
केंद्रीय भारत की राजनीतिक गलियारों में आज दो नाम सिर चढ़कर बोल रहा है एक मध्यप्रदेशी ‘मामा’ और दूसरे छत्तीसगढ़िया ‘कका’ दोनों की अपने अपने राज्य में खूब रूतबा है। एक तरफ जहां मामा 13 साल का तजुर्बा लिए सरकार गवांकर भी उसे पार्टी उपचुनाव से अपनी सत्ता पुनर्जीवित करने का दम रखते है तो वही कका भी किसी से कम नही है कभी जोगी केबिनेट में मंत्री रहे बघेल जी ने तीन चौथाई बहुमत से सरकार बनाकर विपक्षी दलों का सूपड़ा साफ करने वाले अपनी पार्टी में एक मजबूत मुख्यमंत्री के रूप में उभरे हैं। एक तरफ जहां मामा को बीजेपी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का दर्जा प्राप्त है वही कका भी 2019 लोकसभा चुनाव से लेकर बिहार, झारखंड, असम , बंगाल कोई भी राज्य के चुनाव हो मंच में अग्रणी नेताओं के रूप में जाने जाते हैं। दोनों 90 के दशक के राजनीति में आये और आज दोनों की राजनीतिक सूझ-बूझ और दांव चलने के तरीके में विशेष कौशल दिखाई देता है। हम बात कर रहे है मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बारे में। ऐसा पहली बार हुआ है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अलग अलग पार्टी के मुख्यमंत्री हैं।दोनों का अपना अलग एजेंडा है और अपनी कार्यशैली है।
इससे पहले छत्तीसगढ़ गठन के उपरांत दोनों राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार होने से आपसी तालमेल और समन्वय दिखाई देता था दोनों राज्यों की पॉलिसी भी मेल खाती थी। आज भी वैसा ही होता अगर कमलनाथ की सरकार में 28 विधायक इस्तीफा न दिए होते मगर यही तो राजनीति है जो असंभव को संभव बनाने की कला है। बहरहाल वर्तमान परिस्थिति में अगर दोनो राज्यों में इन कद्दावरो की कार्यशैली पर चर्चा करें तो ‘मामा’ और ‘कका’ में लोकप्रिय होने की होड़ लग गयी हैं दोनों किसानों आदिवासी और युवाओं को लुभावने योजनाओं से ललचाने के प्रयासों में लगे हैं और दोनो राज्यों में सुशासन को लेकर प्रतियोगिता चल रही है । मामा जहां पिछले तीन कार्यकालों में सौम्य रहते थे इस बार बड़े आक्रमक नजर आ रहे है शायद इस बार सत्ता गवांकर पाने से उन्हें सत्ता के महत्व का एहसास हुआ है इसीलिए उन्होंने कई सबक लिये हैं।इस बार वे अपनी सामान्य छवि की इतर भाजपा का मूल हिंदुत्व के एजेंडे पर तेजी से अमल करते दिख रहे हैं इस हेतु उन्होंने मध्यप्रदेश में छुटपुट लव जिहाद के मामले होने के बावजूद इस पर कठोर कानून बनाया, गाय संरक्षण हेतु गौ केबिनेट का गठन, मंदिर के भीतर चुंबन दृश्य फिल्माने पर नेटफ्लिक्स पर कार्यवाही ,वही जब इंदौर और उज्जैन में उपद्रवियों ने धार्मिक जुलूसों पर पथराव किया तो उन्हें कैदी बनाकर उनके घर भी ध्वस्त कर दिए, फ्रीडम ऑफ रिलीजन बिल 2020 बनाकर जबरन धर्म परिवर्तन कर विवाह करने और उसमें मदद करने वालो को 5 वर्ष कारावास की सजा का प्रावधान किया।
वही मामा किसानों पर मेहरबान नजर आ रहे है खुद को किसानों के हितैषी बताने वाले शिवराज ने प्रधानमंत्री सम्मान निधि के 6000 रुपये के अतिरिक्त 4000 रुपये प्रतिवर्ष अतिरिक्त सम्मान निधि बांटते फिर रहे इसीलिए अब किसानों को 10000 रुपये सालाना मिल रहा है।
इसके आलावा बिना ब्याज दर पर फसल ऋण, उपज पर एमएसपी सुनिश्चित करने हेतु भावन्तर योजना जैसे लुभावने स्कीमो को लाकर मप्र के किसानों को आंदोलन से दूर कर दिया। वही उन्होंने युवाओं को लुभाने के लिए प्रदेश में सरकारी नौकरियों पर सिर्फ़ प्रदेश के युवाओं हेतु 100 फीसदी आरक्षण और विभिन्न खाली पड़े पदों में भर्ती के निर्देश दिए। अनुसूचित जनजाति मुक्ति विधेयक और सहकारी संशोधन बिल 2020 से आदिवासियों को साधने के लिए साहूकारों से लिये गए आदिवासियों के सभी कर्ज माफी कर दिए वही साहूकारों के रजिस्ट्रेशन के लिए लाइसेंस जारी किए गये ।
कका भी आक्रामकता के मामले में मामा से दस कदम आगे हैं प्रदेश अध्यक्ष रहते उन्होंने बोल्ड स्टैंड लेते हुए पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे को पार्टी से बाहर करते हुए जोगी जी की भी निष्कासन की सिफारिश आला कमान से कर दी थी। वे हमेशा बीजेपी के खिलाफ आक्रामक रहे कभी विधानसभा में मजबूत विपक्ष बनकर उभरे, चुनाव पूर्व कांग्रेसियों पर लाठीचार्ज के दौरान जेल जाना बेहतर समझा बजाय जमानत लेने के ,इसके अलावा झीरम हमले के मामले में सरकार को कटघरे में लेते रहे वहीं सत्ता में आते ही इसपर एसआईटी गठित की।खुद को किसान बताने वाले ‘छत्तीसगढ़ईया कका’ सत्ता संभालते ही किसानों और आदिवासियों को साधने में कोई कसर नही छोड़ी। किसान हितैषी सरकार बनाने के पक्ष में उन्होंने इतना जोर दिया कि शपथ ग्रहण के तुरंत बाद उन्होंने 16.65 लाख किसानों के 6100अल्पकालिक कृषि ऋण माफी का ऐलान कर दिया जो लाभ बाद में 19 लाख किसानों तक पहुँच गया। 2500 रुपये एमएसपी सहित बोनस में धान खरीदी हेतु राजीव गांधी न्याय योजना लेकर आये,सिंचाई कर माफी इसके अलावा किसानों के लिए ही बिना ब्याज दर की फसल ऋण व्यवस्था की वही जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए सुराजी गांव योजना के तहत राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना नरवा-गरुवा-घुरूवा-बारी को इतना मजबूती से पेश किया कि इसके लिए उन्हें पश्चिमी देशों द्वारा आमंत्रित किया गया । आदिवासियों के लिए जहां 52 लघुवनोपज को समर्थन मूल्य पर खरीदने लगे वही वन अधिकार पट्टे देकर उनकी जमीन का कानूनी हक दिया, पौनी पसेरी योजना से स्थानीय व्यवसायो में उनकी मदद , सुपोषण योजना और हॉट बाजार क्लीनिक योजना के माध्यम से नए नवाचारी योजनाएं लायी। इसमे कोई संदेह नही की भूपेश सरकार ने राजकाज में छत्तीसगढ़ियापन लाया है जो रमन के कार्यकाल में नही दिखता था जहाँ रमन सरकार राज्योत्सव पर 2 से 3 करोड़ देकर कभी करीना कपूर तो कभी सलमान खान को 10 से 20 मिनेट की मसखरी के लिए बुलाया करते थे वही वर्तमान सरकार ने उससे आधे खर्चे पर राज्योत्सव के दौरान स्थानीय कलाकारों को अधिक तवज्जो दी इससे छत्तीसगढ़ी संस्कृति को महत्व मिला आदिवासी कलाओं की प्रदर्शनी से लेकर उनके द्वारा निर्मित उत्पादों का मेला भी लगवाया , आज जब छत्तीसगढ़ी पर्व हरेली पर खुद मुख्यमंत्री गेड़ी चढ़ते है तो उसकी महत्ता बढ़ती है इसके अलावा आदिवासी महोत्सवों के आयोजन करवाया हो या राज्यगीत को सुनिश्चित करना या पुलिस बैच में वनभैंसा का सींग और हर जिले में गढ़ कलेवा का निर्माण सभी छत्तीसगढ़ की संस्कृति के प्रसार में कार्य हैं। लेकिन कका की सरकार युवाओ को लेकर कोई खास कदम नही उठा पाई हैं उनके सरकार में व्यापमं से कोई सीधी भर्ती अब तक आयोजित नही हुई वही पुरानी भर्ती परीक्षाओं जैसे सब इंस्पेक्टर, एसीएफ , मंडी निरीक्षक आदि की तारीख ही नही दी जा रही।सिर्फ एकमात्र राज्य सेवा परीक्षा ही समय पर हो पा रहे हैं जिनमें वर्ष भर में 300 से ज्यादा अभ्यर्थियों का चयन नहीं हो पाता ऐसे में सरकार बेरोजगारो को 2500 रुपये का भत्ता देकर चुप नही कर सकती हालांकि उन्होंने भी अकुशल में 100 फीसदी स्थानीय लोगो को आरक्षण दिया। नई औद्योगिक नीति में उन्होंने आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस और रोबोटिक्स इंडस्ट्री को तवज्जो दी है जो कृषि प्रधान राज्य में गले नही उतरती।नगरनार को अधिग्रहण हो या एथेनॉल का नई प्लांट लगवाने के विचार , लीज रेंट 3 से 2 फीसदी करके उद्योग को प्रोत्साहित किया। इलाज के लिए स्मार्ट कार्ड के बजाए राशन कार्ड का उपयोग एक अच्छा कदम था। अंग्रेजी स्कूल खोलने जैसे कुछ नवोन्मेषी कदम उठाने से भूपेश सरकर चर्चा में रही हैं लेकिन कका लोकडाउन में भी शराब बिक्री कर टैक्स वसूली करना चाहते हैं हालाँकि वे शराब बंदी का समर्थन करते हैं ये विरोधाभास भी दिखाई देता है। अपनी पार्टी का बाकी समकक्षो की तुलना में टफ स्टैंड लेते नजर आते हैं चाहे वह केंद्र सरकार को जीएसटी संग्रहण पर राज्यों के कर आबंटन को लेकर घेरते दिखे तो कभी खुले तौर पर राहुल गांधी को ही प्रधानमंत्री पद के योग्य बताना हो अपनी बात को मजबूती से रखते हैं शायद इसीलिए उनको 2019 सबसे शक्तिशाली भारतीयों में 54 वा स्थान मिला।
मामा की तुलना कका की सरकार किसान केंद्रित अधिक नजर आती है गोधन न्याय योजना से गोबर द्वारा वर्मीकपोस्ट कंपोस्ट का उत्पादन हो या 52 लघुवनोपज की समर्थन मूल्य पर खरीदी वही तेंदू पत्ता मानक बोरा को 2500 से 4000 रुपये करना हो या मक्का और गन्ना के मूल्यों में वृध्दि करना हो या उन्ही के सह उत्पाद से एथेनॉल प्लांट बनाने की कवायद हो, वही अपने विधानसभा क्षेत्र पाटन में उद्यानिकी विश्विद्यालय की हो, धरसा विकास से लेकर रोका छेका अभियान तक सभी मोर्चों पर किसानों पर अधिक केंद्रीय दिखते हैं। हो सकता है उनकी तजुर्बे की कमी या फिर हो सकता है कि जिस प्रकार दिसम्बर 2018 में कांग्रेस की अपील पर किसानों ने अपना धान मंडी में नही बेच कर भूपेश सरकार का इंतजार किया और सरकार गठन के बाद 2500 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर धान खरीदी हुई उससे बघेल जी किसानों को अपने वोट बैंक से जोड़ रहे हों। लेकिन ऐसा असन्तुलन से एक तरफ छत्तीसगढ़ का बेरोजगार युवा वर्ग आक्रोशित है दूसरी तरफ नक्सल समस्या की चुनौती है वही मप्र के मुख्यमंत्री भी अपनी आक्रामकता से कांटो की सिंघासन पर बैठे हैं जहाँ एक ओर उनको सिंधिया समर्थकों को सँभालने पड़ रहे वही दूसरी तरफ युवाओं और आदिवासियों को खासे प्रभावित करने की चुनौती हैं।









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