
घरेलू हिंसा को अब तक प्रायः एक निजी या सामाजिक समस्या के रूप में देखा जाता रहा है, जिसे परिवार की चारदीवारी के भीतर सुलझाने की अपेक्षा की जाती है। किंतु हालिया अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य शोध इस धारणा को चुनौती देते हैं। अब यह स्पष्ट है कि घरेलू हिंसा महिलाओं के लिए एक गंभीर और दीर्घकालिक सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम बन चुकी है, जिसका प्रभाव कई बार तंबाकू सेवन, मोटापा या शराब जैसी ज्ञात स्वास्थ्य जोखिम आदतों से भी अधिक घातक होता है।
विशेषकर दक्षिण एशिया में, घरेलू हिंसा महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को चुपचाप लेकिन लगातार क्षति पहुँचाती है। इसकी गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि इसका असर केवल तत्काल चोटों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह वर्षों में गंभीर बीमारियों का आधार बन जाता है।
शरीर और मन पर पड़ने वाला प्रभाव
घरेलू हिंसा का सबसे गहरा असर मानसिक स्वास्थ्य पर दिखाई देता है। हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं में पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD), अवसाद, तीव्र चिंता, आत्मसम्मान की हानि और आत्महत्या की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत अधिक पाई जाती है। अनेक महिलाएँ अपनी पीड़ा को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पातीं, जिससे उनका मानसिक आघात और भी अदृश्य बना रहता है।
लगातार भय और तनाव की स्थिति शरीर की जैविक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करती है। लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी गैर-संचारी बीमारियों के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है। आज यह संबंध केवल सामाजिक विश्लेषण का विषय नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययनों से प्रमाणित तथ्य है।
इसके अतिरिक्त, घरेलू हिंसा दैहिक या सोमैटिक लक्षणों के रूप में भी सामने आती है। बिना किसी स्पष्ट चिकित्सीय कारण के लंबे समय तक चलने वाला दर्द, अत्यधिक थकान, सिरदर्द, नींद की समस्या और पाचन संबंधी विकार अनेक महिलाओं में पाए जाते हैं। अक्सर इन लक्षणों का इलाज किया जाता है, लेकिन उनके पीछे छिपे मानसिक आघात और हिंसा के अनुभव को पहचाना नहीं जाता।
प्रजनन स्वास्थ्य और सुरक्षा पर असर
घरेलू हिंसा का सीधा संबंध महिलाओं के प्रजनन और यौन स्वास्थ्य से भी जुड़ा है। यौन संचारित संक्रमण, अनियोजित गर्भावस्था, बार-बार गर्भपात और अन्य प्रतिकूल प्रजनन परिणाम हिंसा झेल रही महिलाओं में अधिक देखे जाते हैं। कई बार हिंसा के कारण महिलाएँ समय पर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच भी नहीं बना पातीं, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था की सीमाएँ
भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में ऐसी अनगिनत महिलाएँ हैं जो बार-बार अस्पतालों और क्लीनिकों में आती हैं, पर उनकी वास्तविक समस्या अनदेखी रह जाती है। इसका एक बड़ा कारण चिकित्सकीय शिक्षा में घरेलू हिंसा की पहचान और संवेदनशील संवाद पर पर्याप्त प्रशिक्षण का अभाव है। डॉक्टर अक्सर एनीमिया, दर्द, घबराहट या उच्च रक्तचाप जैसे लक्षणों का उपचार करते हैं, लेकिन उनके सामाजिक और मानसिक संदर्भ तक नहीं पहुँच पाते।
इसके अतिरिक्त, सामाजिक बाधाएँ भी बड़ी भूमिका निभाती हैं। महिलाएँ प्रायः परिवार के अन्य सदस्यों के साथ अस्पताल आती हैं, जहाँ वे खुलकर अपनी स्थिति साझा नहीं कर पातीं। समय और संसाधनों की कमी के कारण ट्रॉमा-इंफॉर्म्ड केयर जैसी समग्र देखभाल भी स्वास्थ्य केंद्रों में सीमित रहती है।
सोच में बदलाव की ज़रूरत
यदि घरेलू हिंसा को सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो इसके समाधान के अधिक प्रभावी रास्ते खुल सकते हैं। इसे केवल नैतिक या पारिवारिक विफलता मानने के बजाय एक दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम जब तक घरेलू हिंसा को हृदय रोग या मधुमेह जैसे जोखिम कारकों के समान गंभीरता से नहीं लिया जाएगा, तब तक स्वास्थ्य प्रणाली केवल लक्षणों का उपचार करती रहेगी, बीमारी की जड़ का नहीं। अब समय आ गया है कि चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य जगत इस चुप्पी को तोड़े और घरेलू हिंसा को स्वास्थ्य विमर्श के केंद्र में लाए, ताकि अनगिनत महिलाओं को दीर्घकालिक पीड़ा और रोके जा सकने वाली बीमारियों से बचाया जा सके।
कारक के रूप में स्वीकार करना होगा।
इसके लिए आवश्यक है कि चिकित्सा, नर्सिंग और मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा में लैंगिक संवेदनशीलता और हिंसा की पहचान को अनिवार्य बनाया जाए। स्वास्थ्य सेवाओं को परामर्श, कानूनी सहायता और संकट हस्तक्षेप प्रणालियों से जोड़ा जाए, ताकि पीड़ित महिलाओं को सुरक्षित और समग्र सहायता मिल सके।
— निशा राठौरसंस्थापक (The Indiantoptics Foundation)






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