कल जो बाप, बेटे की उंगली थामे
उसे चलना सिखाता था,
आज उसी बाप की उंगली बेटे को खटकने लगी है।
संवेदना खोने वाली पीढ़ी,
बाप से बड़ी होने लगी है।
रिश्तों में प्यार और विश्वास
नाम को रह गया है,
इसका सारा मोल ताश के पत्तों सा ढह गया है।
जहां परिवार की परवरिश
ताया दादा के आशीर्वाद से हुआ करती थीं,
उसकी जगह वीरानी पलती है,
यह बात हर बुजुर्ग के दिल में खलती
है।
भरोंसे की बात अब
किताबों तक सीमित रह गई हैं,
सारी इंसानियत स्वार्थ के गंदे नाले से
होकर बह गई हैं।
दादा दादी की कहानियों का बोध
फिका पड़ गया है,
क्योंकी उसकी जगह अब पब्जी रह गया है।

कीर्ति शर्मा (प्रित)






