शिक्षा के नाम पर सौदा, लेकिन ककाड़ीपारा ने रच दिया बदलाव का इतिहास।

ग्रामीणों ने जिद्द, जज़्बे और ज़मीन से चलाया स्कूल, रसोइया बनी गुरुजी।

अखिलेश उप्पल ( संवादाता बीजापुर) +91 9340670076

बीजापुर – जब सरकार ने आंखें मूंद लीं और व्यवस्था ने पीठ फेर ली, तब बीजापुर जिले के एक छोटे से गांव ककाड़ीपारा ने दिखा दिया कि शिक्षा इमारतों की मोहताज नहीं होती वह तो हौसलों से चलती है।प्रशासन ने गांव के प्राथमिक शाला को अचानक बंद कर, 5 किलोमीटर दूर ईचेवाड़ा में स्थानांतरित कर दिया। कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं, न शिक्षक और न ही परिवहन। शिक्षा विभाग की इस एकतरफा कार्यवाही ने गांव के 26 बच्चों के सपनों पर ब्रेक लगाने की कोशिश की लेकिन ग्रामीण झुके नहीं।रसोई से कक्षा तक पहुंची ‘शिक्षा’जब इंतज़ार थकावट में बदलने लगा, तब गांव की एक साधारण रसोइया पार्वती कवासी ने अपनी भूमिका बदली। हाथ में कलछी की जगह चॉक और कढ़ाही की जगह ब्लैकबोर्ड। गांववालों ने अपने घरों से राशन इकट्ठा किया और स्कूल फिर से खुल गया – बिना सरकार, बिना तनख्वाह, बिना सुविधाएं।25 दिन की जिद, लोकतंत्र के दरवाजे खटखटाती रहीग्रामीणों ने 25 दिनों तक प्रशासन से गुहार लगाई_ कोई सुनवाई नहीं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। बच्चों को गांव में ही पढ़ाना है, यही जिद बनी ठानी। यह कोई विरोध नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार की वापसी की लड़ाई थी।विधायक पहुँचे गांव, आशा की किरण जगी। स्थिति की जानकारी मिलते ही बीजापुर विधायक विक्रम शाह मण्डावी खुद ककाड़ीपारा पहुंचे। उन्होंने बच्चों से संवाद किया, कॉपी-किताबें, पेंसिल और मध्यान्ह भोजन के लिए राशन दिया। उन्होंने पार्वती कवासी को अस्थायी शिक्षक मानते हुए हर महीने मानदेय देने का भी वादा किया।ये सिर्फ स्कूल नहीं, संघर्ष से निकला उजाला है बच्चों की आँखों में उम्मीद की चमक लौट आई है। यह स्कूल नहीं, एक संकल्प का नाम है। यह कहानी बताती है कि जब तंत्र चुप हो जाए, तब जनता की आवाज़ स्कूल बन जाती है।सरकार को चाहिए आईना देखेजहाँ एक ओर सरकार बीजापुर जैसे नक्सल-प्रभावित इलाकों में करोड़ों खर्च कर ‘विकास का दावा’ करती है, वहीं दूसरी ओर एक स्कूल को बंद कर देना उसके इरादों पर सवाल खड़ा करता है। क्या यह बच्चों से उनका अधिकार छीनना नहीं?

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