
प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। महान गुरु महर्षि वेदव्यास जिन्होंने ब्रह्मसूत्र, महाभारत, श्रीमद्भागवत और अट्ठारह पुराणों जैसे अद्भुत साहित्य की रचना की, उनका आज ही के दिन जन्म हुआ था । उन्हें सभी ऋषि- मुनि अपना गुरु मानते थे, इसलिए उनके जन्मदिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इसी पावन दिन पर व्यास जी ने अपने शिष्यों एवं मुनियों को सर्वप्रथम भागवतपुराण का ज्ञान दिया था।
कहा गया है कि-“बिन गुरु ज्ञान ना होई” अर्थात् गुरु ही है जो हमें ज्ञान देता है, सही राह दिखाता है। रामायण से लेकर महाभारत तक गुरु का स्थान सर्वोच्च एवं सबसे महत्वपूर्ण रहा है । गुरु की इसी महत्ता को बताते हुए महान संत कबीर दास जी ने लिखा है-
” गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पांय
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए।”
माना जाता है कि इस दिन गुरु के चरण स्पर्श अवश्य करना चाहिए। परन्तु मेरा मानना है सिर्फ इस एक दिन ही नहीं बल्कि सदैव गुरु का आदर करना चाहिए। एक शिशु की प्रथम गुरु माँ होती है इसलिए इस दिन ही नहीं बल्कि संभव हो तो प्रतिदिन अपने माता-पिता के चरण स्पर्श करना चाहिए । सदैव उनका सम्मान करना चाहिए ।
यदि हम गुरु पूर्णिमा शब्द को देखें तो इसमें (गुरु + पूर्ण +माँ)शब्द छिपा हुआ है, अर्थात् गुरु वही पूर्ण होता है जिसमें मां के जैसा वात्सल्य का भाव हो, जो अपने शिष्य को सदैव सही मार्ग दिखाए, उसकी उलझनों को सुलझाए, जिज्ञासा को शांत करें और अपने शिष्य का मार्ग प्रशस्त करे । वर्तमान समय में ऐसे गुरु एवं शिष्य दोनों ही का अभाव होता जा रहा है ,इसलिए और भी आवश्यक हो जाता है इस बात को समझना कि गुरु शिष्य परंपरा क्या है और क्यों आवश्यकता है इसकी। हर वो व्यक्ति जो हमें सही राह दिखाए , हमें सुसंस्कृत बनाने का प्रयास करे वही सही मायने में हमारा गुरु है और ऐसे गुरु का सानिध्य सदैव बना रहे यही प्रयास करना चाहिए।
गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः
गुरुः साक्षात परमब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः
डॉ ममता श्रीवास्तवा(सरूनाथ)।







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