
कोरबा / आज हलषष्ठी (कमरछठ) है। माताएं पूरे दिन व्रत रखेंगी। दोपहर में पूजा के लिए माताएं उस स्थान पर जुटेंगी जहां सगरी बनाई गई है। यहां हलषष्ठी माता की स्थापना कर 6 प्रकार के भोग चढ़ाए जाएंगे। 6 तरह के खिलौने अर्पित किए जाएंगे। फिर 6 तरह की कथाएं कहीं जाएंगी और सगरी में 6 बार जल डाला जाएगा। इसके बाद माताएं अपनी संतान की पीठ पर 6 बार कपड़े की पोटली से थाप मारेंगी और 6 प्रकार की भाजी खाकर अपना व्रत पूर्ण करेंगी।
महामाया मंदिर के पुजारी पं. मनोज शुक्ला ने बताया कि कमरछठ को हलषष्ठी, हलछठ या खमरछठ के नाम से भी जाना जाता है। माताएं सुबह महुआ पेड़ की डाली से दातून करें और व्रत का संकल्प लें। कोशिश करें कि घर में सगरी बनाएं। इसके लिए घर के आंगन में अगर-बगल दो गड्ढे खोदें। इसे बेर, पलाश, गूलर की टहनियों, काशी आदि फूलों से सजाएं। इसके सामने मिट्टी के खिलौने, शिवलिंग, गौरी-गणेश, कार्तिकेय, नंदी और हलषष्ठी माता की प्रतिमा स्थापित करें।
आसपास रहने वाली अन्य माताओं को इकट्ठा करें और सब मिलकर माता हलषष्ठी की कथा का श्रवण करें। माता को सुहाग सामग्री अर्पित करें। फिर सगरी में जल अर्पित करें। कपड़े का एक टुकड़ा अपने साथ रखें। इस कपड़े को सगरी के जल में डूबाकर संतान की पीठ पर 6 बार थपकी मारें। इसके बाद माताएं पसहर चावल, 6 प्रकार की भाजी, दही आदि ग्रहण कर व्रत पूर्ण कर सकती हैं।
वैज्ञानिक पद्धति से भी लाभ
शाम को महिलाएं पसहर चावल, महुआ और 6 प्रकार की भाजियों से अपना व्रत तोड़ेंगी। व्रत तोड़ने में जिन खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल होता है उनका अपना वैज्ञानिक महत्व है। महुआ जहां औषधीय गुणों से युक्त होता है, पसहर चावल जलन, एलर्जी, कैंसर के खतरे को कम करता है। वजन को भी नियंत्रित करता है। तरह-तरह की भाजियों से प्रोटीन, विटामिन बी6 जैसे मिनरल मिलते हैं जो पाचन क्रिया, बाल झड़ने की समस्या, चर्म रोग जैसी बीमारियों में कारगर हैं।







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