हर रंग में रंग जाती हैं, रंगीली ये दुनियां,
किस किस तरह के रंग दिखाती हैं ये दुनिया।
कितने किस्म के लोग जो बसते रहे यहां,
फिर भी मगर बेरंग क्यों लगती रही दुनिया।

तु देखता है जब इसे तेरे हिसाब से,
चाहत, कभी नफ़रत भरी लगती रही दुनिया।
चंद सिक्कों के चाहत में बिकता हुआ यहां,
जो गिर गया उसेही उठाती रही दुनिया।
ना शर्म हया का कोई पैमाना रहा है,
हर शोखियों का रंग दिखाती रही दुनिया।
आवाजें, दर्दे न्याय की सुनता नहीं कोई,
अन्याय, फरेबी से ही सजती रही दुनिया।
कब दिल की लगी दिल को ले डूबेगी यहां पर,
बेमौत मार डालेगी जालिम है ये दुनिया।
शहरों की बात होती, गावों के दुकान पर,
कुचें गली मुहल्ले में बसती रही दुनिया।
आवाज लगाएंगे जो इंसाफ की अगर,
झूठे गुनाह पर सजा सुनाएगी ये दुनिया।
क्या है ये दुनिया? क्यों ये दुनिया ऐसी बनी है?
उसकी नज़र में एक मजाक बन गई दुनिया।
कीर्ति शर्मा (प्रित)






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