
लाला जी नए जीवन की तलाश में निकल गए,अचानक नहीं गए,बल्कि कोरोना के साथ दो-दो हाथ आखरी सांस तक करते हुए गए .कोरोना ने आखिर उनकी शहादत ले ही ली. बीते 16 मई को मेरी और श्री राजेंद्र श्रीवास्तव से वाट्सअप पर जो चर्चा हुई उसमें उन्होंने यही कहा था .
मै उनसे वीडियो पर बात करना चाहता था लेकिन ये मुमकिन नहीं हुआ .उनका जबाब आया -‘ नए जीवन की तलाश में हूँ,बढ़ रोज से .भारी संकट में हूँ पत्नी होम आइसोलेशन में है .इंदौर से बहू-बेटा आचुके हैं ,वे ही जैसे -तैसे अस्पताल में भर्ती करा सके ,बड़ा बेटा और बहू भी कोरोना से ग्रसित हैं बैटी और दामाद देख रहे हैं ,वे घर पर हैं अभी बात नहीं हो सकेगी,माउथ ऑक्सीजन पैक के कारण.दोस्तों की दुआएं साथ हैं .’
जबाब में मैंने उन्हें क्या लिखा बता नहीं सकता,लेकिन मेरी बेचैनी उन्हें लेकर बढ़ गयी थी, मैंने उनके अनुज कीर्ती ‘ शानू’ से बात करने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुआ.सहायक संचालक जनसम्पर्क मधु सोलापुरकर ने बताया की राजेंद्र जी की दशा गंभीर है .मै उन्हें हर दिन अपने लेख और गजलें पढ़ने को भेजता था.आज भी मैंने उनसे सवाल किया था-‘ कैसी तबियत है भाई ” कोई जबाब नहीं आया ,और अंत में डॉ केशव पांडेय की पोस्ट से पता चला की राजेंद्र जी नहीं रहे .’.
राजेंद्र जी की तबियत से ज्यादा मुझे उनके पड़ौसी अवध आनंद के स्वास्थ्य की फ़िक्र रहती थी .मुझे यकीन था कि राजेंद्र जी तो ये जंग जीत ही लेंगे,लेकिन वे लड़ते-लड़ते चले गए .राजेंद्र जी से हमारा कोई पांच दशक का साथ था.उस जमाने से जब न वे पत्रकार थे और न मै .शायद ये बात 1973 की होगी.उनके पिता जी गाढ़वे की गोठ से एक साप्ताहिक और एक मासिक पत्रिका निकालते थे. मै नवोदित कवि के रूप में अपनी कविताएं अक्सर उन्हें दे आता था .यहीं से राजेंद्र जी से परिचय हुया जो समय के साथ लगातार प्रगाढ़ होता ही गया .
बीते पचास साल में हमारे सम्बोधन बड़े अजीब थे. वे उम्र में मुझसे 9 साल बड़े थे.मै उन्हें ‘लालाजी; कहता था और वे मुझे हमेशा ‘ पंडित जी’ हम दोनों ने कभी एक-दूसरे का नाम नहीं लिया .ये सब सहज था ,दूसरों को असहज भी लगता था ,लेकिन था तो था .राजेंद्र जी ने अपने पिता के निधन के बाद प्रेस का पूरा काम सम्हाल लिया था.दैनिक देशबंधु से उनका बंधुत्व आदिकाल से था .उन्होंने कई दशक तक अपने पिता की विरासत प्रेस को सम्हालकर रखा.वे उसे गढ़वे की गोठ से निकलकर हॉस्पिटल रोड पर ले आये और जब परिवार तथा बच्चे पूरी तरह स्थापित हो गए तो उन्होंने धीरे से प्रेस को अलविदा कह दिया .
राजेंद्र जी ने अपने ७१ साल के सफर में कोई पचास साल पत्रकारिता को देइये.वे खानदानी पत्रकार थे.सुचिता,सौम्यता पाआक्शनरपेक्षता उनकी पहचान थी. उन्होंने कभी किसी की नौकरी नहीं की.कभी कुछ सनसनीखेज नहीं लिखा .वे कभी हाबड़ी में रहे ही नहीं. उनकी जरूरतें सीमित थीं और उड़ाने भी ,उनकी सौम्य मुस्कान में जो एक बार बिधा सो कभी बाहर नहीं निकला .उन्हें 2015 का रतनलाल जोशी पुरस्कार मिला तो वे बड़े खुश थे ,क्योंकि इसके लिए उन्होंने कभी कोई आवेदन नहीं किया था ..वे सम्मान के हकदार थे ही क्योंकि उनसे पहले अनेक ऐसे साथियों को इस तरह के ईनाम सरकार दे चुकी थी जिनकी पात्रता को लेकर विवाद थे .
बीते दशकों में हम दोनों ने पत्रकारिता में तमाम ऊँच-नीच होते देखी किन्तु हमारे पारिवारिक रिश्तों में कभी कोई तब्दीली नहीं आयी .वे तीन भाई थे, सभी आपस में गहरे जुड़े थे .वे कुनवा प्रेमी थे,सबको जोड़ने की कला उन्हें आती थी.वे मुझे भी लम्बे अरसे तक दैनिक देशबंधु से जोड़े रहे ,जबकि मेरी और भोपाल संस्करण के मालिक श्री पलाश सुरजन जी से अनेक अवसरों पर असहमति बनी ,लेकिन राजेंद्र जी हमेशा हमें एक टेबिल पर बैठाने में कामयाब रहे .
वे वरिष्ठ पत्रकार थे लेकिन उन्होंने अपनी स्थापना को लेकर कभी कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई. उनका बैनर भले ही छोटा रहा हो लेकिन उनका नाम अपने बैनरों से हमेशा बड़ा रहा. राजनीतिक व्यक्तियों से ही नहीं नौकरशाहों से उनके बड़े मधुर रिश्ते थे .हम दोनों ने लम्बी-लम्बी यादगार यात्राएं की .नर्मदा की यात्रा हो या कोलकाता की यात्रा ,लाला जी कभी हमसे अलग नहीं हुए .वे हम ख्याल थे,हम प्याला,हम निवाला भी थे. लेकिन उनका सबमें गजब का अनुशासन था .उनकी कर्मठता का ही सुफल था कि उनके तीनों बेटे सही समय पर स्थापित हो गए. एक बेटा अमरीका आ गया.मेरे तमाम दबाब देने के बाद वे 2017 में अमरीका की यात्रा पर भी गए .
स्वभाव में संकोची लेकिन हमेशा सक्रिय रहने वाले राजेंद्र जी का जाना मेरे लिए क्या दर्द अपने पीछे छोड़ गया है,मै बयान नहीं कर सकता .अब मुझे अमेरिका से घर वापस लौटने में भय सा लगने लगा है .सोचता हूँ कि पिछले चार महीने में कितने लोगों को गंवा चुका हूँ .लौटूंगा तो उन चेहरों की तलाश कहाँ करूंगा जिनके साथ जिंदगी का एक अहम हिस्सा बिताया है .राजेंद्र जी की जीवन यात्रा में हालांक ऐसा कोई भी पहलू नहीं है जिसके लिए शोक किया जाये. उन्होंने एक बेटे की ,भाई की ,पिता की श्वसुर की और दोस्त की यानि सभी भूमिकाओं को पूरी जिंदादिली के साथ जिया है .पत्रकारिता में सबके लिए ऐसा कर पाना कठिन होता है .
आत्मीयता से पेज अपने सहयात्री श्री राजेंद्र श्रीवास्तव के लिए मेरे मन में जो स्नेह है वो इस समय मुझे सम्हाले हुए है. उनका जब-जब स्मरण करता हूँ स्मृतियाँ आँखों को सजल कर देती है.उनके लिए मन में आदर तो था ही अब शृद्धा भी शामिल हो गयी है .मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि वे जिस नए जीवन की तलाश में हम सबको छोड़कर आगे निकले हैं उसे पूरा किया जाये .वे लौटेंगे ,बार-बार लौटेंगे लेकिन स्मृतियों में .विनम्र श्रृद्धांजलि .
@ राकेश अचल







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