण बन सकती हैं। और उनमें कितनी असीम क्षमता… दक्षता है।

विगत समय में भी सन 2020 में जब कोरोनावायरस कोविड 19 का भयावह प्रकोप हुआ था। सारे प्रदेश ने देखा कि किस तरह कोरबा जिले के उपनगर कटघोरा कोरोना हॉटस्पॉट को उन्होंने दिन रात सामने अपनी निगरानी में एक नेतृत्व दिया और जिले को चाहे वह सुदूर ग्रामीण अंचल हो अथवा पाली, रामपुर, अथवा शहर का औद्योगिक क्षेत्र बालको एनटीपीसी, कुसमुंडा, एसईसीएल सभी जगह उन्होंने अपने दक्षता और नेतृत्व के बूते जिले को सेफ सुरक्षित किया था। आज पुनः यही स्थिति बन गई है और संक्षिप्त में यही कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ की इस बेटी ने अपनी कार्यकुशलता, कौशल से बारंबार यह एहसास करा दिया है कि एक कलेक्टर…. जिलाधीश कैसा होना चाहिए… उन्होंने बंद कमरे में बैठ कर के डिसीजन नहीं लिए उन्होंने बंद कमरे में बैठकर के आदेश नहीं दिए उनकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इस, भयावह संक्रमण काल में भी उन्होंने साहस, हिम्मत और जज्बे का जो प्रदर्शन किया वह दुर्लभ और नमन करने योग्य है।

रौशनी फ्रंट लाइन की !

नगर के वयोवृद्ध बुद्धिजीवी ने बातचीत में कहा- बहुत कोफ्त होती है। आप माने या ना माने, मगर आम आदमी यह सोचता है कि हमारा नेता, जिसे हमने चुना है जिसे हमने अपने सरताज बनाया है वह हमारी देखरेख करेगा हमारा दुख दर्द दूर करेगा! हमेशा हमारे आस पास होगा!! मगर यह बात कोरोना काल में और भी बुरी तरीके से धराशायी हो गई चाहे हमारे चुने हुए पार्षद हों अथवा हमारे गांव के सरपंच हमारे विधायक या मंत्री कोरोना काल में लोगों से अनजाने ही दूर होते चले गए। ऐसे में औद्योगिक जिला कोरबा जिलाधिकारी के रूप में श्रीमती किरण कौशल ने जो संवेदना और कौशल दिखाया वह अद्भुत है।

और यह बात स्वयं सिद्ध हो गई अगर किसी भी महामारी का या किसी भी आपदा का प्रबंधन बेहतर ढंग से हो, तो उस पर काबू पाया जा सकता है। कलेक्टर मैडम ने मैनेजमेंट का जो स्वरूप कोरबा जिला में प्रस्तुत किया वह एक नजीर है, प्रशासनिक दक्षता के साथ संपूर्ण कोरबा जिले के कस्बे, नगर उपनगर और ग्रामीण अंचल जो कि लगभग 410 गांवों में फैला हुआ है ।यहां प्रशासनिक प्रबंधन उत्कृष्ट रूप में दिखाई दिया। जगह-जगह जागरूकता अगर दिखाई दी कोरोना विकराल रूप से धीरे-धीरे अगर सिमट रहा है तो उसका महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि मैडम कलेक्टर का मैनेजमेंट प्रबंधन उच्च श्रेणी का रहा है। यहां आक्सीजन गैस कोई की कमी नहीं रही, अगर हम देखें तो पाते हैं कि जब संपूर्ण देश में गैस के लिए हाहाकार मच गया तो हमारे शहर में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। यहां ना कभी किसी बैड की कमी रहीं न ही इलाज की कोई कमी हुई… आम हो या आम से खास आदमी उसके लिए हॉस्पिटल के ऐसी उच्च स्तरीय व्यवस्था प्रशासन के संरक्षण में दिखाई दी जो अपने आप में अनूठी थी। इस सब का नेतृत्व संचालन श्रीमती किरण कौशल के हाथों में सीधे लोगों ने देखा। प्रमाण स्वरूप उसके परिणाम भी बेहद अच्छे आते चले गए यहां कहा जा सकता है कि अगर नेतृत्व सक्षम ह, अपनी आंखें खुली रखें, खुद चौराहे पर आकर खड़ा हो जाएं तो मजाल नहीं कि कोई पंछी भी पर मार जाए।

श्रीमती किरण कौशल को जो लोग जानते हैं और कभी मिल चुके हैं वह जानते हैं कि जहां उनमें एक सादगी है वही दृढ़ निश्चय का भाव भी उनमें गहन रूप से निहित है। और मुझे लगता है कि यही कारण है कि कोरोना संक्रमण जैसे भयंकर विश्वव्यापी महामारी से औद्योगिक नगर कोरबा को बचाकर निकाल लाने का श्रेय आपके दृढ़ निश्चय को ही है। जिस भांति जिले का प्रबंधन अपने हाथों में लिया और एक एक चीज की मानिटरिंग स्वयं निरंतर रूप से करती रही उसी का परिणाम है कि स्थितियां धीरे धीरे काबू में आती चली गई। और हमने देखा कि किस तरीके से एक विकराल समय जब चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा दिखाई दे रहा था ऐसे तमस भरे समय में किरण कौशल सचमुच यहां के जन-जन की संबल बन गई, रोशनी की किरण बन गई।

श्रीमती किरण कौशल के हाथों में कोरबा किस तरह सुरक्षित रहा यह हम सब ने देखा इसका मूल कारण अगर समीक्षा की जाए तो कहा जा सकता है कि वह हर पल तत्पर रहीं, समय को उन्होंने नहीं देखा और पल पल अपना उन्होंने इसके प्रबंधन में लगा दिया कि किसी भी तरीके से हमारा कोरबा सुरक्षित रहना चाहिए। उसके लिए संपूर्ण जिला प्रशासन को उन्होंने जो कसावट दी है वह सचमुच अद्भुत थी। चाहे चिकित्सा का पक्ष हो या फिर चौक चौराहे पर खड़े होकर संपूर्ण व्यवस्था पर दृष्टिपात करना अपने आंखों से खुद देखना और गलत चीज को वही का वहीं रोक देना एक खास अंदाज जो कि बहुत कम दिखाई देता है। कोरबा को कोरोना से बहुत कुछ बचाने का एक कारण बना लोगों ने देखा कि अंधेरा हो, तो भी कोई बात नहीं! कलेक्टर मैडम चौराहे पर खड़ी है और लोगों से रूबरू है….! उन्हें समझा रही हैं उन्हें बता रही है कि सावधान रहिए बेवजह घर से बाहर मत निकलिए… यह जो भाव भंगिमा थी वह बता रही थी कि यह कोई अपना है , अपनत्व तो से भरा हुआ है। वे हमारी अपनी होने के कारण ही हमें सीख दे रही है ….यह जो संदेश प्रसारित हुआ जादुई काम कर गया… और रोशनी फैलाता चला गया। मैडम किरण कौशल का फ्रंट लाइन में आकर के काम करना ही कोरबा को सुरक्षित करता चला गया।

यहां हम बहुत ही कम शब्दों में यह भी कहना चाहता हूं कि कोरोना जिस तरीके से भयावह रूप दिखा रहा है जिस तरीके से इसकी चपेट में आने के बाद रातों-रात लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं वह एक चिंता का विषय है। यह प्रशासनिक अमले में भी दिखाई दे रहा था। मगर जब जिले की प्रमुख और कलेक्टर के रूप में श्रीमती कौशल ने एक महिला होते हुए भी घर में बैठने की अपेक्षा दफ्तर में बैठने की अपेक्षा, फ्रंट लाइन में आकर के लोगों की जान बचाने का, प्रबंधन का काम किया उससे यह संदेश पहुंच गया कि हमारा दायित्व क्या है…

धन्यवाद मुख्यमंत्री जी!

प्रदेश के मुखिया माननीय श्री भूपेश बघेल जी को बहुत-बहुत धन्यवाद…!
यह इसलिए कि अगरचे श्रीमती किरण कौशल का बेहतर लाभ कोरबा की आवाम को मिल सका है तो उसका एकमात्र कारण यह है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उन्हें हमारे कोरबा जिला का कलेक्टर बना रखा है।
आज जबकि भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री काल को लगभग आधा कार्यकाल व्यतीत होने को है उन्होंने कई जिलों में कलेक्टर बदले मगर यह शायद जिले का सौभाग्य है या भूपेश बघेल की दूरदर्शिता की श्रीमती किरण कौशल जिलाधिकारी बनी हुई है। यह सहज कल्पना की जा सकती है कि ऐसे समय में अगर कोई अन्य सामान्य सा आईएएस जिले का नेतृत्व संभाल रहा होता तो क्या होता?

कोई भी छोटा सा छोटा काम, विकास, ऊंचाई संस्पर्श करने की जद्दोजहद हो, जब तलक काम करने वाले दो हाथ और एक प्रखर बुद्धि न होगी, तो परिणाम कभी भी अच्छे नहीं आ सकते। इस कसौटी पर अगर हम देखें तो श्रीमती किरण कौशल ने अपने कुशल नेतृत्व और जमीनी दिन चर्या के कारण औद्योगिक नगरी को को बिलाऊ सा होने से बचा लिया।
छत्तीसगढ़ के ही एक बड़े विशाल औद्योगिक नगर का नाम है भिलाई, जहां इस्पात का विशाल संयंत्र है। यहां कि हालात भी बिल्कुल हमारे शहर जैसे ही हैं यह भी मिनी भारत है ! जहां देश भर के सभी प्रांतो के लोग रहते हैं। यहां के हालात आखिर कैसे बिगड़ गए यह सब देख कर के एक भय का संचार होता है कि उद्योग नगरी में जनहानि से हम बच गए। भिलाई नगर में कोरबा से बहुत अच्छा चिकित्सकीय प्रबंधन है सभी जानते हैं कि राजधानी से बहुत निकट होने के कारण और एक संस्कारशील नगरी होने के कारण भिलाई नगर का पूरे भारत में एक ऊंचा स्थान है। मगर इसके बावजूद यह कहने में कोई गुरेज नहीं और यह तथ्य समीक्षा में भी आ ही जाएंगे की किस तरह वहां प्रबंधन की कमी रह गई और हालात दयनीय होते चले गए। आज हम निष्पक्ष भाव से देखें तो कह सकते हैं कि अगर जिलाधीश की युति अगर सशक्त होगी तो शायद भिलाई जैसी जनहानि नहीं होगी। आज हम इस पन्ने पर बड़े ही गौरव के साथ यह कहने की हिम्मत कर रहे हैं कि जिलाधीश श्रीमती किरण कौशल ने सचमुच एक कमाल कर दिखाया है । मानवीयता और संवेदना, प्रशासनिक कसावट का जो रंग आपने दिखाया उसी का परिणाम है कि औद्योगिक तीर्थ कोरबा नगरी कोरोना संक्रमण के भयावह जाल से बाहर दिखाई दे रही है।
श्रीमती किरण कौशल और जिले की उनकी प्रशासनिक टीम ने लोगों के साथ एक रागात्मक संबंध बनाते हुए जो संदेश दिया वह अपने आप में एक महत्वपूर्ण कारामात बन गया परिणाम हमारे सामने है।
(लेखक दैनिक लोक सदन, कोरबा, छत्तीसगढ़ के संपादक हैं)
gandhishwar.rohra@gmail.com

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