

कोरबा-कटघोरा। कोरबा जिले के जंगलों में जानवरों को प्यासा मारने की साजिश चल रही है। इसकी स्क्रिप्ट जलस्त्रोतों के निर्माण में उजागर होती रही है। जंगलों में तालाब,स्टॉप डेम निर्माण के घोटालों की कड़ी में कटघोरा वनमंडल एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। केंदई वनपरिक्षेत्र में चल रहा लेमरू हाथी रिजर्व विकास परियोजना अब भ्रष्टाचार का बड़ा अड्डा बनते नजर आ रहा है। करोड़ों रुपये की इस महत्वाकांक्षी योजना में भारी अनियमितताओं और खुली लूट के आरोप सामने आए हैं, जिससे पूरे विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2025-26 में लेमरू हाथी रिजर्व विकास परियोजना के तहत लगभग 11 तालाबों का निर्माण स्वीकृत किया गया था। इन तालाबों का उद्देश्य जंगल में विचरण कर रहे हाथियों को गर्मी के मौसम में पेयजल उपलब्ध कराना है। जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत दिखाई दे रही है। केंदई वनपरिक्षेत्र के ग्राम पतुरियाडाँड़ के जंगल में बनाए गए एक तालाब का मामला सबसे चौंकाने वाला है। इस तालाब के निर्माण के लिए लगभग 16 लाख रुपये स्वीकृत किए गए थे, लेकिन मौके पर हालात देखकर प्रतीत होता है कि मुश्किल से 2 लाख रुपये भी खर्च नहीं किए गए। ग्रामीणों का आरोप है कि पहले से मौजूद एक छोटे नाले को ही थोड़ा-बहुत बदलकर उसे “तालाब” का रूप दे दिया गया।

ग्रामीणों ने बताया कि यह पूरा काम महज एक सप्ताह के भीतर निपटा दिया गया। हैरानी की बात यह है कि सरकार की मंशा अनुरूप मजदूरों को काम देने की बजाय जेसीबी और ट्रैक्टर का उपयोग किया गया, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में मजदूरों से कार्य कराए जाने का उल्लेख किया गया है। जंगल से ही पत्थर निकालकर काम चलाया गया, जिससे लागत और भी कम कर दी गई। मामला तब और भी गंभीर हो जाता है, जब यह तथाकथित तालाब पानी तक नहीं रोक पा रहा है। वर्तमान में यह पूरी तरह सूखा पड़ा है, जिससे स्पष्ट है कि निर्माण कार्य न केवल अधूरा है बल्कि पूरी तरह से लापरवाही और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है।
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इस पूरे मामले में केंदई वनपरिक्षेत्र अधिकारी अभिषेक दुबे की भूमिका पूर्ण रूप से सवालों के घेरे में है और योजनाओं में क्रियान्वयन को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। बताया जा रहा है कि यह मामला अकेला नहीं है। केंदई वनपरिक्षेत्र में बीते वर्षों में भी कई कार्यों में भारी भ्रष्टाचार की आशंका जताई जा रही है। विभगीय सूत्रों के मुताबिक, आने वाले दिनों में ऐसे कई और घोटालों का खुलासा हो सकता है।
अब सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी पूर्व में उजागर हुए घोटालों की तरह फाईलों में दबकर रह जाएगा? वैसे भी, कटघोरा वन मण्डल हो या कोरबा वनमण्डल, दोनों के जंगलों में तालाब-स्टॉप डेम निर्माण, वन मार्ग निर्माण आदि कार्यों में व्यापक धांधली करते हुए सरकार के करोड़ों रुपए डकार लिए गए हैं। जांच के नाम पर सिर्फ और सिर्फ लीपापोती ही होती है, कार्रवाई, रिकव्हरी, एफआईआर की अपेक्षा कोरबा जिले में करना बेमानी होगी। यहां तो जगती आंखों से सब कुछ देखकर जिला से लेकर शीर्ष अधिकारी न सिर्फ नजरअंदाज करते हैं बल्कि जांच में प्रमाणित/दोष साबित हो चुके अपराध में भी मामला पलट कर दोषमुक्त कर देते हैं।








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