
तिल्दा/ नेवरा/ पूज्य “दीदी आराध्या” जी ने कहा – अज्ञान आसक्ति और मोह ही समस्त आधि-व्याधि-उपाधियों की जड़ हैं; इन्हें ज्ञान, आध्यात्मिक विचार व प्रचण्ड पारमार्थिक पुरुषार्थ द्वारा तिरोहित किया जा सकता है ! अज्ञान जनित विकारों से मुक्त होते ही अंतस में समाहित श्रेष्ठताएँ-दिव्यतायें स्वतः प्रकट होने लगती हैं ..! स्वयं का बाहरी विकास विज्ञान है, और भीतरी विकास अध्यात्म है। अध्यात्म के बिना विज्ञान अधूरा है। अध्यात्म यदि प्राण है तो विज्ञान उसी का शरीर है, ये दोनों इतने अभिन्न हैं कि इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। शरीर की समस्त क्रियाविधि का विश्लेषणात्मक अध्ययन विज्ञान का विषय है और प्राण से संबंधित समस्त ज्ञान अध्यात्म का क्षेत्राधिकार है। जिस प्रकार विज्ञान ने समस्त जड़-पिण्डों की भाँति शरीर का संपूर्ण ज्ञान प्रस्तुत किया गया हैं, उसी प्रकार अध्यात्म भी प्राण-तत्त्व के संबंध में सभी शंकाओं से रहित विश्लेषण प्रस्तुत करता है और इसी के बल पर सदियों से विश्व में भारत की सर्वोपरिता बनी हुई है। सापेक्षता सिद्धांत के जन्मदाता अल्बर्ट आइंसटीन के अनुसार, इस संसार में ज्ञान और विश्वास दो वस्तुएं हैं। जहाँ ज्ञान को विज्ञान कहेंगे, वहीं विश्वास को धर्म कहेंगे। वे कहते हैं कि मैं ईश्वर को मानता हूं, क्योंकि इस सृष्टि के अद्भुत रहस्यों में ईश्वरीय शक्ति ही दिखाई देती है। अब विज्ञान भी इस बात का समर्थन कर रहा है कि संपूर्ण सृष्टि का नियमन एक अदृश्य चेतना कर रही है …।
? पूज्य किशोरी आराध्या जी ने कहा – भारतीय संस्कृति में सम्यग्ज्ञान उसे ही कहा जाता है जो पर को जानने के साथ-साथ अपने को भी समझता हो। जिसने अपने आपको समझा, उसने सबको समझ लिया और जिसने अपने आपको नहीं समझा उसने किसी को नहीं समझा। विज्ञान ‘पर’ को समझता है, ‘स्व’ को नहीं। स्व का अर्थ है – चैतन्य तत्व और पर का अर्थ है – जड़त्व। एक हमें बाह्य जगत् से जोड़ता है तो दूसरा हमें अपने से जोड़ता है। दोनों ही योग हैं। एक साधन योग है तो दूसरा साध्य योग है। एक हमें जीवनशैली देता है तो दूसरा जीवन साध्य देता है। धर्म स्वभाव में जीना है तो विज्ञान उस स्वभाव को पहचानना है। विज्ञान हमें स्व-स्वभाव का बोध कराता है और धर्म विभाव से स्वभाव में आने की प्रक्रिया सिखाता है। आत्मज्ञान है – आँख; और विज्ञान – है पाँव। अगर मानव को आत्मज्ञान नहीं तो वह अन्धा है। कहाँ चला जायेगा पता नहीं। अध्यात्म के पास आँख है इसलिए वह देख तो सकता है, लेकिन गति की उसमें शक्ति नहीं है। इसलिए वह चल नहीं सकता। इसी तरह, विज्ञान के पास गति तो है पर आँख नहीं है, इसलिए उसके पास लक्ष्य-बोध का अभाव है। यह स्थिति बिल्कुल सांख्य के प्रकृति-पुरुष की है। जिस प्रकार प्रकृति-पुरुष के संयोग से जगत का विकास होता है, उसी तरह यदि अध्यात्म और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक बन कर कार्य करेंगे तो मानवता का विकास होगा। भगवान महावीर ने भी आचारांगसूत्र में कहा है कि शस्त्र एक से बढ़कर एक हो सकता है, किन्तु अहिंसा से बढ़कर अन्य कुछ नहीं हो सकता। मनुष्य रूपी पंक्षी के दो पंख है, एक आत्मज्ञान और दूसरा विज्ञान। इन दोनों का ठीक ढंग से समत्व (संतुलन) रखकर ही मानव का विकास होगा। विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय के सन्दर्भ में उन्होनें महत्वपूर्ण तर्क प्रस्तुत किये हैं – आत्मज्ञान और विज्ञान दोनों पूरक है। आत्मज्ञान जीवन की दिशा निर्धारित करता है तो विज्ञान जीवन के लिये कार्यों को सम्पन्न करता है। महान वैज्ञानिक ‘आइस्टीन’ ने भी कहा था, “Science is lame without religion and religion is blind with out Science”…।
? पूज्य “किशोरी आराध्या” जी ने कहा – स्वामी विवेकानंद जी अध्यात्म और विज्ञान को एक-दूसरे का विरोधी नहीं मानते थे। उनका विचार था कि पाश्चात्य विज्ञान का भारतीय वेदांत के साथ समन्वय करके विश्व में सुख-समृद्धि व शांति उत्पन्न की जा सकती है। विज्ञान ने मानव जीवन को अनेक कष्टों से मुक्त किया है तथा जीवन की अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में योगदान दिया है। परन्तु वेदांत के अभाव में यही विज्ञान विनाशकारी भी बन सकता है। वेदांत तथा विज्ञान के समन्वय से मनुष्य चिन्तन और विवेकमुक्त होगा तथा मानवता अधिक सुखी होगी। पश्चिमी राष्ट्र वैज्ञानिक संस्कृति में कितने ही उन्नत क्यों न हो तत्व एवं आध्यात्मिक शिक्षा से वे मेरे बालक ही हैं। भौतिक विज्ञान केवल लौकिक आनन्द दे सकता है, परन्तु अध्यात्मक विज्ञान का आदर्श मनुष्य को परम आनन्द देता है। वह उसे अधिक सुखी बनाता है। भौतिकवाद अनेकता, उच्छृखलता और निरर्थक महत्वाकांक्षा को जन्म देती है। स्वामी विवेकानंद जी लिखते हैं – ”पाश्चात्य शिक्षा का एक दोष है कि वह मनुष्य को अत्यंत स्वार्थी बना देती है। बुद्धि व्यक्ति को उस सर्वोच्च स्तर पर नहीं पहुंचा सकती है, जिस पर हृदय उसे पहुंचाता है। हृदय ज्ञान का प्रकाश है। अतः हृदय का परिष्कार करें। ईश्वर हृदय के माध्यम से ही हमें संदेश देते हैं। उपभोक्तावाद उपसंस्कृति को जन्म दे रहा है। इस उपभोक्तावादी उपसंस्कृति की मृगमरीचिका में फंसकर हम स्वयं अपने को भ्रष्ट कर रहे हैं, अपनी स्मृति को बिगाड़ रहे हैं, अपने विवेक को नष्ट कर रहे हैं और उदारवाद की झूठी चमक में खुशी में झूम रहे हैं। उपसंस्कृति विस्मृति पैदा कर रही है। यह विस्मृति हमारा व्यतीत, वर्तमान और अनन्त यात्रा को बिगाड़कर हमें महाविनाश की ओर ले जा रही है। हम यह भूल रहे हैं कि हमारी सांस्कृतिक परंपरा परात्पर से प्रश्रित है, नित्यनूतन रूपों में वर्तमान होकर उपस्थित होती है और अनन्त की ओर अतन्द्रित भाव से अविराम बढ़ते रहने के लिए अनादि का संदेश सुनाती है। वह हर सूर्योदय में नयी होती है, हर दोपहरी में प्रखर होती है, हर संख्या में ध्यानमग्न होती है और बिना मरे नया जन्म लेती है …।
? हरि ॐ ?,







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