आमदनी ही नहीं स्वास्थ्य का भी रखते हैं ध्यान 2,000 से 3,000 रुपए की होती है अतिरिक्त आमदनी

गरियाबंद/ रायपुर (छत्तीसगढ़) ‘’कभी किसी से उधार लिया तो कभी किसी का उधार चुकाया, आमदनी कम और खर्चे ज्यादा थे । गांव में गौठान बना । सूट बूट पहने एक बाबूजी आए उन्होंने हमारे स्व सहायता समूह में वर्मी कंपोस्ट खाद बनाने को बताया और कहा इसमें सप्ताह में 3 से 4 घंटे का काम है और माह में 2,000 से 3,000 तक की अतिरिक्त आमदनी हो जायेगी।“-दीदी ओमेश्वरी निषाद |

यही कहानी फिंगेश्वर विकासखण्ड की 20 महिलाओं की भी है जो गौठानों में वर्मी कंपोस्ट खाद बनाकर अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं ।

दीदी ओमेश्वरी निषाद बताती हैं, हमारे यहां जब गौठान बना तो हमारे स्व सहायता समूह राजीव लोचन स्वसहायता समूह बोरसी में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एन आर एल एम (बिहान) के यंग प्रोफेशनल पिंगलेश्वर सिंह राजपूत और ग्रामीण कृषि विभाग के कृषि अधिकारी लीलाधर साहू ने आकर वर्मी कंपोस्ट खाद बनाने के बारे में बताया । शुरूआत में हमारे यहां से इस कार्य के लिए कोई भी तैयार नहीं हुआ । आरंभ में इस कार्य में इतनी रूचि भी नहीं थी उसके उपरांत राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एन आर एल एम (बिहान) एवं कृषि विभाग गरियाबंद द्वारा समय-समय पर इसके बारे में प्रशिक्षण दिया गया । इसमें वर्मी खाद बनाने की विधि एवं वर्मी खाद से होने वाले फायदों के बारे में विस्तार से बताया गया ।

तत्पश्चात मेरी रुचि वर्मी कंपोस्ट खाद बनाने की ओर बढ़ी और हमारे समूह की अन्य दीदियों ने भी इस काम में रुचि दिखाई और हमने वर्मी कंपोस्ट खाद निर्माण का कार्य शुरू किया गया । अब हमारे गौठान से वर्मी कंपोस्ट खाद का उत्पादन किया जा रहा है। जिसका उपयोग उद्यानिकी कार्य और कृषको को कृषि कार्य के लियें वर्मी खाद प्रदान कर अतिरिक्त आमदनी मिल रही है ।

सप्ताह में 2 से 3 घंटे का काम रहता है और माह में 2,000 से 3,000 तक की अतिरिक्त आमदनी भी हो जाती है। हालांकि कोरोनावायरस के कारण बहुत से उधयोग धंधे प्रभावित हुए हैं लेकिन हमारा काम बदस्तूर जारी है, इसका कारण यह है कि हम अपने स्वास्थ्य को लेकर भी काफी सजग हैं क्योंकि हमें पता है अगर हमें अतिरिक्त आमदनी करनी है तो अतिरिक्त श्रम भी करना पड़ेगा और अतिरिक्त श्रम एक स्वस्थ शरीर ही कर सकता है इसलिए जबसे कोरोना संक्रमण का दौर शुरू हुआ है तब से केंद्र में बिना मास्क लगाए किसी को भी अंदर आने की अनुमति नहीं मिलती है और 2 गज की शारीरिक दूरी का पालन करना भी सभी के लिए अनिवार्य है । विशेष रूप से जब वर्मी कंपोस्ट खाद को सुखाकर छानने और छानकर बैग में भरते हैं तो उस समय 2 गज की शारीरिक दूरी बनाए रखना सभी के लिए अनिवार्य है । अब तो यह सब कोरोना अनुकूल व्ययवहार हमारी नियमित दिनचर्या बन चुके हैं ।

यंग प्रोफेशनल पिलेश्वर सिंह राजपूत ने बताया शुरू में यह काम इतना आसान नहीं था । कई बार स्व सहायता समूह जाकर उत्साहवर्धन करना पड़ा । जब समूह की महिलाओं में रुचि पैदा हुई उसके उपरांत कृषि विभाग के सहयोग से जिला स्तर पर खाद निर्माण का प्रशिक्षण करवाया गया । जो कई चरण में चला । प्रशिक्षण उपरांत गौठान में गोबर को एकत्रित कर एक बड़ी टंकी में डलवाया जाता है । 40 से 45 दिन का समय वर्मी खाद के निर्माण में लगता है । उसके बाद खाद को निकालकर उसे सुखाया जाता है। पैकिंग करवा कर स्थानीय बाजार में और कृषकों को भेजा जाता है। सप्ताह में 3 से 4 घंटे देना होते हैं । वर्तमान में 8.50 ₹ प्रतिकिलो की दर से में बेचा जा रहा है । उद्यानिकी विभाग एवं कृषकों के माध्यम से अच्छे उत्पादन के लिए बेचकर समूह की महिलाएं 2,000 से 3,000 ₹ अतिरिक्त आय प्राप्त रही है ।

जिला कार्यक्रम प्रबंधक राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन गरियाबंद पतंजलि मिश्र कहते हैं कि कोविड-19 के दौरान समूह की महिलाओं को यंग प्रोफेशनल के माध्यम से स्वास्थ्य को बेहतर रखने के लिए फेस मास्क लगाने और कार्य के दौरान शारीरिक दूरी बनाए रखने की जानकारी प्रदान की गई है। मिशन नियमित रूप से स्थानीय स्तर पर नवाचार करके लोगों की आमदनी बढ़ाने के साथ साथ बेहतर स्वास्थ्य के लिए भी प्रयासरत है ग्रामीण स्तर पर समुदाय का अच्छा समर्थन मिलता है ।

ग्रामीण कृषि अधिकारी लीलाधर साहू ने बताया केंचुआ खाद बनाने की जानकारी महिलाओं को दी गई । राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एन आर एल एम (बिहान) एवं कृषि विभाग गरियाबंद द्वारा फिंगेश्वर विकासखण्ड के बोरसी की राजीव लोचन स्व सहायता समूह, जन चेतना ग्राम संगठन जेंजरा, जय मां जतमई ग्राम संगठन रोहिना, जय मां काली ग्राम संगठन सुरसा बांधा, तिरंगा महिला ग्राम संगठन भेण्ड्री लो. की दीदियों को समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है । खाद बनाने की विधि एवं वर्मी खाद से होने वाले फायदे के बारे में विस्तार से बताया जाता है जिसका उपयोग उद्यानिकी कार्य और कृषको को वर्मी खाद प्रदान कर जैविक खेती को बढावा दिया जा रहा है । जिससे आने वाले समय में इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे ।


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