
। रायगढ़ और धर्मजयगढ़ वन मंडल के अधिकारियों पर विधानसभा को गुमराह करने और गलत जानकारी देने का गंभीर आरोप लगा है। उद्योगों द्वारा वन भूमि पर कब्जे के मामलों को लेकर पूछे गए तारांकित प्रश्न में गलत उत्तर देने पर विधानसभा प्रश्न संदर्भ समिति ने जांच के आदेश जारी कर दिए हैं।
मामला रायगढ़ जिले में उद्योगों द्वारा संरक्षित और रिजर्व फॉरेस्ट भूमि पर किए गए अतिक्रमण से जुड़ा है।
विधानसभा सत्र के दौरान रायपुर से भाजपा विधायक पुरंदर मिश्र ने सरकार से सवाल किया था कि रायगढ़ और धर्मजयगढ़ वन मंडल क्षेत्र में उद्योगों द्वारा वन भूमि पर अतिक्रमण के कितने मामले दर्ज हैं। इसके जवाब में वन विभाग ने दावा कर दिया कि उद्योगों द्वारा वन भूमि पर अतिक्रमण का एक भी मामला नहीं है।
जबकि विधायक मिश्र के अनुसार इस क्षेत्र में दर्जनों मामले मौजूद हैं —
कुछ में POR दर्ज है, कुछ में नहीं, और कई मामलों में साक्ष्य मौजूद होने के बावजूद विभाग आंख मूंदे बैठा है।
इसी को गंभीरता से लेते हुए विधायक मिश्र ने अधिकारियों पर गलत जानकारी देने का आरोप लगाते हुए विधानसभा प्रश्न संदर्भ समिति को पत्र लिखा, जिसके बाद अब जांच के आदेश जारी किए गए हैं।
साक्ष्य मौजूद, फिर भी क्लीन चिट — वन विभाग उद्योगों का बन गया संरक्षक!
रायगढ़ वन मंडल क्षेत्र में उद्योगों द्वारा संरक्षित वन भूमि पर कब्जे के कई मामले सामने आ चुके हैं, लेकिन वन विभाग निर्लज्जता से उद्योगों के पक्ष में खड़ा नजर आ रहा है।
मां मंगला इस्पात के मामले में तो विभाग ने अलग-अलग जांच में अलग-अलग कैमल शीट तैयार कर दी, जो न तो डिविजनल सीट से मेल खाती है और न ही बीट नक्शे से।
हर जांच में नया नतीजा और नई कहानी गढ़ दी जाती है।
नित्यम स्टील के मामले में पंचनामा में अतिक्रमण दर्ज है, लेकिन जांच रिपोर्ट में उद्योग को क्लीन चिट दे दी जाती है।
हैरानी की बात यह है कि विभाग अपने ही अधिकारियों-कर्मचारियों पर कार्रवाई कर देता है, लेकिन उद्योग को बचा लेता है।
अगर सब कुछ सही है, तो कर्मचारियों पर कार्रवाई क्यों?
अगर पंचनामा में मुनारे उद्योग परिसर के भीतर पाए जाते हैं, तो अतिक्रमण क्यों नहीं माना जाता?
POR काटकर खुद जज बन बैठा विभाग
नियम के अनुसार ऐसे मामलों में वन विभाग POR दर्ज कर न्यायालय में पेश करता है, जहां सुनवाई के बाद फैसला होता है।
लेकिन अब विभाग खुद ही जज बन बैठा है —
POR काटता है, थोड़ी-बहुत पेनाल्टी लगाता है और मामला नस्तीबद्ध कर देता है।
नतीजा यह है कि उद्योगों के हौसले आसमान छू रहे हैं।
रिजर्व फॉरेस्ट में NR इस्पात द्वारा पानी ले जाने के लिए पंप हाउस बना लिया जाता है और विभाग को “खबर ही नहीं होती” —
और जब शिकायत होती है तो रायपुर से टीम आकर अतिक्रमण तोड़ती है।
स्थानीय अधिकारी तब भी खामोश रहते हैं।
सवाल साफ है — जंगल बचेंगे या उद्योगों की दलाली चलेगी?
जब तक रायगढ़ वन मंडल के अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच नहीं होगी, तब तक न जंगल सुरक्षित रहेंगे और न ही सिस्टम पर भरोसा बचेगा।
विधानसभा को गलत जानकारी देना सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि लोकतंत्र के साथ धोखा है।
अब सवाल यह है कि क्या दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या फाइलें दबाकर मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा?
जंगल बचाने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है, वही अगर सौदेबाजी में उतर जाएं — तो फिर जंगल कौन बचाएगा?







Comments are closed.