एसडी सिंह: भलो भलाइहि पै लहइ

सुरेशचंद्र रोहरा

एसडी सिंह…. शिव दयाल सिंह! से मैं जब भी मिला, दो चार हुआ उनके मुख से अनायास ही सिर्फ और सिर्फ मजदूरों के हित की बात नहीं सुनी।
जब भी मुलाकात होती बातों बातों में ही वह कहने लगते मजदूरों को न्याय मिलना चाहिए! श्रमिकों और आम आदमी का पहला अधिकार है कि उन्हें शासन की योजनाओं का लाभ मिले, रिक्शा वाले गरीब ठेले वाले आम मजदूर श्रमिक के लिए मैं लड़ता रहूंगा और मेरे सामने उनका कोई अहित नहीं हो सकता।
मैं आश्चर्य भाव से एस डी सिंह की ओर तकता रहता था और मन ही मन सोचता था कि ठाकुर एस डी सिंह जो कि एक साधन संपन्न व्यक्ति हैं कैसे क्यों मजदूरों के हित के बारे में सोचते रहते हैं…. आखिर इसके पीछे का रहस्य क्या होगा?
मैं महसूस करता था कि उनके रग रग में मजदूरों और शोषितों के प्रति आक्रोश था और उन्हें न्याय दिलाना चाहते थे वह अक्सर कहा करते थे कि मजदूरों और श्रमिकों का पहला अधिकार है और उसके लिए हमें जितना भी लड़ना पड़ेगा मैं लडूंगा और मेरे होते उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।

एक फैंटेसी के कथा नायक की तरह विभूति थे एसडी सिंह, जो हमारे आसपास कहीं भी नहीं होते।आज के दुनिया में लोग कितनी स्वार्थी हो चुके हैं हम अपने आसपास देखते हैं राजनीति कैसी गंदगी कीचड़ जैसी हो गई है हम देख रहे हैं…. मगर इस कीचड़ में सिंह साहब जैसे कंवल के फूल जैसे लोग भी थे जो अपनी खूबसूरती और अपने महक के कारण औद्योगिक नगर कोरबा की फिजाओं में हमेशा याद किए जाएंगे।

एक दफा मैं उनके आवास पर भी गया और आमने सामने मुलाकात हुई आप बेहद सहज और सरल व्यक्ति थे। साफ-साफ बात करना उनके व्यक्तित्व का ऐसा गुण था जो दुर्लभ कहा जा सकता है। अपने इसी साफगोई के कारण उन्हें अविभाजित मध्य प्रदेश के जननायक तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह पसंद किया करते थे चतुर सुजान कहे जाने वाले अर्जुन सिंह जैसा पारखी व्यक्ति ही हो सकता है जो उन्हें सम्मान के साथ अपने निकट सोफे पर बैठाया करता था। ठीक इसी घटना से आप समझ सकते हैं कि एसडी सिंह होने का क्या मतलब होता है एसडी सिंह हैं जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और अपने कामकाज अपनी बातचीत की शैली से अर्जुन सिंह जैसे महानायक को आकर्षित कर लिया था कि उनकी और सम्मान और गंभीरता से देखें। हमें समझ सकते हैं कि जब अर्जुन सिंह के सामने कैबिनेट मंत्री भी बैठने के लिए घबराते थे तब वे एस डी सिंह को बड़ी आत्मीयता के साथ अपने पास बैठा कर बातचीत करते थे और उनकी राजनीतिक समझ को महत्व देते थे तो वह आदमी कितने बड़े कद का होगा।

यही नहीं एसडी सिंह एक समय में बिलासपुर जिले की राजनीति के केंद्र बन चुके थे। यह वह समय था जब छत्तीसगढ़ के गांधी कहे जाने वाले बोधराम कंवर विधायक हुआ करते थे और खादी बोर्ड मध्य प्रदेश के अध्यक्ष भी इस दरमियान कोरबा में रहते हुए भी संपूर्ण बिलासपुर जिले की राजनीति और विकास के घटनाक्रम में उनका सीधा दखल होता था। जिले के विकास के लिए तत्कालीन समय के लगभग पंद्रह सोलह विधायक एस डी सिंह से बातचीत किया करते और सिंह साहब अपने ढंग से अंचल के विकास की योजनाओं में भागीदारी किया करते ।

तत्कालीन समय के विधायक बोधराम कंवर हों या प्यारेलाल कंवर या बी एल यादव, बंसीलाल घृतलहरे, चित्रकांत जायसवाल जैसे नेता भी एसडी सिंह को सम्मान की दृष्टि से देखा करते थे, उनकी बात मान जाती थी।

यह सभी जानते हैं कि औद्योगिक नगर कोरबा जब अपने प्रारंभिक विकास के समय मानो अंगड़ाई ले रहा था उस दरमियान सतपाल वासन कोरबा कांग्रेस पार्टी के सर्वस्व हुआ करते थे, इसके पश्चात अल्प समय तक सत्यनारायण जायसवाल और फिर एक समय में एस डी सिंह परिवार ऐसी महत्वपूर्ण केंद्रीय भूमिका में था कि कांग्रेस पार्टी का संचालन उन्हीं के आवास से हुआ करता था। इस परिवार ने कांग्रेस पार्टी को सिंचित, पल्लवित किया और वही कांग्रेस आज प्रदेश की सत्ता पर काबिज है। कोरबा अंचल में एस डी सिंह ऐसी शख्सियत और विभूति के रूप में सदैव याद रखे जाएंगे जिन्होंने एक तरफ जहां गरीब आवाम के लिए हमेशा आवाज बुलंद की वहीं कांग्रेस पार्टी को मजबूती प्रदान करने में अपना अहम योगदान दिया है। सबसे बड़ी विशेषता उनकी यही थी कि वह हमेशा सच का साथ देते थे गरीब आदमी का साथ देते थे…. यही नहीं, वे गरीब आदमी के लिए संघर्ष करते थे और अपनी आवाज बुलंद करके उन्हें न्याय भी दिला देते थे। अापकी इन खासियत के कारण यह कहा जा सकता है कि एस डी सिंह जैसा व्यक्तित्व कोरबा जिला की थाती थी…. एक उपलब्धि थी जिसका लाभ जहां कांग्रेस पार्टी ने उठाया वही उन्हें साडा अध्यक्ष यानी विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बना करके क्षेत्र को अल्प समय के लिए दिया ।आज जब हम पीछे पलट कर उनके काम को देखते हैं तो कह सकते हैं कि अगर एस डी सिंह जैसी विभूति को साडा अध्यक्ष के रूप में ज्यादा समय काम करने का मौका मिला होता तो क्षेत्र का भला होता। याद आता है उनका साडा अध्यक्ष का कार्यकाल जब उनके और मुख्य कार्यपालन अधिकारी अमरजीत सिंह के छत्तीस के संबंध हो गए थे एस डी सिंह का अपना कोई व्यक्तिगत विवाद नहीं था। बात सिर्फ इतनी थी कि उसी दरमियान कर्मचारियों ने “साकेत भवन” का घेराव कर दिया था उनके तेवर को देखकर के अमरजीत सिंह गहरवाल नाराज हो गए और पुलिस बुला करके उन पर एक्शन लेने का आदेश दे दिया था…इसी दरमियान एस डी सिंह अचानक ही पहुंच गए और जब उन्होंने साकेत भवन में पुलिस को देखा तो माजरा समझ गए और साफ साफ कह दिया कि मेरे रहते किसी कर्मचारी पर पुलिस का डंडा नहीं चलेगा।यह साडा के कर्मचारी हैं और उन्हें अपनी बात रखने का पूर्ण अधिकार है ….मैं मुख्यमंत्री से बात करता हूं इनकी समस्याओं को हल करने का प्रयास करूंगा। इस तरह एक बड़ा घटनाक्रम गहरी मानवीय सोच के कारण देखते ही देखते सुलझ गया था।

“सत्य” और “साहस” का अनुपम मिश्रण…

एस डी सिंह के व्यक्तित्व को अगर हम आज याद करें, पीछे मुड़कर देखें तो ऐसी जाने कितनी घटनाएं हैं जो यह याद दिलाती है कि औद्योगिक नगरी कोरबा में एसडी सिंह जैसा व्यक्तित्व विरल है।

इस अनोखे और अनुपम व्यक्ति की एक घटना ऐसी है जिसे शायद बहुत कम लोगों को ही पता है- एक समय में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर प्रधानमंत्री रहे पामुल वेंकटपति नरसिम्हा राव के संरक्षण में पार्टी पर राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रहे सीताराम केसरी का वर्चस्व हो गया था। सीताराम केसरी राष्ट्रीय अध्यक्ष बन कर सिर्फ अपनी ही चला रहे थे और सोनिया गांधी को उन्होंने एक प्रकार से दरकिनार कर दिया था। ऐसे समय में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की एक बैठक दिल्ली में आयोजित हुई थी जिसमें देश भर के कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता क्षत्रपों को बुलाया गया था। एसडी सिंह भी इस बैठक में प्रदेश के अन्य नेताओं के साथ उपस्थित थे। बैठक में सीताराम केसरी अध्यक्ष के रूप में ले रहे थे और उनका मूल एजेंडा था कि कांग्रेस पार्टी अब उन्हीं के चंगुल में रहेगी। इसी समय अचानक श्रीमती सोनिया गांधी वहां आ पहुंची उन्हें देखकर के माहौल थोड़ा बदला। मगर मौकापरस्त सीताराम केसरी ने उनकी अनदेखी करते हुए अपनी ही चलानी शुरू कर दी। श्रीमती सोनिया गांधी शालीनता से वहां आकर के दूर कार्यकर्ताओं के पास बैठ गई। सीताराम केसरी और अन्य महत्वपूर्ण सिपाहसलारों ने सोनिया गांधी को कोई तवज्जो नहीं दी। इसी समय एस डी सिंह उठ खड़े हुए और ऊंची आवाज में कहा- यह क्या हो रहा है! यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता… नेहरू खानदान की बहू राजीव गांधी की धर्मपत्नी को क्या इस तरह उपेक्षित किया जाएगा, यह हम बर्दाश्त नहीं कर सकते ….
इतना सुनना था कि कई लोगों ने उनके साथ आवाज में आवाज मिलाई, देखते ही देखते माहौल सीताराम केसरी के हाथों से निकल गया बैठक में जमकर हंगामा शुरू हो गया …सीताराम केसरी को कांग्रेसी, सोनिया गांधी समर्थकों ने उठाकर के उसी समय हटा दिया। इस तरह सीताराम केसरी का कांग्रेस पार्टी से पतन हो गया।
यह घटना बताती है कि किस तरह एसडी सिंह अचानक समय पर अद्भुत साहस का परिचय देते हुए अपनी बात को रखने में कभी भी गुरेज नहीं करते थे। चाहे इससे उनको हानि हो या लाभ या वह कभी नहीं देखते थे। ऐसी ही जाने कितनी घटनाएं किंवदंती बन करके अंचल के राजनीतिक हलके में चर्चा का विषय बनी हुई है,और आज उनके दुखद देहावसान के बाद याद किया जा रहा है.

राजनीति के महा समंदर में एस डी सिंह ने बारंबार सत्य के साथ साहस का प्रयोग करते हुए विपरीत परिस्थितियों पर किस तरह विजय प्राप्त की उसकी कुछ बांनगी हम यहां प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।
अजीत जोगी की सरकार के पतन के बाद लंबे समय तक छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार थी ऐसे में कांग्रेस पार्टी बार-बार नए-नए प्रयोग करती थी इसी में एक प्रयोग था बारंबार नये प्रदेश प्रभारी की नियुक्ति। एक समय नारायण सामी जो भी वर्तमान में कांग्रेस पार्टी के बड़े चेहरे हैं कांग्रेस के आलाकमान के आदेश पर छत्तीसगढ़ का कामकाज संभाल रहे थे। वह कोरबा आए थे और एक कांग्रेस की मीटिंग का आयोजन किया गया था। यह महत्वपूर्ण बैठक ट्रांसपोर्ट नगर के आशीर्वाद भवन में रखी गई थी। जहां कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गज नेता और कार्यकर्ता उपस्थित हुए थे। नारायणसामी ने अपने संबोधन में कांग्रेस की एकता और आने वाले भविष्य के लिए रणनीति की बात रखी कुछ लोगों ने जो कि मंच पर थे अपनी बात रखने लगे जो एसडी सिंह को नागवार गुजरी और उन्होंने वहीं खड़े होकर जब हुंकार भरी और अपनी बात कही की कागज पार्टी के लिए यह बातें कदापि लाभप्रद नहीं होंगी, हम उसका विरोध करते हैं तो वहां हंगामाखेज स्थिति पैदा हो गई। एसडी सिंह के खिलाफ कुछ लोग खड़े होकर के अपनी बात कहने लगे एस डी सिंह अकेले अपनी बात बड़े ही दमखम के साथ रख रहे थे। माहौल सर गर्म हो गया और प्रयास करने के बाद भी आगे बैठक जारी नहीं रखी जा सकी। यह माना जाने लगा कि एस डी सिंह के कारण आज कांग्रेस की बैठक रद्द हो गई और इसका संदेश आलाकमान तक अच्छा नहीं जाएगा।
मगर जब बाद में रायपुर में समीक्षा हुई तब रायपुर की एक महत्वपूर्ण बैठक में नारायण सामी ने माना कि एस डी सिंह अपनी जगह सही बात कर रहे थे और कांग्रेस पार्टी का हित भी इसी में है कि उनकी बातों को समझ कर के अनुकरण किया जाए।
एस डी सिंह ने हमेशा धारा के विरुद्ध बहते हुए वही किया जो जनहित में था, पार्टी के नेता होकर अपना हित कभी नहीं साधा। राजनीति की इस मैली गंगा में सभी लोग अपने हाथ धो रहे हैं दुनिया भर के कुकर्म करने के बाद राजनीति में आकर के पुण्यवान हो जाते हैं एसडी सिंह ने यह नजीर उपस्थिति की कि सत्य क्या है और साहस के साथ उसे किस तरह रखा जाता है।


दान, सेवा और त्याग की त्रिवेणी

एचडी सिंह को जानने वाले बहुत कम जानते हैं, क्योंकि वे जो सेवा के काम करते थे उसका प्रचार नहीं करते थे। बस अपना काम करना उनका लक्ष्य उद्देश हुआ करता था। यही कारण है कि एक तरफ जहां तत्कालीन मध्य प्रदेश के महत्वपूर्ण नेता अर्जुन सिंह, दिग्गविजय सिंह, विद्याचरण शुक्ल, अजीत प्रमोद कुमार जोगी और तो और भाजपा के कार्यकाल के समय मुख्यमंत्री रहे डॉक्टर रमन सिंह जैसी शख्सियतों को उन्होंने अपनी राजनीतिक समझदारी से प्रभावित कर लिया था। दूसरी तरफ उन्होंने जीवन भर लोगों की मदद की, दान किया जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है अपने समाज को निहारिका क्षेत्र में स्थित अपनी करोड़ों की जमीन को दान दे देना। जहां उन्होंने राजपूत क्षत्रिय समाज को मजबूत बनाने में योगदान दिया, वहीं स्थानीय गायत्री परिवार के भी अगुआ थे उन्होंने आचार्य श्रीराम शर्मा से प्रभावित होकर दीक्षा ली और अंचल में “हम सुधरेंगे जुग सुधरेगा”का नारा बुलंद करते हुए गायत्री परिवार को ऊंचाई पर पहुंचाने में अपना योगदान करते रहे…आज गायत्री परिवार जहां शहर में महत्वपूर्ण शिक्षा संस्थान के रूप में अपना योगदान दे रहा है। वहीं एस डी सिंह ने लायंस क्लब को भी अपना महत्वपूर्ण अवदान दिया सकल जैन समाज और लांयस क्लब ने मिलकर के लगभग 20 वर्ष पूर्व “पशु वध” को रोकने के लिए जागरूकता अभियान चलाया था…. इसके लिए एसडी सिंह ने छत्तीसगढ़ के कई महत्वपूर्ण मंदिरों की परिक्रमा की और प्रयास किया कि मंदिरों में होने वाला पशु वध रुक जाए। यह एक ऐसी विभूति थे जो हर कहीं उपस्थित हो जाया करते थे और चाहते थे कि जितना हो सके समाज में जागरूकता, सेवा, त्याग, समर्पण का प्रचार प्रसार होना चाहिए।

लगभग तीन दशक पूर्व कुसमुंडा एसईसीएल परियोजना में ए. कुमार महाप्रबंधक हुआ करते थे। एसईसीएल की जैसे कि फितरत है जमीन लेने के बाद वह भूविस्थापितों के साथ दोहरा आचरण शुरू कर देता है कोरबा के के आसपास जब भू विस्थापितों का आंदोलन शुरू हुआ तो गांधी कहे जाने वाले बोधराम कंवर जी के नेतृत्व में प्रबंधन के साथ बैठक हुई जिसमें ए. कुमार ने जब गोल-गोल बातें करनी शुरू की तो एसडी सिंह उठ खड़े हुए और साफ साफ शब्दों में कह दिया सुनो! भूविस्थापितों के साथ अन्याय बंद कर दो तभी बात होगी अन्यथा गांधीजी आपके पक्ष में खड़े नहीं हो सकते अंततः भू विस्थापितों के सामने एसईसीएल प्रबंधन ने हथियार डाल दिए समझौता हो पाया।
ऐसे ही एक घटना क्रम में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पश्चात राज्यसभा सांसद रामाधार कश्यप के कुछ समर्थक एसईसीएल में अपनी नैया पार लगाने की चेष्टा कर रहे थे, जैसे ही इस बात का भान एस डी सिंह को चला उन्होंने इसका प्रतिकार किया। आगे रामाधार कश्यप ने भी माना कि उनके समर्थक बेजा फायदा उठाने की कोशिश कर रहे थे जो नाजायज है।

एसडी सिंह एक ऐसी विभूति थे जिनकी साख हर संस्था और पार्टी में थी, कांग्रेस पार्टी हो या भाजपा अथवा अन्य कोई दल हर जगह उन्हें सम्मान मिलता था वह एक ऐसे व्यक्ति थे जो बंधन पसंद नहीं करता था, जो किसी बाड़े में कैद नहीं हो सकता था । आजीवन एक स्वतंत्र चेतना के साथ लोगों का शुभ और मंगल करते रहे थे। ऐसे लोग बहुत कम होते हैं जो दान, त्याग और समर्पण को जीवन में महत्त्व देते हैं। आप पूर्ण रूप से सामाजिक व्यक्ति थे जो लोगों के हित की सोचते थे और बात ही नहीं करते थे काम करके भी दिखाते थे । जब वह समझ जाते थे कि यह हमारे साथी हैं को समर्पित होकर के उनके लिए सब कुछ भी करने को तैयार हो जाते थे, उतार और चढ़ाव को कभी नहीं देखते थे।

यही कारण है कि हम सन 77 का दृश्य देखते हैं- तो याद आता है एसडी सिंह जी धोती पहने हुए हैं और कंधे पर “हलधर किसान” का चुनाव चिन्ह उठाकर के चल रहे हैं और पूरा क्षेत्र उनका अनुसरण करने लगता है। यही एसडी सिंह आने वाले समय में कांग्रेस के प्रथम पंक्ति के नेता बन करके सेवा भावना का जो रंग दिखाते हैं वह इतिहास बन चुका है। जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।
संभवत इसीलिए लगभग 500 साल पहले गोस्वामी तुलसीदास जी कह गए हैं-
भलो भलाइहि पै लहइ, लहइ निचाइहि नीचु,
सुधा सराहिअ अमरताँ, गरल सराहिअ मीचु‌.
खल अघ अगुन साधु गुन गाहा, उभय अपार उदधि अवगाहा.
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने, संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने.
अर्थात
भला भलाई ग्रहण करता है और नीच नीचता ग्रहण करता है। अमृत अमरता की सराहना करता है और जहर मौत की… इसीलिए दुष्टों, पापियों के खामियों और साधुओं के गुणों की अनगिनत अथाह समुद्र जैसी कहानियां सुनने को मिलती हैं, जिनमें इनके गुण और दोषों का जिक्र मिलता है, क्योंकि बिना उनको पहचाने न तो उन्हें स्वीकारा जा सकता है, न ही उनका त्याग हो सकता है.

gandhishwar.rohra@gmail.com

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