
आप इसे सियासत मत समझिये,ये तकलीफ है एक खेल प्रेमी होने के नाते कि भारत सरकार ने हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को सम्मान देने के लिए एक पूर्व प्रधानमंत्री के नाम से दिए जाने वाले खेल के सबसे बड़े पुरस्कार ‘खेल रत्न’ को अब मेजर ध्यानचंद के नाम से देने का फैसला कर लिया है .भारत सरकार की नजर में ये एक बड़ा फैसला हो सकता है लेकिन खेल प्रेमियों की नजर में ये एक बेहद अहमकाना फैसला है ,क्योंकि मुल्क के खेल प्रेमी मेजर ध्यानचंद को कोई जूठन नहीं बल्कि भारत रत्न देने की मांग करते आ रहे हैं .
भारत सरकार ने नाम बदलो अभियान के तहत पहले मुसलमानों से हिसाब बराबर करने के लिए मुल्क के तमाम शहरों के लोकप्रिय और आम जुबान पर चढ़े नामों को बदलने की हिमाकत की और अब सरकार अपने सियासी विरोधियों के नाम से चलने वाली योजनाओं और सम्मानों के आगे से भी नाम हटाने का काम करने लगी है .बात तो तब होती जब सरकार मेजर ध्यानचंद के नाम पर कोई और बड़ा खेल पुरस्कार शुरू करती ..
मुल्क के असंख्य खेल प्रेमियों के मन में रचे-बेस मेजर ध्यानचंद के सामने एक जूठे सम्मान को परोसकर सरकार ने न सिर्फ मेजर ध्यानचंद का ,उनके परिवार का खेल प्रेमियों का बल्कि समूचे बुंदेलखंड का अपमान किया है. जो सरकार अपने देश के मौजूदा प्रधानमंत्री के नाम से सबसे महंगे स्टेडियम का नाम बाबस्ता कर सकती है ,वो क्या मेजर ध्यानचंद के नाम से कोई नया काम शुरू नहीं कर सकती .फिर अभी तो किसी ने सरकार से खेल रत्न से मरहूम वजीरेआजम का नाम हटाने की मांग तक नहीं की थी .फिर सरकार ने अचानक ये फैसला किसलिए कर लिया.इस फैसले का मकसद क्या है ? इस फैसले की जरूरत क्या है ?क्या इस पुरस्कार के साथ किसी पूर्व प्रधानमंत्री का नाम बाबस्ता होने से इस सम्मान की बेकद्री हो रही थी ?
मुल्क में नाम बदलने की मुहिम चलाने वाली मौजूदा सरकार का ये सातवां साल है.बीते छह साल में सरकार ये हिम्मत क्यों नहीं जुटा पायी? क्या सरकार ने ये फैसला संसद की मांग पर किया या इस फैसले के पीछे किसी समिति की सिफारिश थी ? या फिर सरकार ऐसे फैसले ख्वाब आने पर कर गुजरती है .? खेलरत्न सम्मान के साथ किसका नाम बाबस्ता है इससे कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता. बीते तीन दशक में खेल रत्न पुरस्कार पाने वाले 40 से अधिक खिलाड़ियों में से किसी ने अब तक इस पुरस्कार को एक पूर्व प्रधानमंत्री का नाम बाबस्ता होने की वजह से न तो वापस किया और न किसी ने खेल रत्न पुरस्कार से पूर्व प्रधानमंत्री का नाम हटाने की मांग की .
मुल्क का कोई भी प्रधानमंत्री हो जनादेश से बनाया जाता है ,इसलिए उसके नाम से शुरू की गयी किसी योजना,सम्मान या स्थान का नाम बदलने की कोशिश या फैसला एक संकीर्ण मानसिकता के सिवाय कुछ नहीं हो सकता .किसी भी मुल्क की सरकार सर्वशक्तिमान होती है,इसलिए उसे हर फैसला करने का हक होता है ,किन्तु जब कोई सरकार अपने इस हक का बेजा इस्तेमाल करना शुरू कर देती है तो लोगों को तानाशाही की आहट सुनाई देने लगती है .
सरकार ने जिन मेजर ध्यानचंद के नाम को खेलरत्न पुरस्कार के साथ जोड़ा है उन्हें खुद पद्मभूषण से बड़ा कोई नागरिक सम्मान नहीं दिया गया जबकि क्रिकेट जैसे खेल के लिए भारतरत्न दे दिया गया .मेजर ध्यानचंद हॉकी के जादूगर कहे जाते थे उह्नोने देश के लिए ओलम्पिक में एक नहीं बल्कि 1928, 1932 और 1936 में तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक अर्जित किये थे ।भारतरत्न न मिलने से मेजर ध्यानचंद का कद कम नहीं हुआ और न खेलरत्न पुरस्कार के साथ उनका कद अचानक बढ़ जाने वाला है ,उलटे उनकी आत्मा खेलरत्न के साथ जुड़ा एक नाम हटाने के शर्मनाक विवाद से दुखी जरूर होगा .
दुःख की बात ये भी है कि दीगर सरकारों की तरह ही मौजूदा सरकार भी खेलों का इस्तेमाल सियासत में अदावत बराबर करने के लिए कर रही है .सत्तारूढ़ दलों को अपने विरोधियों का मुकाबला संसद से लेकर सड़क तक करना चाहिए लेकिन नाम हटाने या जोड़ने जैसी हरकतों से कोई मुकाबला होता नहीं है .ये एक तरह की कायरता है .आज की सरकार का दुर्भाग्य है कि नामकरण करने के जितने मौके पहले की सरकारों को मिले उतने मौके इस सरकार को नहीं मिले.मिले भी तो मौजूदा पंत प्रधान की तरह ही पूर्व की भाजपा सरकार के मुखिया के पास कुनवे में ऐसा कोई था नहीं जिसके नाम से कोई योजना या सम्मान शुरू किया जा सके. ले-देकर एक दो नेता थे सो उनके नामपर जो किया जा सकता था किया गया .
मुल्क की बदनसीबी ये है कि यहां सारे फैसले सियासी लोग करते हैं इसलिए दूसरे क्षेत्रों के महान लोगों के हिस्से में बहुत कुछ आता नहीं है ,साहित्यकार, संगीतकार, कलाकार ,खिलाड़ी सब के सब सियासी लोगों के रहमोकरम पर रहते हैं .सियासत उन्हें कुछ मान-सम्मान दे दे तो ठीक और न दे दे तो भी ठीक .संसद के गलियारों में आपको एक भी मूर्धन्य कलाकार,या साहित्यकार की प्रतिमा या चित्र नजर नहीं आएगा,सिवाय नेताओं के ,क्योंकि सारी प्रतिभा तो नेताओं में ही होती है मजा तो तब आता जब खेलरत्न पुरस्कार ले चुके करीब 40 खिलाड़ियों में से जो जीवित हैं वे सब एक सुर से खेलरत्न पुरस्कार से एक का नाम हटाकर दूसरे का नाम जोड़ने का विरोध करते ,लेकिन दुर्भाग्य ये है कि खिलाड़ियों को ज्यादा सियासत आती नहीं है और जिन्हें आती है वे नवजोत सिंह सिद्धू जैसे हो जाते हैं .
इन दिनों संसद चल रही है लेकिन हंगामे में डूबी है.संसद आठ महीने से आंदोलनरत किसानों की नहीं सुन रही.जासूसी के मामले में बहस नहीं कर रही .सांसद को खेलरत्न पुरस्कार का नाम बदले जाने के फैसले पर भी बहस की फुरसत नहीं है .वैसे ही जिस संसद में ध्वनिमत से या सात-आठ मिनिट की कथित चर्चा के बाद कानून बनाये जाते हों उससे कोई ख़ास उम्मीद करना भी नहीं चाहिए .इन दिनों संसद और सरकार का भगवान ही मालिक है. क्या ये दुर्भायपूर्ण नहीं है कि जिन मसलों पर संसद में हंगामा हो रहा है वे ही मसले देश की सबसे बड़ी अदालत में भी सुने जा रहे हैं !
टोक्यो ओलम्पिक में कुल जमा सात टंगे हासिल करने वाले हमारे खिलाड़ियों ने मुल्क की आबरू को एक सोने का तमगा दिलाकर ४७ वे स्थान पर खड़ा होने का अवसर तो भी दिला दिया ,किन्तु इसकी ख़ुशी भी खेलट्रन के विवाद में धुंधली हो गयी. सरकार को खेलरत्न पुरस्कार का नाम बदलने के लिए मुल्क में छिपे पड़े खेल ट्रनों को तलाशने की कोई योजना मेजर ध्यानचंद के नाम से शुरू करना थी.यदि ऐसा होता तो ये मेजर ध्यानचंद का भी सम्म्मान होता और उन खिलाड़ियों का भी जो आगे आकर मुल्क के लिए सोना,चंडी और कैसे के टंगे हासिल कर सकते हैं .मुल्क के लिए क्या ये लज्जा की बात नहीं है कि दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला भारत यूक्रेन और बेलारूस जैसे नामालूम मुल्कों के साथ खड़ा किया जा रहा है. सरकार पुरस्कारों,योजनाओं और शहरों के नाम बदलने के बजाय इस हकीकत के बारे में सोचे तो ज्यादा बेहतर हो .
@ राकेश अचल







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