
अंधियारे की सिटी-पिट्टी हम है. चारों और इतने दिए टिमटिमा रहे हैं कि बेचारे की जान निकली जा रही है .कहीं मिट्टी के दिए हैं तो कहीं चीन,अमरीका,कोरिया के दिए .दिए कहीं के भी हों लेकिन दीपावली पर उनका एक ही काम होता है और वो है रोशनी फैलाना .रोशनी ,जो अँधेरे कि जाती दुश्मन है. ये दोनों एक साथ कभी रह ही नहीं सकते.जहाँ अन्धेरा होगा वहां रोशनी नहीं होगी और जहां रौशनी होगी वहां अन्धेरा नहीं होगा .
अँधेरे और रोशसनि के पीछे दुश्मनी की वजह क्या है ये तो राम ही जाने लेकिन दोनों एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते .दोनों में सह- अस्तित्व का कोई भाव है ही नहीं .अन्धेरा डराता है,भयभीत करता है.आतंकित करता है .इसके विपरीत रोशनी जीवन में उजास भर्ती है,मन प्रफुलित करती है उद्दीपन प्रदान करती है .दुनिया में अँधेरे और रोशनी के ठेकेदार हैं.सबका अपना -अपना काम है. कोई अन्धेरा फैलाता है और कोई रोशनी .अन्धेरा किसी भी कोने में हो सकता है और रोशनी भी किसी भी रास्ते से आपके जीवन में प्रवेश कर सकती है .
ईशर ने अँधेरे और उजाले के झगड़े को निबटाने की कोशिश की और महीने के तीस दिन दो बराबर भागों में बाँट दिए.एक को कृष्ण पक्ष कर दिया और दूसरे को शुक्ल पक्ष .ऐ में अन्धेरा धीरे-धीरे पांव पसारता है तो दूसरे में रोशनी अपनी चादर फैला देती है .अँधेरे में हाँथ को हाथ नहीं सूझता लेकिन रोशनी में सब कुछ साफ़-साफ़ दिखाई देता है .लोग रोशनी के साथ तो गुजर -बसर कर लेते हैं लेकिन अँधेरे से उनकी नहीं निभती .रोशनी के साथ बहुमत होता है और अन्धेरा हमेशा अल्पमत में होता है .जिंदगी इन दोनों पाटों के बीच फंसी रहती है .
अन्धेरा बांटने केलिए ज्यादा जतन नहीं करना पड़ते,केवल रोशनी के स्रोतों को नष्ट करना पड़ता है .रौशनी के सबसे बाड़े स्रोत सूरज से तो कोई कुछ नहीं कहता लेकिन जब रात होती है तब अँधेरे के पक्षधर अपनी पर आ जाते हैं. दिए हों या लालटेन या ढिबरी या बिजली के बल्ब ,सब पर टूट पड़ते हैं .समय के साथ अँधेरे से लड़ने के साधन,संसाधन बढे हैं .इसलिए रोशनी का साम्राज्य लगातार बढ़ रहा है .किन्तु जहाँ कूढ़-मगज लोग रहते हैं वहां अन्धेरा ही अपना डेरा डाल लेता है .
दुनिया का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है जो रोशनी का तलबगार न हो.रोशनी का कोई धर्म नहीं है. हिन्दुस्तानी हो या तालिबानी ,अमरीकी हो या चीनी सबको रोशनी चाहिए .,रोशनी और अँधेरे के इस द्वन्द में फंसकर मनुष्यता कमजोर होती है .और कमजोर मनुष्य कभी भी तालिबान का यकीन नहीं कर सकते .दुनिया में किसी को भी तालिबानी अँधेरे कि जरूरत नहीं हैं .दुर्भाग्य ये है कि दुनिया में तमाम एकजुटता के बावजूद अन्धेरा बढ़ रहा है. सूरज अपना काम करता है और अन्धेरा अपना काम करता है .
हिन्दुस्तान में इल्म का उजाला पूरे तौर पर भले न हुआ हो लेकिन बहुत बड़ी आबादी है जो अँधेरे से जूझने के लिए कमर कस कर खड़ी है .ये आबादी रोशनी का महत्व जानती है .रौशनी के पैरोकार किसी धर्म की बेदी अपने पांवों में नहीं बांधती .रोशनी आजादी चाहती है .अन्धेरा गुलामी .ऊपर वाला हमें रोशनी में नहाने का कोई न कोई बहाना जरूर देता है. हम जब भी खुशियां मनाना चाहते हैं रोशनी को सबसे पहले न्यौता देते हैं .कोई भी जश्न बिना रोशनी के पूरा ही नहीं होता ..इसलिए आइये रोशनी के साथ खड़े हों,रौशनी के लिए लड़ें,रोशनी को अक्षुण्ण बनायें .जो रोशनी के आड़े आये,उसका अपहरण करना चाहे ,हम उसको बेनकाब करें .
रोशनी बांटने का हमारा अभियान अभी अधूरा है .इस अभियान को पूरा करने के लिए साल के पांच दिन काम करने से बात नहीं बनेगी .रोशनी के लिए हमें दिन-रात काम करना पड़ेगा ,क्योंकि अँधेरे के पैरोकार भी दिन-रात काम कर रहे हैं .रोशनी पर आज का भाषण यहीं खत्म होता है. रोशनी के सबसे बड़े त्यौहार पर आपको ढेर से मंगल कामनाएं.बधाई .
@ राकेश अचल







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