ल न कड़वे: श्रद्धांजलि

जगत भर की रौशनी के लिए,
करोड़ों के जिंदगी के लिए, सूरज रे जलते रहना….
सुरेशचंद्र रोहरा
लक्ष्मण नारायण कड़वे नहीं रहे।
सुबह उनकी जाने क्यों बहुत याद आ रही थी। और लगभग 7 बजे अचानक यह खबर मिली कि कड़वे बाबूजी नहीं रहे, मैं हतप्रभ रह गया।
कई घंटे अवसाद में रहने के पश्चात मन में यही ख्याल आया कि कड़वे जी महामानव थे। यह बात मैं बड़े फक्र और विश्वास के साथ कह रहा हूं कि कड़वे जी हर मानक पर एक महामानव के रूप में खरे उतरते हैं। जब हम उनके संपूर्ण व्यक्तित्व को देखें तो पाते हैं कि उनके जैसा हमारे आसपास कोई नहीं है और ना ही होने की संभावना है।
यही अंतर उन्हें मानव से महामानव बनाता है, मुझे स्मरण है जबसे मैंने उन्हें देखा, लगभग 40 साल बीत गए। वे वैसे ही सादगी के साथ मुझे कोरबा शहर को पैदल…. अपने नग्न पैरों से नापते हुए मिले। यह कोई छोटी मोटी बात नहीं है जो आदमी सक्षम हो मगर सिद्धांतों को जीता है, वही तो हमारा आदर्श होता है और जो आदर्श होता है वह मानव से ऊपर उठकर सच्चे अर्थों में महामानव बन जाता है।
आदरणीय कड़वे जी को आने वाली पुश्ते शायद याद नहीं रखेंगी क्योंकि वह कोई जनप्रतिनिधि नहीं थे, वह कोई महापौर, विधायक या मंत्री नहीं थे, वह साधारण आदमी थे और साधारण आदमी को लोग बहुत जल्द भूल जाते हैं, क्योंकि उनका मूल्यांकन नहीं हो पाता। और मूल्यांकन करने के लिए जिगर होना चाहिए आंखें और समझ होनी चाहिए जो शायद हममें नहीं है यही कारण है कि मुझे लगता है आदरणीय कड़वे जी का मूल्यांकन नहीं होने के कारण उन्हें बिसार दिया जाएगा।एक ऐसे विभूति को जो सच्चे अर्थों में कोरबा की… छत्तीसगढ़ की धड़कन था जो एक छोटी सी छोटी हलचल पर चिंतित हो जाता था एक सामान्य बात पर मुस्कुरा कर के प्रतिक्रिया दिया करता था जो हमेशा सच्चाई ईमानदारी और त्याग तपस्या की प्रतिमूर्ति था। जिसने अपने जीवन को इस अंचल के लिए समर्पित कर दिया था कि मेरी और देखो और कुछ सीख सको तो सीख लो।
जिस तरह महात्मा गांधी कहा करते थे- मेरा जीवन ही मेरा संदेश है, संभवत आदरणीय कड़वे जी का भी जीवन एक संदेश था… अब अगर हम अच्छे नागरिक हैं तो हम उनकी ओर देख करके उनके व्यक्तित्व और जीवन को देख करके कुछ सीख सकते हैं। आज जब वे नहीं है तो उनके बताए हुई बातें उनका जीवन एक संदेश दे रहा है।अब इस संदेश को हमें पढ़ना होगा अगर हम अपना भला चाहते हैं अपने नौनिहालों का भला चाहते हैं तो हमें आदरणीय कड़वे जी को आत्मसात करना होगा। उनकी बताई हुई बातों और उनके जीवन को समझ कर के उसी रास्ते पर चलना होगा जिस रास्ते पर वे आजीवन चलते रहे। हालांकि वो रास्ता बहुत कठिन है सबसे बड़ी चीज है सादगी। सादगी से कौन रह सकता है , कौन है जो पैदल पैदल पूरी धरती को नाप सकता है, वह कड़वे जी ही तो थे जिन्हें मैं लगभग 4 दशकों से पैदल चलता हुआ देख रहा था जहां कहीं भी पहुंचना होता वह पहुंच जाते और हमेशा आशीर्वाद की मुद्रा में लोगों पर स्नेह बरसाया करते थे।
कड़वे जी को इसलिए हम हमेशा याद रखें कि उन्होंने बताया कि एक इंसान होने का मतलब क्या होता है। मैंने देखा, कई दफा वे बिना किसी से कोई तवज्जो रखे चले जा रहे हैं और कहीं पर भी कुछ कचरा देखा …कुछ कूड़ा-करकट देखा तो उसे उस जगह से उठा लिया करते थे और कचरे में फेंक दिया करते थे।वह काम सहज रूप से करते थे उस पर कोई दिखावा नहीं था।
जब देशभर में स्वच्छता अभियान चला और शहर में बड़े-बड़े पोस्टर फ्लेक्स लग गए थे स्वच्छता अभियान के, कुछ लोगों के उसमें फोटो भी हुआ करते थे उन्हें देख करके मुझे लगता था कि क्यों ना एक बड़े से फ्लेक्स में चौराहे पर कड़वे जी का एक फोटो हो जो कचरा बीन रहा हो… ऐसा एक चित्र चौराहे पर टांग दिया जाना चाहिए जो लोगों को ज्यादा जीवंत रूप से स्वच्छता की ओर कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करेगा। ऐसे चेहरों को जिनका स्वच्छता से कोई मतलब नहीं चौराहे पर टांग देना पता नहीं क्यों मुझे रास नहीं आता था। मेरी चलती तो मैं कड़वे जी के पोस्टर पूरे शहर में लगवा देता और मैं मानता हूं कि इससे दूर दूर तक यह संदेश जाता कि जब एक 80 साल का बुजुर्गवार चौराहे पर जहां कचरा भी देखता है उठा लेता है स्वच्छता का संदेश दे रहा है तो क्यों ना हम भी उनके बताए रास्ते पर चलें, पर सवाल है दृष्टि का।
उन्होंने आजीवन सादगी सहजता सरलता को अपनी भार्या बनाए रखा। उन्हें देखकर के सादगी भी लजा जाती थी। कुछ वर्ष पूर्व मैं अचानक जब उनके राजेंद्र प्रसाद स्थित आवास पर पहुंचा तो मैंने देखा सिर्फ एक धोती पहने हुए कड़वे जी घर के बाहर लगे नल से पानी भर रहे हैं उस पानी को लाकर के घर के बाहर लगे हुए पेड़ पौधों पर डाल रहे हैं। यह काम सतत करते रहते थे एक सामान्य सा गेरूआ कपड़ा पहन कर के अपना जीवन गुजार लेना यह कोई छोटी बात नहीं है। यह संदेश देती है कि हमें किस तरीके से किफायत की जिंदगी जीनी चाहिए। उनकी सादगी देख, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की याद जीवंत हो उठती क्यों की आठवीं कक्षा में पढ़ा था वे दो कपड़े जोड़ी से साल भर निकाल दिया करते थे।
आदरणीय कड़वे जी जहां राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी से प्रभावित थे वहीं वे विनोबा भावे के जीवन से भी अत्यंत प्रभावित थे। एक तरीके से इन दोनों महान विभूतियों को उन्होंने अपने जीवन में उतार लिया था और वह धाराप्रवाह गांधी और विनोवा पर घंटों बोल सकते थे। बोलने के साथ साथ अध्ययन के साथ उन्होंने इन दोनों विभूतियों को मानो आत्मसात कर लिया था। और शायद जीवन के साथ औद्योगिक नगरी कोरबा में अपनी जिंदगी के माध्यम से उन्होंने सतत संदेश दिया और शायद यही कारण है कि जो भी व्यक्ति उनसे एक बार मिल लेता था उनकी बातें सुन लेता था उन्हें अपना समझने लगता था और उनके चरणों में गिर कर के आशीर्वाद लेकर अपने आप को धन्य समझता था। मैंने बहुतेरी दिग्गज लोगों को उनके प्रशंसक के रूप में देखा है और वे जिस तरीके से परिवारिक रूप भावना के साथ लोगों के साथ आत्मीय संबंध बना लिया करते थे वह अपने आप में एक उदाहरण है।
यह बात है लगभग 10 वर्ष पूर्व एक दफा मैंने जिलाधिकारी आईएएस राजपाल सिंह त्यागी साहब को कड़वे जी से मिलते हुए देखा और जैसा कि अक्सर होता है आईएएस स्वयं को सब कुछ जानने वाला समझते हैं। और एक ही लाठी से सभी को हांका जाता है मगर त्यागी साहब ने जो किया उसे देख कर के मैं अवाक रह गया।यह बात है महात्मा गांधी दर्शन मानिकपुर संस्थान की जहां एक कार्यक्रम में जिलाधीश राजपाल सिंह त्यागी को आमंत्रित किया गया था आदरणीय कड़वे जी भी हमारे अनुनय पर पहले ही आ चुके थे मैंने देखा जैसे ही उन्होंने कड़वे जी को देखा बड़े ही सम्मान के साथ उनके चरणों में झुके और उनसे आशीर्वाद लिया। यह आदरणीय कड़वे जी का महान व्यक्तित्व ही था कि शहर के , पूर्व सांसद डॉक्टर बंसीलाल रहे हो या वर्तमान में कैबिनेट मंत्री जयसिंह अग्रवाल पूर्व पुलिस अधीक्षक कोरबा और वर्तमान में पुलिस महा निरीक्षक बिलासपुर संभाग रतनलाल डांगी या फिर बालकों के पूर्व मुख्य कार्यपालन अधिकारी गुंजन गुप्ता अथवा कोरबा जिला में आए हुए कई पुलिस अधिकारी एवं आईएएस अफसर उन्हें बड़े ही आत्मीय भाव से सम्मान दिया करते थे। क्योंकि वह सच्चे अर्थों में एक प्रेरक व्यक्तित्व के स्वामी थे।
गांधी जी के प्रति अनन्य भक्ति
कड़वे जी महाराष्ट्र से लगभग 60 वर्ष पूर्व युवावस्था में कोरबा आए थे और विद्युत मंडल में उन्होंने ज्वाइन किया था। यही से उनका सामाजिक आंदोलनात्मक जीवन प्रारंभ हुआ। और आगे अनेक विषमताओं विसंगतियों पर उन्होंने खुलकर के अपनी आवाज बुलंद की थी। उनके समकालीन बताया करते थे कि कड़वे जी ने अपनी एक अलग नई राह चुनी थी जो उन्हें विशिष्ट बनाते हुए आगे ले गई।मूलतः जनसंघ के विचारधारा से पोषित कड़वे जी एक समय में औद्योगिक नगर कोरबा के उन गिने-चुने लोगों में शामिल किए जाते थे जो धाराप्रवाह भाषण व्याख्यान दिया करते थे और जिनकी बातों को सुनकर के आने जाने वाले लोग थम जाते थे। एक समय नगर के मूर्धन्य शिक्षाविद संपादक पंडित विद्याधर पांडे और कड़वे जी जैसी विभूतियां कोरबा के हर एक मंच की शोभा बढ़ाएं करती थी। और मंच पर जा जब अपनी बात रखते थे सभी और सन्नाटा पसर जाता था।
अब बात मेरी मेरे अनुभव की-
लगभग 15 वर्ष पूर्व जब कोरबा में महात्मा गांधी दर्शन संस्थान का गठन किया तो मैंने अपने आसपास देखा कौन सी ऐसी शख्सियत है जो गांधीवाद के हमारे मकसद को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है… मैंने कुछ लोगों से बात की इसी दरमियान एक दिन मैं और पत्रकार भाई सनंददास विचार विमर्श करते हुए कड़वे जी से मिले। मैंने कई दफा सुना था कि कड़वे जी गांधीजी की खिलाफत करते हैं और गांधी जी के किसी भी मंच को भला कैसे सुशोभित करेंगे। यह उथल-पुथल मन में थी। मगर जब उनसे बातचीत हुई तो मैंने यह महसूस किया कि उनका जीवन महात्मा गांधी के सिद्धांतों से प्रेरित है। कुल मिलाकर कड़वे जी ने गांधी को अपना आराध्य माना था। जब मैंने उनसे गांधी दर्शन की बात की और पहले पहल अपने कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए आग्रह किया तो मुझे अच्छी तरह स्मरण है उन्होंने सहर्ष कहा था- बताओ रोहरा, कहां आना है कब आना है?
और आपको आश्चर्य हो सकता है कि कार्यक्रम प्रारंभ होने के कुछ समय पहले ही जब हम अपनी तैयारी कर रहे थे वह पहले ही आ गए, ऐसे थे आदरणीय कड़वेजी। आप समय के पाबंद हुआ करते थे और अपनी बात नपी तुली भाषा में कहा करते थे वह गांधी जी के कई अर्थ में प्रशंसक थे। और बताया करते थे कि बचपन में उन्होंने गांधीजी को देखा है सुना है। वह गांधी जी के व्यक्तित्व और कर्म से बेहद प्रभावित थे। एक तरह से महात्मा गांधी को उन्होंने अपने जीवन में उतार लिया था। यही कारण है कि इस छोटे से कोरबा नगर में उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर के सैकड़ों लोग उनके प्रशंसक बन गए।
मैं अक्सर उनसे मिला करता था वे हाथ पकड़ लेते और बड़े ही स्नेह पूर्वक कहते – रोहरा ! ओह तुम्हें मैं कितना याद करता हूं… तुम बड़े कठोर हो रे।कितने दिनो बाद बाद आए हो…. क्यों?
मैं घंटे भर बैठता दुनिया जहान की बातों पर चर्चा करते पूछते फलां का क्या हाल है …फलां क्या कर रहा है! शहर भर के लोगों के हालो हवाल से वह अपडेट रहते।
महात्मा गांधी मानिकपुर संस्था के लिए उनके मन में असीम प्रेम था वे चिंतित रहते थे कि वहां कुछ ऐसा सकारात्मक काम होना चाहिए जो अक्षुण्ण हो, वे चाहते थे कि गांधी जी के जैसा ही प्रेरक काम मानिकपुर में भी होना चाहिए। वह हमारे क्षमता को भी समझते थे और कहते थे कि किसी भी तरह से काम तेजी से आगे बढ़ना चाहिए उनकी चिंता एक अभिभावक की महसूस होती थी । वे अक्सर कहते थे कि तुम यह सब कैसा कर लेते हो? मैंने महसूस किया कि वह राष्ट्रपिता के अनन्य भक्त थे….
लगभग 20 वर्ष पूर्व समकालीन कविता संग्रह प्रकाशन के दरमियान सिंधु भवन में उनका सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया था। जिसमें ननकीराम कंवर प्रमुख रूप से उपस्थित थे उसके पश्चात मेरी उनसे मुलाकात बढ़ती चली गई और मैं प्रभावित होता चला गया। इसके पश्चात विगत 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी जी की जयंती के अवसर पर एक दफा पुनः उनका अभिनंदन कार्यक्रम आयोजित किया गया था। पत्रकारिता के प्रारंभिक चरण में जब कभी उनसे मुलाकात होती तो साफ-साफ कहते हैं कि तुम्हारा यह काम और समय भी बेकार ही चला गया । वे कहते सकारात्मक कार्य होना चाहिए। और गांधीजी के हर एक कार्यक्रम में जब भी उन्हें सूचना मिलती यथासंभव पहुंचते और हर कार्यक्रम की प्रशंसा किया करते थे कहते थे यह समाज के लिए बहुत उपयोगी काम है।
वे एक बेबाक व्यक्ति थे मुंह देख कर के बात नहीं करते थे। सच को समझते थे और सच को बोलने में भी कोताही नहीं करते थे। भले ही उनका कहना मिठास लिए होता था मगर वे अपनी बात को बड़े ही वजन के साथ रख देते थे। कुछ जगहों पर जब भी असहमति होती तो उसे बताने में दर्ज कराने में देर नहीं करते थे। कुछ ऐसे राजनेता जिनसे गांधी दर्शन का तालमेल था और कार्यक्रमों में भी आते थे तो साफ-साफ वे कहते थे कि इन लोगों को गांधी जी का आमंत्रण मत दिया करो यह लोग उस मंच के काबिल नहीं है। वहीं कुछ ऐसे लोग भी थे जो उनके घोर विरोधी थे मगर जब मंच साझा हुआ तो उनकी आत्मीयता उनसे बढ़ती चली गई। इस तरह महात्मा गांधी के हमारे मंच के माध्यम से अनेक लोगों से उनका आमना सामना हुआ और उनका एक व्यक्तित्व उभर कर सामने आया जो अद्भुत अकल्पनीय था।
यहां यह कहने में कोई गुरेज नहीं होगा कि मैंने उनके कई साक्षात्कार लिए और उसे जब बातचीत होती थी तो पता चलता था कि वह कितनी गहराई लिए हुए हैं। कोई भी बात जब उससे पूछी जाती तो उसका जवाब बड़े ही विस्तार से और गंभीर तरीके से दिया करते थे। उनके पास कोरबा के किसी चौराहे से लेकर दिल्ली दरबार तक की हलचल की खबर रहती थी। उनकी आत्मीयता अगर डॉ रमन सिंह से थी तो वे भूपेश बघेल को भी पसंद किया करते थे। और अपनी बात चिट्ठियों के माध्यम से लिखने के लिए जाने जाते थे उनकी शब्द संरचना अर्थात राइटिंग को देख कर के लोग चकित रह जाते थे। वे अपने अक्षरों के माध्यम से शब्दों के माध्यम से लोगों के दिलों पर राज करते थे। लोग यह मानते थे कि ऐसे शब्द संरचना दुर्लभ है और अगर कोई शख्स ऐसा लिख रहा है तो वह अपने आप में प्रेरणास्पद है।
सच्चाई के प्रहरी
कड़वे जी एक ऐसे शख्सियत थे और मजदूरों के लिए उन्होंने लंबी लड़ाई लड़ी। एक समय में मध्य प्रदेश विद्युत मंडल जब वह कार्यरत थे तब श्रमिकों के लिए कई आंदोलन किए। परिणाम स्वरूप उन्हें विद्युत मंडल से बर्खास्त कर दिया गया, मगर उन्होंने अपनी लड़ाई जारी रखी।
ऐसे ही सन 77′ में जब आपातकाल लगा तो उन्होंने इंदिरा गांधी के शासन के खिलाफ जेल जाना पसंद किया।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वह सच्चाई के लिए लड़ते थे। हक की लड़ाई लड़ते थे और हमेशा पक्के इरादों के साथ हिम्मत से अपनी आवाज बुलंद करते जाते थे चरेवेति चरेवेति सिद्धांत के तहत पैदल चला करते थे और पैरों में चप्पल भी नहीं पहना करते थे यह उनकी अपनी विशेषता थी जो उन्हें सबसे अलग और विलक्षण बनाती थी। विद्युत मंडल से बर्खास्त होने के पश्चात जब फाके के दिन थे किसी से मदद नहीं मांगी। आत्मसम्मान उनके लिए सर्वोपरि था। अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में कभी भी चर्चा करना पसंद नहीं करते थे।
सच्चे अर्थों में एक विचारक थे। उनका अपना एक गहन अध्ययन था अंग्रेजी, हिंदी के साथ अन्य भाषाओं पर भी उनका अपना एकाधिकार था। वे सदा अध्यनरत रहा करते थे और देश दुनिया के हालात से हमेशा वाकिफ रहते थे। यही कारण है कि प्रारंभिक दिनों में जब वे मंच पर आया करते थे तो उनकी विद्वता के आतंक से सभी वक्ता बौने हो जाते थे। अक्सर कठोर शब्दों का प्रयोग करते थे जो लोगों को नागवार गुजरता था मगर जो कहते थे वह सच हुआ करता था वह हमेशा अपने भाषण में सच की अग्नि उगला करते थे। हां यह भी सच है कि धीरे धीरे उम्र के साथ उन्होंने नम्रता के साथ अपनी बात कहने शुरू की थी बात करते थे मगर जब सच को कोई झूठ लाया करता तो क्रोधित हो जाया करते। उनका आकलन एक महान पत्र लेखक के रूप में भी समय को करना होगा उनकी अपनी एक सुंदर हैड राइटिंग के कारण और जवाब देने की तत्परता के कारण उनके हजारों पत्र लोगों के पास एक धरोहर के रूप में सुरक्षित हैं। जिनका प्रकाशन मूल्यांकन होना चाहिए। जिससे उनके व्यक्तित्व और उनके ज्ञान की समझ का लोगों को पता चल सकता है। यह भी सच है कि वह एक समय में प्रतिदिन अनेक लोगों को पत्र लिखा करते थे और आए हुए पत्रों का जवाब भी पोस्ट कार्ड के माध्यम से दिया करते थे। मेरे पास भी उनके अनेक पोस्टकार्ड सुंदर राइटिंग के रखे हुए हैं। राष्ट्रवादी विचारधारा के महानायक संभवामि आश्रम के प्रणेता रचनात्मकता के पुरोधा एक मधुर स्नेहिल वाणी के अमर नायक को बारंबार नमन..
gandhishwar.rohra@gmail.com







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