साक्षात्कार प्रेमचंद जैन-आज मीडिया सत्ता का दर्पण हो गया है- प्रेमचंद जैन

औद्योगिक नगर कोरबा में प्रेमचंद जैन पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण इतिहास रहे हैं। इसलिए कि उन्होंने कोरबा बालको टाइम्स सप्ताहिक के रूप में प्रकाशित करना शुरू किया था और कोरबा की जनता का मूड को समझ कर मीडिया को एक ऊंचाई प्रदान की। तत्पश्चात कोरबा बालको टाइम्स दैनिक अखबार के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। विगत दिनों प्रेमचंद जैन के जन्म दिवस पर हमारे संपादक सुरेशचंद्र रोहरा ने उनसे यह साक्षात्कार लिया। जिसमें उन्होंने देश की पत्रकारिता की समीक्षा जापान, सिंगापुर, नेपाल, भूटान कि अपनी यात्राओं के अनुभव के आधार पर बताया कि किस तरह भारत की पत्रकारिता सत्ता के इर्द-गिर्द घूम रही है जबकि न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट में आज भी जमीन से जुड़े हुए मुद्दों को प्राथमिकता मिलती है। प्रस्तुत है एक खास बातचीत-

? साहित्यिक लेखन एवं पत्रकारिता में आप कब और कैसे आ गए कैसे आगमन हुआ।

अखबार की प्रति अभिरुचि थी अखबार पढ़ते पढ़ते लेखन के प्रति अभिरुचि जागृत हुई और युगधर्म, नवभारत, लोक स्वर में आपके पत्र मैं लिखने लगा… धीरे धीरे शौक बढ़ता चला गया। उन दिनों समाचार पत्रों के लोकवाणी स्तंभ में मैं राष्ट्रवाद पर फोकस करके अक्सर अपनी बात लिखता था , जिसे लोगों ने खूब पसंद किया तो मेरी आकांक्षा इस दिशा में बढ़ती चली गई।

? 90 के दशक में बाल पत्रिका मधु मुस्कान में आपका एक कार्टून मैंने देखा था।

हां, उन दिनों शुरुआत कुछ इसी तरह हुई थी कार्टून बनाते बनाते ही पत्रकारिता के क्षेत्र में रुचि बढ़ती चली गई। इन दिनों युवावस्था में मैं यह महसूस करता था कि यह आस पास जो उम्रदराज लोग हैं जब इनका बालपन रहा होगा तो यह कैसे रहे होंगे शराब खोरी नशा आदि मुझे बेहद परेशान करते थे।

? आप की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा कहां हुई।

मैं रायपुर दुर्गा कॉलेज में अध्ययन के लिए चला गया था। और वही बबन प्रसाद मिश्रा, गोविंद लाल वोरा, रमेश नैयर जी के सानिध्य में पत्रकारिता की क ख ग सीखने लगा। इन दिनों परि चर्चा अखबार में प्रकाशित हुआ करती थी, युगधर्म से मैं जुड़ गया था और इन परिचर्चाओं को, पाठकों के पत्रों को मैं एडिट करता था।

? आप महाकौशल और रायपुर समीक्षक में भी रहे मेरी जानकारी में।

हां, शिक्षा दीक्षा के बाद जब मैं कोरबा लौट आया तो सबसे पहले जयशंकर नीरव जी के संपादन में निकल रहे महाकोशल का संवाददाता बना जिसके 2 वर्ष बाद रायपुर समीक्षक का प्रकाशन हुआ जिसमें रायपुर के बड़े अखबार नवीस जुड़े हुए थे। बाल्को दुर्ग बस में यह अखबार आया करता था। मैंने स्वयं साइकिल और लूना पर निकल कर अखबार वितरण किया है।

? कोरबा बालको टाइम्स के संदर्भ में भी कुछ पाठकों को बताएं।

कोरबा में सप्ताहिक वक्ता का प्रकाशन हुआ करता था जो मुख्य रूप से समीक्षात्मक समाचार , आलेख और शासकीय विज्ञापन अधिक प्रकाशित किया करता था। मैंने जब कोरबा बालको टाइम्स का संपादन प्रकाशन प्रारंभ किया तो इसलिए ज्यादा रिस्पांस मिलने लगा कि आसपास की खबरों को हमने प्राथमिकता दी। एक खास बात और कि उस समय की राजनीति में बोध राम कंवर हो अथवा प्यारे लाल आलोचना को सकारात्मक भाव से लिया करते थे डर और भय का वातावरण नहीं था।

? प्रेमचंद जी, कुछ बबन प्रसाद मिश्र के बारे में हमें बताएं वे आपको किस तरह पत्रकारिता में आगे ला रहे थे।

जी हां, मैं आपको बताऊ बबन प्रसाद मिश्र के सानिध्य में ही सीखा वे छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के एक महान स्तंभ थे उन्होंने एक तरह से मुझे पत्रकारिता की महत्वपूर्ण दीक्षा दी युगधर्म में उन्होंने मुझे बहुत मौका दिया। एक किस्सा बताऊं उन दिनों जब उपराष्ट्रपति हिदायतुल्लाह रायपुर आए थे तो बबन प्रसाद जी मुझे स्वयं अपने साथ ही ले गए थे और मुझे याद है वहां रेड कारपोरेट बिछा हुआ था जिस पर मुझे चलने का मौका मिला था जो आज कल्पना से बाहर है। उन दिनों मुझे पत्रकारिता के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता था। सिर्फ सामाजिक सरोकार ही दिखाई दिया करते थे।

? आप के समय और आपके पहले की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में क्या अंतर है।

हमारे से पहले की पत्रकारिता में साहित्य की एक सुगंध, छटा बिखेरी हुई दिखाई देती थी… पत्रकारिता एक मिशन थी पत्रकारिता नागरिकों के लिए एक दर्पण थी यही कारण है कि आम जनता में पत्रकार के प्रति सम्मान की भावना दिखाई देती थी मैं यह आज जरूर कहूंगा कि मीडिया आज नेताओं का दर्पण हो गया, सत्ता का आईना हो गया है.

? पत्रकारिता का महत्व क्या है कैसे महसूस किया आपने।

एक बात कहूंगा कि आज पत्रकार को सम्मान नहीं मिल रहा। क्योंकि जनता का दर्पण प्रेस अब नहीं है बल्कि सत्ता का दर्पण हो गयी है। सत्ता के आगे पीछे पत्रकारिता घूम रही है। स्थानीय समस्याओं को आज स्थान नहीं मिल रहा है यह इसका कारण है।

?आज की नई पीढ़ी जो पत्रकारिता अपनाना चाहते है, उनके लिए आपका क्या संदेश होगा।

यही कि वह निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए कटिबद्ध हों, पत्रकारिता जनसंपर्क अधिकारी बनकर नहीं होनी चाहिए। बल्कि पत्रकारिता जनता से जुड़ कर हो, समस्याओं से जुड़े, लोगों से जुड़े, मीडिया में आजीविका के लिए नहीं आए।

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